वक्त आ गया !

वक्त आ गया
अब क्या हो?…
बदला वक्त, जमाना बदला
बदली बदली तस्वीरें हैं
अपनों में यह कौन ‘दूसरा’
देख अचंभा होवे है
इंसानों की बस्ती है यह
मगर लगे हैवानों की
लूट-पाट, कत्लो-गारत में
शहर लगे बेगाने हैं
रफ्तारों के तेज भंवर में
ठहरा-ठहरा सब कुछ है
एक हादसे में क्या उलझा
दोस्त हुए बेगाने हैं
डरे-डरे सहमे से चेहरे
निडर न कोई दिखता है
सरेआम दहशतगर्दी है
भीतर पसरा सन्नाटा है
बीत गई उमरां-
आ बैठा हूं नदी के किनारे
बाबा फरीद की देह कि मेरी
‘कंबणी’ लगी, नए शबद का राग छेड़ते
वक्त आ गया
अब क्या हो?

किरदार निभाते हुए

यह क्या-
मैं ही था क्या
साइक्लोन की हजारों तरंगों के घात-प्रतिघात को झेलता
अपनी चेतना के रूबरू
देह और आत्म के बीच की खाई के
निविड़ एकांत में
खुद को देखता
किरदार में उतरता
जैसे कोई गोताखोर समुद्र की अतल गहराइयों में उतरे
साथ ही देखता चले खुद को
हिलोरे लेती मछली हाथ में लिए बाहर आता
और मुझे लगे तोड़ता-फोड़ता कोई
पसर रहा रग-रग में
अजानी सी ध्वनियों के साथ मुझे लांघता
पार जाता
मैं देखने लगा-
खामोशी की आंच में पिघलते-बदलते
स्वयं को कई रूपों में
और सुनने लगा
गहन निस्तब्धता में
बेआवाज-सी एक डुबकी
‘छप’ की आवाज और पहचान के रेशे-रेशे में
घुलती-गुनगुनाती शिलाएं
एक सपने में
जैसे मैं हूं, मैं नहीं हूं
किरदार निभाते हुए! ०