श्रीनारायण समीर
अनुवाद भाषाओं के बीच ज्ञान के आदान-प्रदान और प्रसार के माध्यम से विभिन्न भाषाभाषी समाजों में संवाद और आपसदारी का रिश्ता जोड़ता है। इससे विभिन्न अपरिचित समाज परस्पर निकट आते हैं और उनमें संघर्ष के बजाय संवाद का सिलसिला चल निकलता है। इससे मानव समाज में प्रगति और विकास की राहें खुलती हैं। इसलिए अनुवाद भी स्वभाव से सर्जनात्मक तथा क्रांतिकारी होता है। अनुवाद के इन्हीं गुणों ने उसे अपने सरोकार में आधुनिक और संरचना में व्यावहारिक ज्ञानानुशासन बनाया है। अनुवाद के माध्यम से विश्व की सभ्यताएं और संस्कृतियां गहरे रूप प्रभावित हो रही हैं। वे आपस में जुड़ रही हैं। एक-दूसरे से रूबरू हो रही हैं। एक-दूसरे की विफलताओं से सबक लेते हुए अपनी आगे की राहें सुगम बना रही हैं। इस तरह से प्रौद्योगिकी और बाजार के मौजूदा वर्चस्ववादी समय में सभ्यताओं के बीच संवाद और सौहार्द का सिलसिला शुरू करने और विकास के पथ प्रशस्त करने में अनुवाद की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो गई है।
अनुवाद में एक भाषा-संरचना के अभिप्राय को दूसरी भाषा-संरचना में फिर से रचा जाता है। यह काम दो भाषाओं के बीच अभिव्यक्ति तथा भाव के स्तर पर संवाद और संतुलन स्थापित कर किया जाता है। इस क्रम में एक भाषा का दूसरी भाषा के साथ शब्द, अर्थ, भाव और शैली के धरातल पर अंतरण का रिश्ता कायम होता है। दो भाषाओं यानी स्रोतभाषा और लक्ष्यभाषा के बीच अंतरभाषिक पुल निर्मित होता है। अनुवाद अपनी महत्तर भूमिका में देशों और दूरियों में फैले भाषाई विविधता को पाट कर संवाद का सिलसिला शुरू करता है। आज के सूचना-विस्फोट के समय में भी यह भिन्न भाषाभाषी सभ्यताओं के बीच आपसदारी कायम करने का जरूरी जरिया है। भूमंडलीकरण और बाजारवाद के मौजूदा दौर में अनुवाद आज जितना अपरिहार्य और प्रासंगिक हो गया है, उतना पहले कभी नहीं था। पर मौजूदा परिदृश्य में यह अचानक संभव नहीं होगा। यह संभव होगा भी तो अनुवाद के माध्यम से। अलबत्ता अनुवाद को भाषाई, सामाजिक और सांस्कृतिक संपर्क का सेतु मानने वाले अनुवादकगण समय की इस मांग को अपनी साधना से बहुत हद तक पूरा करने का यत्न कर रहे हैं। परंतु संचारक्रांति और सूचनाविस्फोट के मौजूदा दौर में यह काम अब केवल मनुष्य के बल-बूते नहीं छोड़ा जा सकता। मशीन ट्रांसलेशन की जरूरत आज जितनी है, उतनी पहले कभी नहीं थी। हिंदी और समूचे भारतीय परिदृश्य की बहुभाषिकता में मशीन ट्रांसलेशन की संकल्पना जितनी जल्दी सफल होगी, भारत एक मुकम्मल सूचनासमाज और ज्ञानसमाज बन पाएगा। तभी भारत विकसित बन सकेगा। मशीन ट्रांसलेशन के विकास में काम कर रहे वैज्ञानिकों, भाषाविज्ञानियों और उत्साही अधिकारियों और अनुवादकों को इसी आशा और उम्मीद से देखा जाना चाहिए।
पिछले दिनों में मशीन ट्रांसलेशन के क्षेत्र में अनुसंधान और विकास के काफी काम हुए हैं। पर फिलहाल मशीन ट्रांसलेशन के जरिए अंग्रेजी पाठ का जो हिंदी अनुवाद सुलभ हो रहा है, उसे मुकम्मल नहीं माना जा सकता। उसे पर्याप्त कहना भी उचित नहीं होगा। मगर हिंदी में मशीन ट्रांसलेशन की अभी तक की उपलब्धि भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। मशीन ट्रांसलेशन के क्षेत्र में देश के वैज्ञानिकों और अकादमिक संस्थानों के बीच लगातार हो रहे विमर्श, अनुसंधान और कार्यशालाएं इस बात के प्रमाण हैं कि हिंदी में और अन्य भारतीय भाषाओं में मशीन ट्रांसलेशन को संभव और सफल बनाने की बेचैनी है और इस दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। इसी का परिणाम है कि अंग्रेजी से हिंदी में और कुछ अन्य भारतीय भाषाओं में मशीन ट्रांसलेशन के क्षेत्र में एक हद तक सफलता मिली है। फिर भी उम्मीद जगी है कि हमारे वैज्ञानिकों और भाषा वैज्ञानिकों के सद्प्रयास से जल्दी ही हमें मशीन ट्रांसलेशन का एक ऐसा टूल मिल जाएगा, जिससे हम अपने