सुषमा गुप्ता

उसने लड़की से पूछा, ‘जब पहली बार मिलोगी मुझसे, तो क्या बातें करोगी?’
लड़की ने बिना एक पल जाया किए कहा, ‘कुछ भी नहीं।’
‘अरे! ऐसे कैसे? फोन पर तो लगातार बोलती रहती हो। इतनी सारी बातों का पिटारा खोल कर बैठ जाती हो, जैसे कोई जादुई बक्सा। वह निकलता है न डिब्बे के अंदर से डिब्बा! फिर एक और डिब्बा। यों ही लगातार तुम्हारी बातें परतों से खुलती रहती हैं, एक के अंदर एक अनवरत। और कह रही हो, जब मिलोगी तो बात ही नहीं करोगी?’
लड़की बोली, ‘नहीं।’
‘पर क्यों?’

लड़की कुछ देर खिड़की से बाहर दूर टिमटिमाते तारे को देखती रही। फिर एक गहरी सांस छोड़ते हुए बेहद ठहरे शब्दों में बोली, ‘शब्दों को ट्रैवल करने के लिए हवा की जरूरत होती है। हवा खाली स्थान पर होती है। पर जब हम मिलेंगे तब सब वैक्यूम भर जाएंगे। तुम्हारे मेरे सिवा वहां और कुछ भी तो न होगा। शब्द कैसे जाएंगे तुम तक? तुम मुझे छूकर मेरी बात महसूस कर लेना।’ लड़का सुन्न हो गया। जैसे एक पल के लिए उसके दिल-दिमाग ने काम करना बंद कर दिया हो। किसी सम्मोहन में कैद होकर बोला, ‘उफ्फ! इतनी मोहब्बत।’ लड़की के बेइंतहा प्यार पर निसार हो गया था वह। उसे लगा दुनिया में उससे खुशकिस्मत कोई नहीं। उसका ऐसा महसूस करना ठीक भी था। लड़की बला की खूबसूरत थी और बहुत सारे हुनर में माहिर। लोग उसके हुनर की मिसाल देते थे। पर… सिर्फ लड़की जानती थी उसका सबसे बड़ा हुनर क्या है। बहुत-सी लड़कियां कहतीं उससे… ‘हम आप जैसी क्यों नहीं हैं?’
लड़की हंस के कहती, ‘बहुत खुशकिस्मत हो, जो मुझ-सी नहीं हो।’
पर सच को सब मजाक समझ कर हंसी में उड़ा देते और लड़की सिर झटक कर।
भला कोई क्यों न होना चाहेगा लड़की के जैसा। कभी किसी से लड़की का मन बहुत उखड़ जाता, जब कहा जाता उसे बार-बार- ‘तेरे पास क्या नहीं है, तू तो दुनिया के चंद खुशनसीबों में से एक है, जिसके पास पैसा, रूप, गुण का खजाना है।’
तब लड़की बद्दुआ दे डालती तिलमिला कर उन्हें, ‘ईश्वर करे अगले जन्म मेरी जिंदगी आप जीएं।’
हंसते मुस्कुराने लोग चले जाते कि वाह! क्या दुआ दी, पर फिर लड़की को पछतावा भी होता- ‘क्या जरूरत थी बद्दुआ देने की। इन बेचारों का क्या कसूर।’
यह तो बस लड़की जानती थी कि उसका सबसे बड़ा हुनर तो मुखौटों पर मुखौटे और फिर उस पर और मुखौटे लगाना ही तो है। रावण के भी दस सिर थे। लड़की को अक्सर लगता, उसके तो अनगिनत सिर हैं, सब अलग-अलग सोच और शक्ल वाले।
वह जिसके साथ होती उसके साथ दरअसल कभी न होती। बड़ी सहजता से कह देती, ‘हां मोहब्बत है तुमसे’ पर अक्सर अकेले में पूछती खुद से ‘अच्छा! क्या सचमुच?’

