गोविंद भारद्वाज
रोहन, यह लो अपनी प्रोग्रेस रिपोर्ट… कल अपने पापा के दस्तखत करवा कर लाना इस पर… समझे!’ क्लास टीचर ने रोहन को उसकी प्रोग्रेस रिपोर्ट देते हुए कहा। रोहन ने टीचर को कोई जवाब नहीं दिया। वह सिर झुकाए चुपचाप खड़ा रहा। ‘अरे, बोलते क्यों नहीं… कम नंबर आए हैं, पापा डांटेंगे, इसलिए बोलती बंद हो गई क्या तुम्हारी?’ टीचर ने कहा। रोहन ने धीरे से कहा, ‘सर… मेरे पापा नहीं हैं। उन्हें गुजरे दो साल हो गए हैं।’ ‘ओह! आय एम सॉरी… मुझे ध्यान नहीं रहा। चलो बड़े भैया से करवा लाना… ओके?’ टीचर ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा। शाम को जब बड़े भैया ऑफिस से आए, तो रोहन ने अपनी प्रोग्रेस रिपोर्ट दिखाते हुए कहा, ‘भैया इस पर आप साईन कर दो… कल टीचर को वापस जमा करवानी है।’ भैया ने रिपोर्ट कार्ड को ध्यान से देखने के बाद पूछा, ‘रोहन तुमसे ज्यादा नंबर तुम्हारी क्लास में कितने बच्चों के हैं?’ ‘भैया चार-पांच लड़कों के होंगे!’ रोहन ने डरते हुए जवाब दिया। इस पर भैया बोले, ‘कल तुम उन सबके घर जाना और पता लगाना कि वे क्या-क्या खाते हैं। उनके पास पढ़ने-लिखने की कौन-कौन सी सुविधाएं उपलब्ध हैं। किस-किस टीचर्स से वे सब पढ़ते हैं?’
‘क्यों भैया?’ रोहन ने धीरे से पूछा। ‘अरे, मैं पता लगाना चाहता हूं कि तुम्हारे पास ऐसी कौन-सी सुविधा नहीं है, जिसके कारण तुम उनसे पढ़ाई में पीछे रह गए।’ भैया ने उससे थोड़ा जोर से कहा।रोहन को उस रात नींद नहीं आई। वह सारी रात सोचता रहा कि भैया ने उससे यह क्या करने को कह दिया। बस सारी रात उसकी आंखों में ही निकल गई। अगले दिन उसने भैया की सारी बात मां को बताई। मां ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘बेटा बड़े भैया जैसा कहते हैं वही करो।’ मां भी बड़े भैया का समर्थन कर रही थी। रोहन ने सोचा कि जब तक वह भैया का कहना नहीं मानेगा, तो प्रोग्रेस रिपोर्ट पर वे हस्ताक्षर नहीं करेंगे। इसलिए वह अपनी कक्षा के सबसे होशियार लड़के सोनू के घर गया। रोहन को अपने घर आया देख सोनू ने पूछा, ‘अरे रोहन तुम आज अचानक मेरे घर!’ ‘हां यार, तुमसे एक बात पूछने के लिए आया हूं।’ रोहन ने जवाब दिया। ‘पूछ लेना बाद में, पहले अंदर चल कर बैठते हैं।’ सोनू ने उसे अपने कमरे में ले जाते हुए कहा। कमरे में बैठने के बाद रोहन ने अपने भैया की सारी बातें बता दी। इस पर सोनू ने कहा, ‘रोहन मेरे दोस्त, तुम तो बहुत भाग्यशाली हो, जो तुम्हारे भैया इतने अच्छे है। मेरे पिताजी तो एक मजदूर हैं। बड़ी मुश्किल से वे घर का खर्चा चला पाते हैं। मां कई घरों में झाडू-पोंछा और बर्तन मांज कर पिताजी का सहयोग करती है। काफी मुश्किल से मेरी पढ़ाई का खर्चा उठाया जाता है। इसलिए मैं पढ़ाई में ध्यान लगाता हूं, ताकि पढ़-लिख कर कुछ बन कर अपने मां-बाप का बोझ कम कर सकूं।’ रोहन ने जब सोनू की बात सुन कर बहुत दुखी हुआ।
