राकेश भारतीय

उनका कमरा दफ्तर में मेरे कमरे से बस चार कमरे छोड़ कर हुआ करता था, पर आज पहली बार वे इस कमरे में पड़े सोफे की शोभा बढ़ा रहे थे। आने से पहले उन्होंने फोन किया था, फोन पर मेरे आने के बाद उन्हें तत्काल पहचान न पाने की मेरी नई पीए की गलती का सरोष उल्लेख किया था और उसी पुरानी निश्चयात्मक टोन में कहा था- ‘तुम्हारे पास दस-पंद्रह मिनट की फुर्सत तो होगी ही?’

‘हां सर, जरूर।’ वरिष्ठ-कनिष्ठ वाले नस-नस में घुसे अहसास के चलते मेरे मुंह से तुरंत यह निकल गया। पर दूसरे ही क्षण उनसे संबंधित कटु स्मृतियां दिमाग में कौंध गर्इं, दूसरों का समय अब भी अपने हिसाब से तय करने की अकड़ कोंच गई।
मेरे पास आने का समय तय करने के बाद, आने को अवरोधविहीन बनाने का तरीका भी उन्होंने ही तय किया- ‘रिसेप्शन को सूचना दे देना, अपने चपरासी को वहां दस मिनट पहले भेज देना, कमरे तक चपरासी को मेरे साथ बने रहने का निर्देश दे देना।…’

फोन रखते-रखते मेरा मूड बिगड़ना शुरू हो चुका था और अब तक अच्छे-खासे बीते दिन में मनहूसियत का पैबंद लगने का खतरा सामने था।
फिर उसी वरिष्ठ-कनिष्ठ वाले अनुशासन के वशीभूत, मैं उनके कमरे में घुसते ही सम्मान में उठ कर खड़ा हो गया था। पर उन्होंने जो निगाह मुझ पर अभिवादन के जवाब में फेंकी थी, उसमें अपने आगमन से मुझे कृतार्थ करने का भाव छपा हुआ था।
‘आजकल प्रशासन का चार्ज किसके पास है?’
‘मेरे ही पास, सर।’
‘कम से कम अपने कमरे का रखरखाव तो तुम ठीक कर ही सकते हो।’

उनकी व्यंग्यात्मक टिप्पणी से जली-भुनी मेरी निगाह दीवाल के पलस्तर उखड़े उस छोटे से हिस्से पर पड़ गई, जो उस टिप्पणी का कारण बना था।
वे अपनी रौ में, अपने हिसाब से बातें किए जा रहे थे। उनकी बातों पर जहां प्रतिक्रिया अपेक्षित थी, वहां मैं कुछ न कुछ कह जरूर दे रहा था, पर इस दौरान बार-बार मेरे दिमाग में यह प्रश्न उठे बिना नहीं रहा कि इनके मेरे पास आने का मकसद क्या है।
‘टैरिफ तय करने वाले वर्किंग ग्रुप में जाने-माने विशेषज्ञों को शामिल करने से ही ढंग की रिपोर्ट की उम्मीद की जा सकती है।’
इधर-उधर की बातों के बीच उन्होंने बड़े सहज से लगने वाले भाव से यह टिप्पणी चिपका, दी तो मैं सतर्क हुआ।

पर मैंने जान-बूझ कर कोई प्रति-टिप्पणी नहीं की। हां, मन में सोचता रहा कि कहीं उस ओर फिट होने का मंसूबा लेकर तो नहीं पुराना दफ्तर याद आ गया है! पर यह और ‘विशेषज्ञ’।
तभी मुझे याददाश्त ने टोका कि मातहतों से बेगार करवाने के बाद अपना नाम टांक कर इन्होंने एक दर्जन आलेख विभिन्न जगहों पर छपवाए थे, फिर उन्हें अर्धशासकीय पत्र के साथ संलग्न कर खास-खास लोगों को भिजवाया गया था।
तो क्या वे आलेख ‘रिसर्च पेपर’ की कोटि में रखवाए-चलाए गए और उनकी बिना पर…’

