सुरेश सेठ

महल जब खंडहर हो गए
हमने उनसे खाली हो गई जमीन पर
हरी सुनहरी पालियां उगाने की उम्मीद की।
खंडहरों पर खेती नहीं होती, बंधु,
वहां उठ सकती हैं बहुमंजिली इमारतें,
पीढ़ी दर पीढ़ी उभरती नेतागिरी का आश्रय।
स्वच्छ भारत की कल्पना,
गूदड़ बस्तियों में लावारिस हो गई।
फूहड़ता का सौंदर्यबोध
कैक्टसों की गोद में आशियाना बना बैठा।
फूल, खुशबू, तितली, बादल
नई जिंदगी के नाम पर
ओजस्वी भाषणों ने दिवंगत किए।
मुर्दा सपने इस देहावसान की अल्पना सजाते हैं।
कौओं से मरती उम्मीदों की चौरंगी भर गई,
पपीहों की बेआवाज ‘पी कहां’
आधी रात का रोमांस तलाशती रही।
जंगल कटे, अधबनी सड़कें बनीं,
मोर नाचने के लिए कहां जाएं?
काले मेघा पानी दे, की प्रार्थना
बेवक्त धारासार पानी बरसाती है।
खड़ी फसलें सिर झुका
अपने किसानों के साथ फंदा लेती हैं।
गांवों से नई पीढ़ी भाग ली,
शहरों की ओर,
सूखे नशों के अंधेरों ने उसे गोद ले लिया।
जो देश से भागे,
उनकी नियति
माल्टा नौका दुर्घटनाओं की कतार बनी।
इधर निर्वीर्य होती जवानियां
सरहदों पर दिखाए गए पराक्रमों की
वीडियो रपटों में उलझ गर्इं।
उपलब्धियों पर राजनीति की गोटियां
फिट करता रहा,
चुनावधर्मी नेताओं का बड़बोलापन।
नया सूरज उगने की कल्पना करने वाले क्रांतिदूत
सदियों पुराने अतीत की गरिमा के
गलियारों में गुम हो गए।
निरक्षर भट्टाचार्य आज की शिक्षा को
भोथरा बताते हैं।
कविता भी इस भोथरेपन से हमें बचा न सकी,
इस पर हावी हो गए रैप सांग।
बेसुरी और बेधड़क आवाज से
गाए जाते कोलाहल गीत।
इन गीतों के अंधड़ ने
कल के मुर्दा हो जाने का जश्न मना लिया।
शिक्षकों को रोबोट ने,
पुस्तकों को गूगल ने कहा,
नए युग का स्वागत करो।
शोर भारी था,
आवाज हम तक न आ सकी,
क्यों?

एक प्रेम कविता

मुझे लिखने दो एक प्रेम कविता
पहाड़ पर घिरते रूई के बादलों-सी कविता
अपनी प्रियतमा की खैर मांगने वाली कविता
उसके बालों में फूल सजाने वाली कविता
लेकिन कैसे लिखूं यह कविता?
टूटे सपनों के नाजी बूटों के तले
प्रेम कविता का एक फूल कुचला गया
आपने कहा, प्रेम करो
तुम्हें भी ‘अच्छे दिन’ आने का एहसास हो जाएगा
दिल नहीं
भूख की ज्वाला से धधकता पेट भरा लगेगा
खोजोगे अच्छा है इस देश में पढ़ना-लिखना
अधूरी शिक्षा भी तुम्हारे आगे चांदी जैसा राजपथ बिछाएगी
सारथी सोने की रथ पर सवारी के लिए बुलाएगा
लेकिन यह कविता न दे सकी
हरी घास पर क्षण भर जीने का एहसास
या अपने आप को वह पहला कवि मानना
जिसकी आह से गान उभरते हैं
चुराए हुए चुंबनों की कल्पना सहराती नहीं
बहुत पुरानी किताबों में पड़े फूल बासी हो गए
कभी मिले नहीं, खोए रहे
मिलते कैसे?
इतना बड़ा झूठा सच, कैसे मान लेते?
मेरी कविता न बना सकी
तपती रेत के टीलों को नखलिस्तान
मान लेने की आदत
रेतीले तूफानों में शतुरमुर्ग की तरह
अपना सिर छुपा लेने की आदत
प्रेम पाती लिखता हूं
प्रेमिका पत्नी-सी लगती है
उसकी झुर्रियों में इंद्रधनुष खिलता है
इंद्रधनुष के इस क्षितिज को
सच का आईना न दिखाओ
कितना सुंदर है यह झूठा सच जी लेना
प्रेमिका सागर तट पर खड़ी होकर
अलविदा कह रही है
स्टीमर से हाथ हिलाते हुए
हम किसी सेलर की तरह लगते हैं
हम इसकी दहलीज पर खड़े रहते हैं
चुंबित-प्रतिचुंबित
अपना सलीब कंधे पर लाद कर
सदियों पुरानी एक अंधेरी गुफा
की ओर बढ़ते
इस एहसास का हम कितना आनंद लेते हैं
इस जिंदगी का अकेला आनंद
प्रिय!