दिनों, सप्ताहों और महीनों के काम यथासंभव शीघ्र पूरा कर लेंगे। वैज्ञानिक प्रगति और प्रद्योगिकी की क्षमता को देखते हुए यह कोई हवाई कल्पना नहीं है। मशीन अनुवाद की सीमाओं के बावजूद, इससे दूर रहना और इसके अनुप्रयोग से बचना अब संभव नहीं है। ‘रीयल टाइम ट्रांसलेशन’ के समय में भारत के विकास और भारतीय समाज में वैज्ञानिक चेतना के प्रसार के लिए हमें विश्व की बड़ी भाषाओं में निरंतर छपने वाले वैज्ञानिक उपलब्धियों के हजारों पृष्ठों में से हमारी जरूरत के लिहाज से प्रासंगिक पृष्ठों का त्वरित अनुवाद हमें चाहिए।
अनुवाद केवल सर्जनात्मक साहित्य का नहीं होता, वैज्ञानिक और तकनीकी साहित्य का भी होता है। विकासशील समाज के लिए वैज्ञानिक और तकनीकी ज्ञान बेहद जरूरी है। इसे ऐसे साहित्य के अवगाहन से ही पूरा किया जा सकता है। विकासशील समाज में ऐसे साहित्य के अभाव को अनुवाद पूरा करता है। ऐसे में मशीन ट्रांसलेशन की भूमिका बढ़ जाती है।
भारत में अनुवाद के क्षेत्र में मांग और पूर्ति में संतुलन नहीं है। जहां तक ‘रीयल टाइम ट्रांसलेशन’ की बात है, मानव श्रम से यह कार्य संभव भी नहीं है। इसे मशीन ट्रांसलेशन द्वारा ही संभव किया जा सकता है। हालांकि मशीन ट्रांसलेशन की सफलतम स्थिति में भी, मशीन से आउटपुट के रूप में प्राप्त होने वाला अनुवाद कभी भी वैसा नहीं हो पाएगा, जैसा आदमी करता है। मशीन का अनुवाद वैसा ही होगा, जैसा मशीन का शब्दकोश और विश्लेषण-व्याकरण होगा। सर्वांग संपूर्ण होने पर भी मशीन किसी रचना की पुनर्रचना नहीं कर सकती। अनुवाद में पाठ या कथन के विश्लेषण के साथ-साथ अनुवादक के ज्ञान, अनुभव, चिंतन-मनन और कल्पनाशीलता की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। आदमी सृजन के समांतर सृजन कर लेता है। श्रेष्ठ सृजन से अपनी भाषा को संपूरित करने का साधुभाव रहा है। पर हाल के वर्षों में उपभोक्तावाद ने इस काम को गहरे रूप में बाधित किया है। प्राथमिकताएं बदल गई हैं। अनुवाद अब दोयम दर्जे का काम समझा जाने लगा है। विदेशी रचनाओं का स्वत:स्फूर्त रूप से अनुवाद करने का सिलसिला कमजोर हुआ है।
आज के वैज्ञानिक युग में भारत जैसे विशाल आबादी वाले पारंपरिक समाज की प्रगति और विकास के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी के रास्ते पर चलने के सिवा कोई दूसरा विकल्प नहीं है। लक्ष्य स्पष्ट है और साधन भी। विकास के लिए ज्ञानमार्ग पर चलने के वास्ते भारतीय समाज में वैज्ञानिक चेतना का विकास करना अपरिहार्य है। इसके लिए विज्ञान और तकनीक को साधना होगा। इनके प्रति लोगों की अभिरुचि जगानी होगी। वैज्ञानिक संकल्पनाओं की समझ विकसित करने के लिए व्यापक स्तर पर विज्ञान और अनुसंधान का वातारण निर्मित करना होगा। इस उद्देश्य से देसी भाषाओं में मूल वैज्ञानिक चिंतन तथा लेखन शुरू करना होगा। ऐसे में अनुवाद का सहारा बड़ा काम आता है। लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ने में, यानी भारतीय जनमानस में वैज्ञानिक चेतना विकसित करने तथा स्वावलंबी और आत्मनिर्भर समाज बनाने के लिए वैज्ञानिक तथा तकनीकी साहित्य को सुलभ बनाने के लिए व्यापक पैमाने पर अनुवाद का सिलसिला शुरू करना होगा। वैज्ञानिक तथा तकनीकी साहित्य के अनुवाद में यथार्थ और स्पष्टता का होना महत्त्वपूर्ण होता है। इसके उलट सर्जनात्मक साहित्य में भाषागत और भावगत व्यंजना महत्त्वपूर्ण होती है। वैज्ञानिक साहित्य के अनुवाद में मूल पाठ के शब्द-प्रयोग और वाक्य-विन्यास के प्रति तटस्थ रहते हुए उसे अनूदित भाषा के स्वभाव में ढालना आवश्यक होता है। भूमंडलीकरण के दौर में अपने आसपास तथा बाकी दुनिया में फैले ज्ञान से भी आंखें नहीं चुराई जा सकतीं। ज्ञान-शक्ति के जमाने में भारत को विकसित समाज बनाने के लिए ज्ञान से गलबहियां करना बहुत जरूरी है। इस जरूरत को पूरा करने में अनुवाद का कोई विकल्प नहीं है।

