माह जून में आते हैं
फिर नभ पर छा जाते हैं
तपती जलती धरती पर
छम छम जल बरसाते हैं

नदी ताल भर जाते हैं
झींगुर गुनगुन गाते हैं
सड़कें नदियां बन जातीं जब
बच्चे नाव चलाते हैं

शाला न जा पाते हैं
खूब पकोड़े खाते हैं
छत पर देखें वर्षा को
खड़े खड़े मुस्काते हैं


हंसें हंसाएं
मौज मनाएं
सबके दुख को
दूर भगाएं

फूल खिलाएं
जग महकाएं
कांटे चुनचुन
दूर हटाएं

दर्द भुलाएं
खुशियां लाएं
भेदभाव को
दूर भगाएं

पढ़ें पढ़ाएं
नाम कमाएं
सारे जग पर
खुद छा जाएं


सुबह सबेरे जब आएगा
सारे जग को चमकाएगा

सोता बच्चा जग जाएगा
सुमन गंध फैलाएगा

जो सोता ही रह जाएगा
वह फिर पीछे पछताएगा

(तारा निगम)