उसके अंदर से हमेशा एक ही आवाज आती, ‘पता नहीं।’
खुद से सवाल-जवाब चलते रहते कि ‘पता नहीं तो फिर क्यों कहा?’
‘कह दिया बस… उस पल लगा जैसे है।’
मन फिर से मन को और कुरेदता, ‘चाहती क्या हो आखिर?’
मन फिर वही घिसा-पिटा जवाब टिका कर उड़ जाता, ‘पता नहीं।’
उसकी नींद का कमरा अजीब-अजीब सपनों के पर्दों से ढका था। पर्दे सब के सब निपट काले। घबरा कर उठ जाना जाने नियति थी या आदत, पर हर बार यों पसीने से लथपथ घबराई-सी हालत में उठने के बाद वह सबसे पहले अपना चेहरा देखने की कोशिश करती।
बेड की बैक पर बड़ा-सा आईना लगवाया था उसने कभी बहुत चाव से। पर एक भी रोज ऐसा न हो सका कि उसमें दिखा हो चेहरे पर कोई गुलाबी रंग। गहरी बेसुध लगभग मरी हुई अवस्था से जब भी वह जागती, तब गाल पर, हथेलियों पर, कलाइयों पर अलग-अलग निशान मिला करते। कभी तकिए की कढ़ाई अपनी कलाकारी दिखा देती, तो कभी कलाई की चूड़ी।
सोते में उसका चेहरा और जेहन दोनों ही एक बेरंग सपाट कैनवस-से हो जाते, जिस पर अंदरूनी और बाहरी हर निर्जीव दिखने वाली या समझी जाने वाली चीजें भी जीवंत हो दिल खोल कर नृत्य करतीं और अपनी मौजूदगी छोड़ जातीं।
उसकी आंखों के नीचे, उसके माथे पर और कहीं-कहीं उसके होंठों के आसपास भी कुछ रुकी हुई आवाजें टुकड़ा-टुकड़ा कराहाती रहतीं। वह अचरच से भर उठती, ये गले से बाहर आने के बजाय चेहरे पर कैसे फैल गई।
उसने एक जुनून पाला लिया था। बहुत सारी परतें चढ़ाने का। सूखी हुई, भीगी हुई, निचोड़ी हुई परतें। जाने कब किस की जरूरत आ पड़े।
उसे हर समय लगता दुनिया सिर्फ तमाशे का कारोबार है, जो नित नई परतों से ही चलता है।
फिर भी रोज आईना बोल देता उसे, तुम औरत होना कब बंद करोगी?
सब परतों के उस पल मुंह लटक जाते।
ऐसे में अक्सर वह चिढ़ एक ग्लास विस्की आईने पर फेंक देती।
०००

एक रोज बला की बारिश हुई। सब जलमग्न हो गया। लड़के ने टीवी पर न्यूज देखी और घबरा कर फोन किया लड़की को।
एक ही आवाज बार-बार बजती रही, इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं।
लड़का बदहवास हो गया। टीवी पर दिखाए जाने वाले हेल्प लाइन नंबरों पर लगातार फोन मिलाता रहा कि कुछ तो पता चल जाए लड़की के बारे में। पर, कहीं कुछ नहीं।
समय गुजर कर भी गुजर नहीं रहा था।
‘यह वक्त बहुत बुरा है, इसे गुजर जाना चाहिए। जीने की शर्त है, उसे भूल जाओ, उसे भूल जाना चाहिए।’
ऐसा सोचते हुए लड़का अक्सर रात को सिरहाने के पास करीने से बिछी चादर पर कुछ शब्द अपनी अंगुली से बहुत सफाई से लिखता और एक बेहद उदासी भरी सांस लेकर अपनी हथेली को बहुत गहरे तक चादर पर दबा, झटके से गिरा देता उन शब्दों को बेड से नीचे।
महसूस करने की कोशिश करता एक अनकहा-सा सुकून, जैसे जेहन पर रेंगती चीटियों को झटक दिया हो कहीं दूर कि अब बेचैनी कुछ कम हो जाएगी और नींद आ जाएगी।
पर वह जब भी सोने की कोशिश करता, अतीत से निकल कर कुछ मकड़ियां सरकने लगतीं अंदर कहीं मन के तहखाने में। बुनने लगतीं एक जाला बहुत तेजी से, और जकड़ लेतीं उसकी नींद को उसमें।
लड़का अक्सर तड़प कर एक झटके से करवट लेता। चाहता कि तहखाने में सरकती मकड़ियों का संतुलन बिगड़ जाए, जिससे बंद हो जाए उनका जाला बुनना और वह सो पाए, पर ऐसा कभी हो नहीं पाता।
उसके जे़हन में बार-बार कौंधता, एक रोज लड़की ने कहा था- ‘हो सके तो अपने जेहन की बांहें खुली रखना कि किसी रोज जब मेरे सुकून का मन घबराएगा, तो चली आऊंगी तुम्हारी रूह के सीने पर सिर रखने। तुम अपने अहसास की अंगुलियों से मेरे दर्द के गेसू संवार देना और मैं रख लूंगी वह अनकही दास्तान सहेज कर उम्र के आड़े वक्त के लिए।’
पर वह प्रेम रेत के टीलों पर हवा से बनी आकृतियों-सा था, जो पल-पल अपना स्वरूप बदलता रहा और एक रोज विलुप्त हो गया। किसी से लगाव हो जाना यों भी कोई खास आरामदेह बात नहीं, उस पर इस कदर गहरा हो जाना… मतलब जहर की मीठी गोली जुबान के नीचे दबा कर अपने मरने का धीरे-धीरे इंतजार करना।
०००

