रामकुमार कुंभज
इस जीवन से उस जीवन तक

अगर सब सच कह दिया जाए तो
और अगर सब सच सुन लिया जाए तो
अगर सब सच लिख दिया जाए तो
और अगर सब सच पढ़ लिया जाए तो
तो… तो… तो…
तो बढ़ जाते हैं मित्र खो देने के खतरे
मैं चाहूंगा कि ये खतरे बढ़ें
मैं चाहूंगा कि ये खतरे और-और हों खतरनाक
मैं ये खतरे उठाऊंगा
मैं ये खतरे बढ़ाऊंगा
मैं रचूंगा ये खतरे
मैं बनूंगा ये खतरे
गर्दन पर, जुबान पर, जीवन पर, फिर चाहे जितनी हों
तलवारें, तोपें, बंदूकें, रायफलें
सिर्फ सच सुनूंगा और सिर्फ सच सुनाऊंगा
बशर्ते कि सुना जाए सचमुच सच
बशर्ते कि बुना जाए सचमुच सच
बशर्ते कि रचा जाए सचमुच सच
कहते हैं लोग
कि सच सुना नहीं जाता है आजकल
कहते हैं लोग
कि सच बुना नहीं जाता है आजकल
कहते हैं लोग
कि सच रचा नहीं जाता है आजकल
और यह भी, यह भी कहते हैं लोग
कि सच से बचना चाहते हैं लोग आजकल
और यह भी, यह भी कहते हैं लोग
कि सच रचने से बचना चाहते हैं लोग आजकल
और यह भी, यह भी कहते हैं लोग
कि सच बनने से बचना चाहते हैं लोग आजकल
और कहता हूं मैं कि जो सच इस जगह का
रहे इसी जगह तो है बेहतर
सच का नहीं होता है तबादला
सच का होता ही नहीं है तबादला कभी भी, कहीं भी
वे कुछ, जो हैं असंतुष्ट आजकल
आजकल के सच से
सुन ही नहीं पाते हैं
पढ़ ही नहीं पाते हैं
देख ही नहीं पाते हैं
सच में, सच की गतिविधियां
कि वह एक सच ही है
जो सर चढ़ कर बोलता है बेलगाम
कि वह एक सच ही है
जो मदमस्त हाथी से भी डरता नहीं है
कि वह एक सच ही है
जो लड़ता है खूखार बर्बरता तक से
सच सिर्फ वह और वही नहीं है
जो सुना दिया गया या दिखा दिया गया है
सच्चा सच तो वह है जो छुपा लिया गया है
फिर भी कहूं सच-सच तो सचमुच-सचमुच
सच यही है एक सीधा-सीधा
कि सच का सिर सिर्फ एक
झूठ के हजार
फिर भी कहते हैं लोग कि सच सुना नहीं जाता
फिर भी कहते हैं लोग कि सच बुना नहीं जाता
फिर भी कहते हैं लोग कि सच लिखा नहीं जाता
फिर भी कहते हैं लोग कि सच पढ़ा नहीं जाता
पूछता है कवि अकेला उठाते हुए खतरे तमाम
सच के पक्ष के
कि अगर सचमुच सच सुना नहीं जाएगा
तो क्या कहा भी नहीं जाएगा?
इस बीच-राह खतरे हैं बहुत
मैं उठाऊंगा खतरे और मारा जाऊंगा तो भी
हर्ज नहीं कि कहूंगा फिर भी सच ही
इस जीवन से उस जीवन तक

शायद इसीलिए
शायद इसीलिए
कि सच सुना नहीं जाता है आजकल
तो शायद इसीलिए
कि सच कहा नहीं जाता है आजकल
तो शायद इसीलिए
कि सच रचा नहीं जाता है आजकल
तो शायद इसीलिए
कि सच बोला नहीं जाता है आजकल
तो आखिर सच का सच क्या है
क्या यह कि सच बोला जाए तो सुना जाए
या फिर यह कि सुना जाए तो ही बोला जाए
और एक सचमुच की सच्चाई यही है इन दिनों
कि कुछ इस तरह भी कम होते जाते हैं
सच बोलने वाले ०