दीप्ति मित्तल
हमीदपुर गांव में एक लड़का रहता था अदनान। उसके अब्बा की साइकिल रिपेयरिंग की दुकान थी। दुकान से बस घरखर्च चलाने जितनी आमदनी होती थी। अदनान गांव के सरकारी स्कूल में सातवीं कक्षा में पढ़ता था और अपनी कक्षा में हमेशा प्रथम आता था। अदनान की अम्मी उसे बहुत प्यार करती थीं। उनकी इच्छा थी कि अदनान पढ़-लिख कर वैज्ञानिक बने और अपने देश का नाम रोशन करे। वे उसकी पढ़ाई का बहुत ध्यान रखती थीं। मगर पैसों की तंगी से परेशान अब्बा चाहते थे कि अदनान पढ़ाई छोड़ कर दुकान में उनका हाथ बंटाए। एक बार अम्मी बीमार हो गर्इं। अब्बा के पास उन्हें शहर ले जाकर इलाज कराने को पैसे नहीं थे। वे गांव के ही हकीम से उनका इलाज कराते रहे और एक दिन अम्मी चल बसीं। अदनान के सिर पर जैसे दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। अम्मी के गुजरने के बाद घर संभालने के लिए उसकी बूढ़ी फूफी आ गई थीं। उनकी नजर में पढ़ना-लिखना बेमतलब था। वे अदनान से कहतीं, ‘पढ़ने-लिखने में वक्त खराब करने की क्या जरूरत है। तू अपने अब्बा की दुकान में हाथ बंटा, आगे वही तेरे काम आएगा।’ और उसे जबरर्दस्ती स्कूल के बजाय दुकान पर भेज देतीं। इस वजह से वह पढ़ाई में पिछड़ता जा रहा था। प्रथम आने वाला अदनान साल भर के भीतर फेल होने की कगार पर पहुंच गया था। उसके अब्बा की दुकान के पास ही किराने और सब्जी की दुकानें थीं। वहां लोग थैला उठाए आते-जाते रहते थे। खाली समय में अदनान आते-जाते लोगों को देखता रहता। कुछ दिनों से वह ध्यान दे रहा था कि एक बुर्जुग रोज वहां आते और थैले भर सामान खरीद कर वापस चले जाते। आते वक्त तो उन्हें कोई समस्या नहीं होती थी, मगर जब जाते तो सामान के वजन से वे चलते हुए हांफने लगते। वे बार-बार थैलों को नीचे रखते, पल भर सुस्ताते, फिर वापस थैले उठा कर धीरे-धीरे चलने लगते। यह देख अदनान का दिल पसीज जाता।
एक दिन वह अपने अब्बा से इजाजत लेकर उन बुर्जुग के पास गया और बोला, ‘लाइए, मैं आपका सामान उठा कर आपके घर तक पहुंचा देता हूं।’ बुर्जुग ने ना-नुकुर की, मगर अदनान जिद करने लगा, ‘मैं आपको रोज इतना सामान उठाते देखता हूं। आप चलते-चलते थक जाते हैं, यह देख मुझे अच्छा नहीं लगता। आप मेरे दादाजान की उम्र के हैं। लाइए, मैं आपका सामान अपनी साइकिल पर रख कर आपको घर तक छोड़ देता हूं।’ बुर्जुग ने कहा, ‘पर मेरे साथ तुम्हें पैदल चलना पड़ेगा और मेरा घर बहुत दूर है, तुम थक जाओगे।’ अदनान ने कहा, ‘कोई बात नहीं, मुझे चलने की आदत है।’ अदनान का निस्वार्थ सेवाभाव देख बुर्जुग को बहुत अच्छा लगा। उन्होंने अदनान की बात मान ली। अदनान ने बड़े-बड़े दो थैले अपनी साइकिल पर लादे और उनके साथ पैदल चलने लगा। पूरे रास्ते दोनों ने ढेर सारी बातें की। बुर्जुग ने बातों-बातों में उसके बारे में सारी जानकारी प्राप्त कर ली कि कैसे वह पढ़-लिख कर कुछ बनना और अपनी अम्मी के सपनों को पूरा करना चाहता है, मगर हालात से मजबूर होकर पढ़ाई में पिछड़ता जा रहा है। घर पहुंच कर बुर्जुग ने अदनान को बीस रुपए देते हुए कहा, ‘तुम इनसे मिठाई खा लेना।’ मगर अदनान ने मना कर दिया। वह उनसे विदा लेकर वापस चल पड़ा। फिर तो यह रोज का किस्सा बन गया। जब भी अदनान उन बुर्जुग को देखता, भाग कर उनके थैले पकड़ लेता और उसके साथ चल पड़ता। दोनों रास्ते भर बातें करते चलते। कभी-कभी कुछ देर किसी पेड़ के नीचे भी बैठ जाते। वे बुर्जुग मिट्टी कुरेद-कुरेद कर पता नहीं अदनान को क्या-क्या आकृतियां बना कर दिखाते। कभी-कभी छोटी डंडियां, डंठल, पत्थर आदि जमा कर उनसे कुछ बनाते। अदनान यह सब बड़े विस्मय से देखता। दोनों में जैसे गहरी मित्रता हो चली थी।
अदनान की परीक्षाएं निकट आ रही थीं। इस साल वह बिल्कुल नहीं पढ़ा था। उसके अब्बा और फूफी तो मान ही बैठे थे कि वह फेल हो जाएगा। मगर जब परीक्षा परिणाम आया तो शिक्षक, सहपाठी, अब्बा, फूफी सभी हैरान रह गए। अदनान ने परीक्षा में पचासी प्रतिशत अंक प्राप्त किए थे। गणित और विज्ञान में तो उसके नब्बे प्रतिशत अंक थे। किसी को विश्वास नहीं हुआ। पूरे साल न पढ़ कर भी उसने ऐसा करिश्मा कैसे कर दिखाया। बार-बार पूछने पर अदनान ने बताया कि जिस बुर्जुग व्यक्ति का वह सामान छोड़ने जाता था, वही उसे रास्ते में चलते-चलते गणित और विज्ञान के गुर सिखाते थे। यह सुन कर सभी ने दांतों तले अंगुली दबा ली कि भला कोई चलते-फिरते भी पढ़ सकता है। तभी वहां वे बुर्जुग व्यक्ति आए। उनके हाथों में मिठाई का डिब्बा था, जिसे उन्होंने अदनान के अच्छे अंक आने की खुशी में सभी बच्चों में बांटा। बुर्जुग ने अब्बा से कहा, ‘मैं गणित का रिटायर अध्यापक हूं, राम शुक्ला। तुम्हारा बेटा बहुत नेकदिल है। साथ ही यह पढ़ाई में भी बहुत तेज है। अगर इसे मौका मिले तो यह किसी भी ऊंचाई को छू सकता है। मैं इसकी पढाई-लिखाई की पूरी जिम्मेदारी लेना चाहता हूं। मैं इसे शहर के अच्छे स्कूल में भेजंूगा। जो भी खर्च आएगा वह मैं दूंगा। देखना, यह एक दिन तुम्हारा ही नहीं, पूरे गांव का नाम रोशन करेगा।’ यह सुन कर अदनान की आंखों में खुशी के आंसू आ आए। सबके समझाने पर अब्बा ने भी अपनी स्वीकृति दे दी। सभी ने अदनान को बहुत बधाइयां दी। अदनान जब आसमान की ओर देख कर अल्लाह का शुक्रिया अदा कर रहा था, तो उसे लगा जैसे उसकी अम्मी उसे देख कर मुस्करा रही हैं और कह रही हैं, ‘मुझे पूरा यकीन है मेरे बच्चे कि तुम मेरा सपना जरूर पूरा करोगे।’ अदनान के मुंह से निकला, ‘जरूर अम्मी, तुमने मेरे पास एक फरिश्ता जो भेज दिया।’
