बढ़ते अपराधों से कांपता समाज और कुछ न कर पाने की स्थिति में हम! एक समय में झूठ बोलना भी अपराध माना जाता था, मगर अब झूठ कितनी चतुराई से बोला गया कि सच और झूठ में फर्क करना मुश्किल हो गया और कभी पकड़ा नहीं जा सका, इस बात पर लोग गौरव महसूस करते हैं। हर झूठ बोलने वाला यह भी कहता है कि वह कभी झूठ नहीं बोलता। इन दिनों टीवी बहसों या आम बातचीत में अक्सर चिंता प्रकट की जाती है कि अपराध बढ़ते जा रहे हैं। मगर अपराधी क्या कहीं बाहर से आते हैं। हम और आप में से ही होते हैं। और अपने घर का अपराधी कभी अपराधी नजर नहीं आता। अपना घर तो छोड़िए, अपने मोहल्ले, गांव या कस्बे के अपराधी के पकड़े जाने पर लोग उसे बचाने निकल पड़ते हैं। मारपीट और हमला बोलते हैं। हत्याएं तक हो जाती हैं। यहां तक कि पकड़ने गई पुलिस पर भी टूट पड़ते हैं। पिछले दिनों पुलिस पर होने वाले हमलों में भी बढ़ोतरी हुई है। इसके अलावा चारों ओर नजर दौड़ाएंगे तो यह भी दिखाई देता है कि सत्ता के तमाम संसाधनों पर अमीर और ताकतवर का कब्जा होता जा रहा है। क्योंकि पैसा और ताकत हर सुख, संसाधन को अपनी तरफ मोड़ने में कामयाब होते हैं। चाहे वह राजनीति हो, फिल्में हों, मीडिया, रियल एस्टेट, यहां तक कि खेती-बाड़ी हो, साधारण आदमी की पहुंच से दूर होती जा रही हैं। मसलन, एक साधारण आदमी आज धर्मेंद्र और मिथुन चक्रवर्ती की तरह फिल्मों में शायद ही काम पाता है। यहां तक कि बड़े-बड़े काबिल अभिनेता-अभिनेत्रियां भी स्टार पुत्र-पुत्रियों, भाई-भतीजों, पत्नियों के सामने बहुत पीछे नजर आते हैं। राजनीति में भी देखिए, जहां लगभग सामंतों जैसा हाल है, किसी दल के सुप्रीमो के बच्चे सबसे आगे, बाकी सब पीछे। एक बार राजनीति में सफल हो जाने के बाद जैसे अगली सात पीढ़ियों के लिए दरवाजे खुल जाते हैं। जिन दिनों असली किसान फसलों का सही दाम न मिल पाने और कर्ज में डूबे होने के कारण भूखे मरते हों, बड़ी संख्या में आत्महत्या करने को मजबूर हों, वहीं बड़े-बड़े अभिनेता-अभिनेत्रियां नकली किसान बनते और एकड़ों जमीन खरीदते दिखाई देते हैं। ऐसे में जब आदमी मामूली रोजी-रोटी के विकल्पों से दूर फेंका जाता हो, तो अपराध नहीं बढ़ेंगे तो क्या होगा। बात गरीबी को दूर करने की होती है, मगर आदमी आखिरी पायदान पर पहुंचता ही जाता है।
अगर साधारण मनुष्य के लिए जीने की कोई जगह ही नहीं छोड़ेंगे, सिर्फ उसे सुनहरे सपने दिखाएंगे और जिन्हें उनका रोल मॉडल बताएंगे, वे अपराध की हर दुनिया में लिप्त पाए जाएंगे तो अपराध बढ़ेंगे ही। एक ओर आदमी दाने-दाने को मोहताज हो और दूसरी तरफ उसे दिखाई जाने वाली ऐसी चमकीली दुनिया हो, जिसे पाने के लिए उसे कुछ भी करना सिखाया जाता हो, तो आखिर अपराधी बनने से किसी को कैसे रोका जा सकता है।

