शीला पांडे
सुनाना ना! मजबूरी
चुनमुन की फुलवारी से भी
राजा जी की क्यारी से भी
खुशबू सारी घर लाई हूं
मधु की शीशी भर लाई हूं
तन-मन मेरा खिला-खिला
मैं बांटू सबको हिला-हिला
दादी चखती है चुंबन में
खन-खन करती हैं कंगन में
नानी हंसती आंगन में से
प्यार लुटाती है तन-मन से
भौरों, तितली से यारी है
वो निनकी कितनी प्यारी है
मस्ती सारी ढेर जिया जो
झूला-झूला, रेस किया जो
महकी-महकी हवा पगी वो
मंद-मंद मुस्कान जगी वो
सबमें आकर घुले-मिले हैं
सबके मन में बाग-खिले हैं
बाग-बगीचे बहुत जरूरी
नहीं! सुनाना ना!! मजबूरी!!!!
वो दिन याद बहुत आते हैं
खेत हरे, खलिहान भरे हों
फसलों से जब धान झरें हों
मछली ताल-तलैया भी वो
बगुला बड़ा खेलैया भी वो
गांवों की पगडंडी देखंू
चूल्हे-दाल की हंडी देखूं
दरवाजे पर गइया भी वो
पकड़े देवकी मइया भी वो
गिब्बी जो बचपन में खेली
आम गिरा जो झिनकी ले ली
गमछा, लाठी कांधे ताने
विरहा, ठुमरी सुर में ठाने
आगे काका, पीछे आजी
दो-दो भेली गुड़ की ताजी
हाथों में धर कर आते हैं
वो दिन याद बहुत आते हैं।