‘दूरगामी प्रभाव वाली पॉलिसी हर ऐरे-गैरे के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती।’ उन्होंने किंचित तेज आवाज में कहा तो मैं थोड़ा चौंक गया, पर उनके आने का मकसद अस्पष्ट ही सही, पर कुछ-कुछ अनुमान में आने लगा।
‘कोई काम हो तो करो, मैं तो बस ऐसे ही…’ वाक्य अधूरा छोड़ कर वे अचानक हाथ के कागजात पलटने-निहारने लगे।
मैंने दीवार घड़ी पर चोर निगाहें फेरीं, पर कुछ कहा नहीं।

‘सर, आप कॉफी लेंगे या चाय?’ सामान्य शिष्टाचार में इतना कह कर मैं थमा ही था कि उनका वाक्य छूटा- ‘मैं तुम्हें डिस्टर्ब तो नहीं कर रहा?’
‘नहीं, नहीं सर।’ मैंने तुरंत कहा।
फिर उन्होंने मेरे पेय-शिष्टाचार को एक वाक्य में निपटा दिया- ‘न इस दफ्तर की कॉफी पीने लायक होती है, न चाय।’
मन ही मन मैं झल्लाया- ‘आपकी फतवा देने वाली आदत इस दफ्तर को छोड़ने के बाद भी बरकरार है!’
मेरे इंटरकॉम के बजने पर उम्मीद जगी कि यहां से मेरे उठ निकलने का कोई मौका हाथ लगेगा। पर कॉल सचिव के दफ्तर के बजाय जूनियर अफसर की थी।
इस बीच चपरासी तीन फाइलें रख गया था, पर उन्होंने न उसका, न फाइलों की आमद का कोई नोटिस लिया। गनीमत है कि यह नया रंगरूट उनसे अपरिचित था, वरना सालों पहले तो उनके बरामदे से गुजरते ही चपरासी-क्लर्क दीवाल से सट जाया करते थे, उनकी ‘रेपुटेशन’ से हदस कर। उन दिनों वे थे भी इस दफ्तर के ‘सर्वमान्य’ आतंक, आतंक जो विशेष रूप से मातहतों पर टूटता रहता था।

तब मेरे जिम्मे दो डिवीजन थे और दोनों का काम मैं अलग-अलग बॉस को भेजा करता था। प्लॉनिंग डिवीजन में सालों मेरे बॉस रहे मेहता साहब, जिनको न मुझसे कभी कोई शिकायत हुई और न मुझे उनसे परेशान होने का कोई कारण मिला। हीरा आदमी, हीरा अफसर… मेहता साहब को याद करके ही मन प्रसन्न हो जाता था।
और कोआर्डिनेशन डिवीजन में बस आठ महीने के लिए ये मेरे बॉस बने थे, मेरे नियमित बॉस के फॉरेन ट्रेनिंग पर चले जाने की वजह से। उन आठ महीनों में क्या-क्या नहीं झेल गया मैं!

दूसरे डिवीजन के काम को ये काम ही नहीं समझते थे, चाहते थे कि कोआर्डिनेशन डिवीजन के काम को ही मैं काम समझूं। कितना भी कर लो, कितना भी खट लो; खामियां निकालने की इनकी आदत पूरे कार्य-घंटों में थप्पड़ की तरह वार करती रहती थी।
और, चौंका देने वाले दुखद आश्चर्य के रूप में उन आठ महीनों की गोपनीय रिपोर्ट लिखते हुए इन्होंने मेरे कार्य को ‘औसत’ आंका था। भला हो मेहता साहब का, जिन्होंने उसी अवधि में ‘उत्कृष्ट’ ग्रेड से मेरे कार्य को नवाजते हुए मुझे उबार लिया था, वरना वह ‘औसत’ ग्रेडिंग मेरी पदोन्नति के रास्ते में खड़ी हो जाती।
यह सब याद करते हुए मेरा चेहरा तन गया। उधर, वे आराम से सोफे पर पसरे हुए कभी कुछ बोल दे रहे थे, कभी हाथ के कागज बेमतलब पलट लेते थे और कभी शून्य में कहीं दृष्टि टिकाते हुए भौहें सिकोड़ देते थे।