उसकी कक्षा का एक और होशियार लड़का था। उसका नाम था गौरव। रोहन जब उसके घर पहुंचा, तो देख कर बड़ा हैरान हुआ। गौरव अपने पिताजी के साथ बैठ कर कागज की थैलियां बना रहा था। गौरव ने रोहन को अपने घर अचानक आया देख बड़ा हैरान हुआ। वह हंसते हुए बोला, ‘आज सुदामा के घर में भगवान कृष्ण कैसे पधारे?’ रोहन बोला, ‘ऐसी छोटी बातें क्यों करता है रे गौरव। मैं तो साधारण-सा लड़का हूं, जो तुम्हारी क्लास में पढ़ता हूं।’ उसकी गरीबी रोहन से छिपी नहीं थी। वह समझ गया कि भैया ने क्यों उसे उसके दोस्तों के पास भेजा था। होशियार बच्चे सुविधा मिलने के कारण कक्षा में प्रथम नहीं आते, बल्कि अपनी लगन और मेहनत के कारण सर्वोच्च अंक पाते हैं। वह चुपचाप घर लौट आया। शाम को जब उसके बड़े भैया घर आए तो वह तुरंत उनके पास गया और बोला, ‘भैया आज तो मेरी प्रोग्रेस रिपोर्ट पर सिग्नेचर कर दोगे?’ ‘क्यों… क्या तुमने मेरी बात मान ली?’ भैया ने पूछा। रोहन ने तपाक से कहा, ‘हां भैया, मैं अपने से ज्यादा होशियार बच्चों के घर जाकर आ गया।’ ‘अच्छा, फिर तुमने उनसे पूछा भी होगा कि उनके अधिक नंबर कैसे आते हैं। चलो बताओ, तुम्हारे पास उन बच्चों से क्या-क्या चीजें कम हैं। मैं अभी वे कमियां पूरी करता हूं।’ भैया ने एक सांस में सब कह दिया। रोहन के पास उनके प्रश्नों का कोई जवाब नहीं था। वह चुप खड़ा रहा। उसी समय उसकी मां भी आ गई। वह मां को देख कर तुरंत उनसे लिपट गया और रोने लगा। रोहन को रोता देख उसके भैया ने हैरानी से पूछा, ‘अरे, क्या हुआ हमारे छोटू को?’ ‘भैया मुझे माफ कर दो… मैं आज के बाद बहुत मेहनत करूंगा और क्लास में सबसे होशियार बन कर दिखाऊंगा।’ रोहन ने सुबकते हुए कहा। ‘अरे रोहन, मैंने तो सिर्फ तुझे कम नंबर लाने का कारण ढूंढ़ने के लिए वहां भेजा था। तुझे दुखी करने या रुलाने के लिए नहीं।’ भैया ने उसे सीने से लगाते हुए कहा।
रोहन ने अपने भैया को अपने दोस्तों की गरीबी के बारे में सब कुछ बता दिया। तब उन्होंने समझाते हुए कहा, ‘रोहन मैं यह जानना चाहता था कि जब तुम्हारे पास उनसे अच्छी सुविधाएं हैं, तो तुम उनसे पीछे क्यों हो। दरअसल, तुम्हारे उन दोस्तों के पास समय की उपयोगिता है। वे अपने माता-पिता का हाथ बंटाने के बाद भी समय निकाल कर बड़े मनोयोग से पढ़ाई करते हैं। तुम सिर्फ कुछ देर पढ़ते हो और खेलने निकल जाते हो। खेल भी जीवन में जरूरी है, लेकिन समय के अनुसार।’ अब रोहन बड़े भैया की बातें समझ चुका था। उसके चेहरे पर उत्साह का भाव उभर आया था। तभी भैया ने कहा, ‘यह लो अपनी प्रोग्रेस रिपोर्ट। इस पर मैंने दस्तखत कर दिए हैं।’ ‘थैंक्यू भैया।’ रोहन ने प्रोग्रेस रिपोर्ट लेते हुए कहा।