अक्सर ऐसी सूचनाएं आती हैं कि गर्लफ्रैंड को महंगे गिफ्ट देने के लिए अपराधी बन गया या महंगा मोबाइल और लैपटाप पाने के लिए हत्या कर दी। महंगी कार में पत्नी को घुमाने के लिए बड़ी कार चुरा ली। कर्ज चुकाने के लिए लूटपाट करने लगा। जिनका अपराध का कोई रिकार्ड नहीं है, ऐसे पहली बार अपराध करने वालों की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है। यहां प्रेमचंद का उपन्यास गबन याद आ सकता है, जहां पत्नी को नौलखा हार दिलवाने के लिए पति गबन करता है।

बचाव का तिकड़म

बल्कि जिन लोगों पर देश को चलाने की जिम्मेदारी डाली जाती है, वे क्या करते हैं। अपने दल से जुड़े अपराधी को हर तर्क और कुतर्क से बचाते हैं। अतीत से लेकर उन्नाव की घटनाओं तक हम यही देखते आए हैं। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में हुए दंगों के खिलाफ गुहार लगाने वाले आज भी न्याय के इंतजार में हैं। जब न्याय आसानी से न मिलता हो, देश में लंबित पांच करोड़ मुकदमों में हमारा भी एक मुकदमा शामिल हो गया हो और न्याय की आस में हो सकता है कई पीढ़ियां गुजर जाएं, तो भला अपराधों को बढ़ने से कैसे रोका जा सकता है। अपराधी अगर पकड़े भी जाएं तो कानूनी प्रक्रिया इतनी लंबी है कि कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाते और वकीलों की फीस भरते, आदमी हलकान हो जाता है। और न्याय फिर भी कहीं दूर खड़ा दिखाई देता है। आजकल पीड़ित के पक्ष में जो धरना-प्रदर्शन होते हैं, लगभग उसी अनुपात में अपराधियों को बचाने के लिए भी लोग निकल आते हैं। अपराधी को किसी देवता की तरह पेश करके लोगों और मीडिया की राय बदलने की कोशिश की जाती है। हाल ही में इस तरह की घटना उन्नाव में हमने देखी, जहां अपराधी के पक्ष में नारे लगाने लगे। बड़ी संख्या में उपस्थित महिलाएं कहने लगीं कि अगर भैया जी नहीं होंगे तो हमारी इज्जत की रक्षा कौन करेगा। यही नहीं, अपने देश में पुलिस, प्रशासन, अपराधियों का गठजोड़ जमीनी हकीकत की तरह हर जगह दिखाई देता है। हाल ही में जिस तरह एक नेता का वीडियो वायरल हुआ, जिसमें सलमान खान की किसी फिल्म की तरह वह पुलिस वाले से कहता है कि मैं अपने दुश्मन को बता कर मारता हूं। भागलपुर कांड तो याद ही होगा, जहां पुलिस ने अपराधियों की आखें फोड़ दी थीं और पुलिस के समर्थन में बड़े-बड़े प्रदर्शन हुए थे। ऐसा लगता है कि जैसे लोगों का विश्वास कानून से हटता जा रहा है। तभी तो ऐसा होता है कि अपराधी को किसी जांच-पड़ताल के बिना सरेआम फांसी देने की मांग की जाती है या लोग कई बार उसे पीट-पीट कर मार डालते हैं। आखिर ऐसा क्यों हुआ है, यह सोचने की बात है। शायद इसलिए कि लोगों को लगता है कि कानून अपराधी को सजा नहीं दे सकता, इसलिए वे ही दे दें। त्वरित न्याय कर दें। अपराधी खत्म तो न कोर्ट- कचहरी के चक्कर, न गवाहों की चिरौरी-मिन्नत। आखिर लोकतांत्रिक मूल्यों में लोगों की इतनी अनास्था क्यों पैदा हो रही है। जिन कंधों पर इस लोकतंत्र को चलाने और बचाए रखने की जिम्मेदारी है, उनकी सोच बस इतनी क्यों रह गई है कि आदमी के वोट को अपनी सत्ता प्राप्ति का पुर्जा भर समझो और इस्तेमाल करने के बाद कूड़ेदान में फेंक दो। इसीलिए तो ऐसा है कि जीतने के बाद दलों को इस पुर्जे की याद पांच साल बाद ही आती है। जीतने से पहले बड़े वादे किए जाते हैं, जो सत्ता की तीखी चमक में हर बार भुला दिए जाते हैं। बल्कि हर कोई अपराध मुक्त समाज और देश की बातें करता है मगर देखा यह जाता है कि सभी राजनीतिक दल अपराधियों को बड़ी संख्या में टिकट देते हैं। क्योंकि उन्हें लगता है कि उन्हीं के सहारे चुनावी नैया को पार लगाया जा सकता है। अपराधी बड़ी संख्या में जीत कर भी आते हैं। इसे देख हंसने का मन करता है कि जो खुद अपराधी हैं, जो अपराध के रास्ते ही राजनीति में सफल हुए हैं, वे अपराधियों के खिलाफ कानून बनाएंगे, मोर्चा खोलेंगे। यह सोच कर हैरत भी होती है कि जो लोग विभिन्न अपराधों के मामलों में लिप्त हैं, उन्हें आखिर लोग चुनाव कैसे जिता देते हैं। वे इतने मत कैसे प्राप्त करते हैं। कई बार तो रिकार्ड तोड़ देते हैं। या कि पार्टियों की तरह लोगों की सोच भी यही है कि अपराधी है, तो क्या हुआ हमारा काम तो करेगा।