यह तो स्पष्ट हो गया था कि आए थे वे मेरे पास किसी काम से ही, पर काम क्या है, यह अभी तक उनके मुंह से निकला नहीं था। वर्किंग ग्रुप वाला संकेत भी मेरे संदर्भ में बेमानी था, क्योंकि वह डिवीजन न मेरे पास था, न कभी पहले रहा था।
तभी इंटरकॉम फिर बजा। इस बार बुलावा सचिव के दफ्तर से था। मैं संबंधित कागजात लेकर चल दिया, इस उम्मीद को भी लेकर कि वापस लौटते-लौटते इनके भी फूटने का समय शायद आ जाए। वैसे मेरे वाक्य ‘सर, जरा सेक्रेटरी साहब के पास जा रहा हूं।’ पर उन्होंने ऐसी भंगिमा बनाई जैसे यह कोई उल्लेखनीय बात ही नहीं है।

बीस मिनट बाद अपने ही कमरे में घुसते हुए असहज लगा, क्या पता इन्हें और कितना झेलना पड़ेगा।
वे वैसे ही विराजमान मिले सोफे पर, अपने सेलफोन पर किसी से बतियाते हुए। बात बहस के अंदाज में हो रही थी, शायद तमिल में। मेरे पल्ले कुछ न पड़ा।
सेलफोन बंद हुआ, तो उन्होंने मुझसे कहा- ‘मैं देख रहा हूं कि दफ्तर में अनुभवी लोगों की कमी हो गई है। तुम तो इतने सालों से यहां हो, दूसरे डिवीजन के जूनियर आफिसर्स को भी गाइड कर सकते हो।’

‘जी…’ बुदबुदा कर मैं सोचने लगा कि मेरे दफ्तर में मैं किसी को गाइड करूं या न करूं, यह इनकी सोच का सामान क्यों बन गया।
‘आता हूं मैं पांच-दस मिनट में।’ उन्होंने अचानक इतना कहा और कमरे से बाहर निकल गए, अपने कागद-पत्तर वहीं सोफे पर छोड़ कर।
अब चिढ़ सुरसुरा कर मेरे कपाल पर चढ़ गई। कौन-सी बात की भूमिका बांध रहे हैं ये, और भूमिका बांधने की भी हद होती है! इनके भूतपूर्व हो चुके ‘बॉसपने’ को मैं कब तक झेलूं और क्यों झेलूं?…
एक बार फिर इंटरकॉम बजा और मेरी चिढ़ की रेलगाड़ी पर ब्रेक लग गया।
‘सर। मैं आपके पास पांच मिनट के लिए आना चाहता हूं।’
‘बात क्या है?’

‘सर। मिगलानी साहब के दफ्तर से फोन आया था। पता नहीं वहां से क्यों कहा गया कि वर्किंग ग्रुप के लिए एक्सपर्ट्स की लिस्ट फाइनलाइज करने से पहले मैं आपसे मिल लूं।…’
‘मुझसे क्यों? मैंने तो न वो काम पहले देखा और न अब देख रहा हूं।’
‘मैं भी यही सोचा, सर। यह बड़ा सेंसिटिव मसला है, पर मिगलानी साहब पिछले मिनिस्टर के ओएसडी रह चुके हैं, कोई बात जरूर…’
‘देखो; मेरा उससे न कोई मतलब, न उसमें मेरी कोई रुचि, मिगलानी ने तुम्हें ऐसा क्यों कहलवाया, इस पर तुम अपने डिवीजनल सीनियर से बात करो।’ कह कर मैंने इंटरकॉम का चोंगा रख दिया।