‘बेहिसाब धुंध के बादलों से लड़ाई करने के बाद साफ नीले आसमान में इंद्रधनुष का खिलना जितना सुखद होता है, वैसा ही तो था तुम्हारा होना… कहां चली गई तुम। लौट आओ न। मेरी दुनिया तुम बिन स्याह हो गई है।’
दोपहर बाद आॅफिस से घर लौटते कार में एफएम पर गजल बज रही थी- ‘आपको देख कर देखता रह गया/ क्या कहूं और कहने को क्या रह गया।’
लड़के को याद आया- कभी यह गजल उसने लड़की को भेजते हुए कहा था, ‘जगजीत सिंह की आवाज में अगर इसे सुन लो तो कसम से एक कतई नॉन रोमांटिक आदमी भी रोमांस से भर जाए।’
और लड़की ने? खिलखिलाते हुए जवाब दिया था, ‘तो हमने कौन-सा सीने में पत्थर लगवाया है जानेमन!’
लड़के ने बगल की सीट पर यों नजर डाली जैसे लड़की साथ ही बैठी है। और मुस्कान लिए आंखों में शरारत भर कर कह रही है, ‘पर फिलहाल आगे देख कर ड्राइव करो वरना दोनों ऊपर वाले को देख रहे होंगे।’
एक सुनाई देने वाली हंसी, और एक महसूस की जाने वाली हंसी जाने कितनी ही देर आलिंगनबद्ध हो कार में गूंजती रही उस पल के बाद।
किसी के न होने में उसका होना…
उस शाम थक कर गरम रेत के टीले पर लड़के की आंख लग गई। कहीं किसी घर लौटते पंछी की हूक सुनी, तो हड़बड़ा कर उठ बैठा। बुदबुदाया… ‘तुम्हारे उल्टे हाथ की छोटी अंगुली कस कर अपनी मुठ्ठी में बंद कर रखी थी मैंने सोते हुए, पर तुम दिख क्यों नहीं रही?’
शायद… शाम ज्यादा ढल गई है।
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बहुत से बदहवासी भरे महीनों के बाद एक गुमनाम खत जाने कहां से आया लड़के के नाम। लड़के का दिल धड़क उठा। उसे लगा था, यह खत उसी लड़की का है।
उस खत पर कोई तारीख नहीं थी। कब लिखा गया… कब पोस्ट किया गया, कुछ निशान नहीं बचा था।
कांपते हाथों से खोला तो काली स्याही से उसमें बस इतना लिखा था, ‘एक मोहब्बत भुलाने के लिए जाने कितनी मोहब्बतें कर डाली।’
०००
आज अरसा गुजर गया। बाल पक चुके। महीन लकीरें हैं माथे पर। काले घेरे भी बढ़ गए आंखों के नीचे, पर लड़के को जवाब न मिला। टीस भरे सवाल का।…
वह कौन-सी मोहब्बत थी?
पहली… या…?