विरोध का बदला स्वरूप

आज के इस दौर में जब तकनीक ने लोगों के लिए दुनिया के सारे दरवाजे खोल दिए हैं, ज्ञान पर अब किसी का एकाधिकार नहीं रह गया है, वहां अपराध को धर्म से भी जोड़ा जा रहा है। जैसा कि कठुआ बलात्कार मामले में हुआ और अन्य बहुत से ऐसे मामलों में होता है। वैसे यह रिवाज सालों से चल रहा है। जो पकड़ा जाता है उसके समर्थन में उसके धर्म, जाति, बिरादरी के लोग जमा हो जाते हैं और वे कहने लगते हैं कि वह तो ऐसा हो ही नहीं सकता। वैसे कहते हैं कि अपराधी का न कोई धर्म होता है, न जाति होती है। अपराधी, अपराधी होता है और उसे कानून के अनुसार सजा मिलनी चाहिए। हालत यह है कि अपराध को आज इतना आकर्षक बना दिया गया है कि बच्चे और किशोर तक बड़ी संख्या में अपराधी बनने लगे हैं। लड़कियों और महिलाओं के प्रति भी ये अपराध करने से नहीं चूकते। पकड़े जाते हैं तो कम उम्र होने के कारण छूट जाते हैं। और बहुत-सी घटनाओं में देखा गया है कि छूटते ही फिर अपराध करते हैं। मुंबई में एक नौ साल का बच्चा बलात्कार के मामले में पकड़ा गया था। आखिर इस बच्चे को इसका खयाल कैसे आया। किशोरों के अपराध संबंधी आंकड़े बताते हैं कि किशोर न्याय अधिनियम का लाभ उठा कर अपराधी इन्हें अपराध की दुनिया में धकेलते हैं। ये लूटपाट, हत्या और बलात्कार के मामले में बड़ी संख्या में पकड़े जाते हैं।
लड़कियों और महिलाओं के मामले में ऐसा लगता है जैसे अपराधों की बाढ़ आ गई है। हालांकि जांच एजंसियां कहती हैं कि इनकी रिपोर्टिंग बढ़ी है, मीडिया में खबर आने लगी है, इसलिए ऐसा लगता है कि मामले बढ़ गए हैं। लेकिन लड़कियों के प्रति अपराध करने वालों को अक्सर पुलिस-प्रशासन का सहयोग मिलता है, जैसा कि उन्नाव के मामले में हमने देखा। पुलिस ने अंत तक आरोपी विधायक को बचाने की कोशिश की और कहा कि सीबीआइ ही विधायक को गिरफ्तार करेगी।