टैरिफ डिवीजन के डिप्टी डायरेक्टर की बात से भूमिका बांधने के इनके सारे तमाशे का रहस्य खुल गया। अपने ही जैसे मक्कार मिगलानी से इस बेचारे पर दबाव डाला जा रहा है और दबाव के तर्क मेरे कानों में डाल कर अपने मतलब के लिए मुझे इस्तेमाल करने की कोशिश की जा रही है!
कमाल है! तीन साल से अधिक हो गए होंगे इन्हें सरकार से विदा हुए, पर चौधराहट दिखाने की भूख अब भी बरकरार है! हर परिचित को अपने मतलब के लिए इस्तेमाल करने की मक्कारी बरकरार है। मेरे जैसे जिस अफसर का भला यहां रहते न कभी सोचा, न किया; उसकी भी उपयोगिता दिखी। मतलब साधने में तो चले आए…

ज्यों-ज्यों मैं यह सोच रहा था, मेरा गुस्सा बढ़ता जा रहा था। चपरासी फिर चार फाइलें रख गया था, पर काम करने का मेरा मूड ही नहीं रहा। बस उनके द्वारा सोफे पर छोड़े गए कागद-पत्तर को घूरते हुए, अकड़ में घोल कर प्रक्षेपित उनकी मक्कारी पर मन ही मन फुंकता रहा।
वे अब तक लौटे नहीं थे।
अंतत: अपनी उद्विग्न मनस्थिति में मैंने स्लिप-पैड को ड्राअर से निकाला और लिखना शुरू किया…
लिखने के बाद उस पन्ने को फाड़ कर एक लिफाफे में डाला और तीन बार स्टेपल कर बंद कर दिया।
फिर मैंने उठ कर बंद लिफाफे को सोफे पर रखे हुए उनके कागद-पत्तर के ऊपर रख दिया।
इसके बाद मेरा गुस्सा धीरे-धीरे कम होने लगा और मैंने एक फाइल खोल ली।

‘अरे, बड़ा समय निकल गया यहां…’ कहते हुए वे झटके से कमरे में घुसे और अपने कागद-पत्तर की ओर लपके।
‘सर। मैंने आपके लिए एक संदेश लिफाफे में वहां रख दिया है। बाद में उसे आराम से पढ़ लीजिएगा।’ अब भी उसी सम्मान से उठ कर मैंने कहा।
उनकी आंखों में मक्कारी की सफलता का भाव कौंध गया, हिनहिनाने जैसे स्वर में हल्की-सी हंसी निकली। लिफाफे पर उंगलियां फिरा कर सावधानी से सहेजने के अंदाज में अपने फोल्डर में डाल भी लिया।
मैं उन्हें दरवाजे तक छोड़ आया। मैं उनके किसी काम आया हूं, यह समझ लेने की चमक आंखों में झलकाने के बावजूद मुझे औपचारिक धन्यवाद तक न कर वे आराम से चल दिए।

हर नौकरशाह की नस-नस में आजीवन ही पैठ बनाए रखे सीनियर-जूनियर के अलिखित शिष्टाचार के चीथड़े उड़ा कर मैंने बड़ी बेरहमी से उनके लिए संदेश में लिख मारा था-
कुछ सुझाव :
– रिटायर होने के बाद अपने पुराने दफ्तर के चक्कर न लगाएं।
– रिटायर होने के बाद पुरानी चौधराहट को परोक्ष रूप से हासिल करने की कोशिश न करें।
– रिटायरमेंट के पश्चात आई वानप्रस्थ-अवस्था में माया से शनै:-शनै: दूर होते जाने के मार्ग पर चलने में ही अपनी और समाज की भलाई है।
– वैसे इस वानप्रस्थ अवस्था में करने के लिए बहुत काम हैं, जैसे भगवान का भजन करें, वंचित तबके के बच्चों को पढ़ा दें, अनपढ़ों की अर्जी वगैरह लिख दें…
मैं जानता था कि संदेश को पढ़ने के बाद उनकी मुझसे यह आखिरी मुलाकात होगी।
और यही तो संदेश का उद्देश्य था!