कविता: सूरज दादा

राजपाल गुलिया

रोज सुबह क्यों सूरज दादा,
मुझको आन जगाते हो!
मैं था गहरी निंदिया सोया,
था मीठे सपनों में खोया।
तनिक नहीं घबराते हो जी,
खिड़की से घुस आते हो जी।
बड़ी भोर में आकर काहे,
सारा तमस भगाते हो।

पश्चिम सोए पूरब जागे ,
देख घटा तुम झटपट भागे।
सदा अकेले फिरते हो तुम
छुट्टी भी ना करते हो तुम।
दूर गगन से रोज धरा पर,
आग बहुत बरसाते हो।

करके पूरा अपना फेरा,
कहां करो तुम रैन बसेरा।
भेद किसी से ना तुम कहते,
बोलो कहां रात भर रहते।
चांद सितारों को तड़के ही,
आकर दूर भगाते हो।

सर्दी गरमी से ना डरते
गरमी देकर सर्दी हरते।
हो सचमुच एक पहेली तुम,
कभी आकर मिलो हवेली तुम।
शीत लहर में खोज रहे सब,
कौन दिशा छिप जाते हो!

शब्द-भेद

तरई / तराई / तरोई

छोटे-छोटे तारों को तरई कहते हैं। तरई यानी नक्षत्र। जबकि तराई के दो अर्थ हैं। एक तो जब पानी छिड़क कर जमीन को ठंडा किया जाता है, तो उसे तराई कहते हैं और पहाड़ के नीचे के मैदानी भाग को भी तराई क्षेत्र कहते हैं। तरोई एक प्रकार की सब्जी का नाम है।

परुष / पुरुष

कठोर, कड़ा, कटु, अप्रिय, निष्ठुर, निर्दय के लिए संस्कृत में परुष शब्द है। कोमल का विलोम। जबकि पुरुष शब्द से आप सभी परिचित हैं। स्त्री का विलोम शब्द है पुरुष। पुरुष यानी मर्द।