अपराधियों के हौसले

सिर्फ पुलिस प्रशासन नहीं, कई बार अपने घर वाले भी लड़कियों का साथ नहीं देते। दिल्ली में अठारह साल की एक लड़की ने अपने माता-पिता के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई कि 2017 में दो आदमियों ने उसके साथ बलात्कार किया। उन्हें गिरफ्तार भी किया गया। उनमें से एक जमानत पर छूट कर आया और उसने माता-पिता से कहा कि बीस लाख रुपए ले लो और बलात्कार का मामला वापस ले लो। माता-पिता इस बात के लिए फौरन तैयार हो गए। एडवांस मांगने लगे। लड़की ने कहा कि वह अपने कमरे में सारी बातें सुन रही थी। उस अपराधी के जाने के बाद लड़की ने माता-पिता से पूछा तो वे उस पर मामला वापस लेने के लिए दबाव बनाने लगे। उन्होंने उसे पीटा भी। उसके बाद कोई आया और माता-पिता को पांच लाख रुपए दे गया। अब पुलिस माता-पिता के खिलाफ कार्रवाई कर रही है। अब तो अपराधियों के हौसले इतने बुलंद हैं कि कठुआ, एटा, सूरत में छोटी-छोटी बच्चियों से बलात्कार करके उनकी हत्या कर दी गई। जिससे कि अपराधी कभी पहचाने ही न जा सकें। इसीलिए मांग की जा रही है कि बच्चियों से बलात्कार करने वालों को फांसी की सजा सुनाई जाए। राजस्थान, मध्यप्रदेश और हरियाणा की सरकारें ऐसे कानून पास कर चुकी हैं। जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती भी ऐसा कानून लाने जा रही हैं। लेकिन किसी भी अपराध के लिए फांसी देने से अपराधों में कमी आई हो ऐसा दिखाई नहीं है। वरना जिन देशों में फांसी के कानून हैं वहां ऐसे अपराधों को खत्म हो जाना चाहिए था। मगर ऐसा हुआ नहीं है। दरअसल, कानूनों का मुंह जोहने के मुकाबले मानसिकता बदलने की जरूरत है। गांवों में खाप पंचायतें तो अपने यहां अक्सर ऐसे निर्णय सुनाती ही रहती हैं जहां अपराधियों को पांच जूते मारकर या माफी मांग लेने भर से छोड़ दिया जाता है।

अपराधी के प्रति आकर्षण

बड़े अपराधी अक्सर सेलिब्रिटी भी हो जाते हैं। वे जेल में हर सुख-सुविधा का लाभ उठाते हैं। और तो और अपराधियों को बिग बॉस की तरफ से भी निमंत्रण भेजा जाता है। अपराधी बबलू श्रीवास्तव की आत्मकथा हाथों हाथ बिकती है। एक जमाने में चार्ल्स शोभराज की फैन बड़ी संख्या में महिलाएं हुआ करती थीं। फिल्मों में तो हम अक्सर ऐसा देखते हैं कि दादाओं पर लड़कियां जान छिड़कती हैं। तो आखिर ऐसा क्यों है कि अपराध करने वाले इतने आकर्षक लगते हैं। मनोवैज्ञानिकों की मानें तो ताकत कमजोर को हमेशा लुभाती है और अपराधी हत्या लूटपाट करके अपनी ताकत का प्रदर्शन ही कर रहे होते हैं। इसके अलावा अगर हिंसा बार-बार दिखाई जाए, हर पल हमारे जीवन का हिस्सा बना दी गई हो, तो हिंसा की भयानकता और डर खत्म हो जाता है। वह आकर्षित करने लगती है। कहीं हमारा समाज इसी आकर्षण की चपेट में तो नहीं।

अपराध-दर-अपराध

’बलात्कार के मामले में चार में से एक अपराधी को ही सजा हो पाती है। हालांकि पुलिस की मानें तो बलात्कार के दस मामलों में से चार झूठे होते हैं।
’सन 2016 में अदालतों ने 136 मामलों में मृत्युदंड की सजा सुनाई। उसी साल तीस हजार हत्याएं हुर्इं।
’2016 में 38,947 बलात्कार के मामले सामने आए।
’अमेरिका में एक साल में बलात्कार के एक हजार मामले सामने आए। इनमें से तीन सौ में शिकायत दर्ज कराई गई। और सजा हुई सिर्फ छह को।
’राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार 2016 में 19,765 बच्चे अपराधों का शिकार हुए। 2015 से ये बयासी प्रतिशत अधिक थे।