अंधेरा
मुझे क्यों कोस रहे हो आदमी
मैं तो सहज भाव से
रात के संग आता हूं, जाता हूं
तुम्हें कहीं जाना होता है
तो कोई न कोई रोशनी जला कर
रास्ता देख लेते हो और चलते जाते हो
लेकिन तुम
अपने भीतर के अंधेरे को क्यों नहीं देखते
जो मुझसे कई गुना बड़ा है
इसमें रास्ता पाने के लिए
तुम्हारे पास विवेक का जो चिराग है
उसे कभी नहीं जलाते
तुम्हारे अनजाने ही
तुम्हारा अंधकार तुम्हें भटकाता फिरता है-
इस रास्ते से उस रास्ते तक
और तुम कितने ही लोगों पर
गिरते पड़ते हो और उन्हें आहत करते हो।

घर से भागे हुए
वह घर से सफर के लिए निकला
तो जेब में थोड़ा चबेना भर लिया था
थकावट से रास्ते में कहीं आंख लग गई
आंख खुलने पर खाने के लिए जेब में हाथ डाला
तो चबेने की जगह गोलियां हाथ में आ गर्इं
उसने देखा-
कुछ दूर खड़े कुछ बंदूकधारी
मुस्करा कर इशारों से उसे बुला रहे थे
और हाथ में बड़े-बड़े नोट लहरा रहे थे
वह डर कर अपनी मंजिल की ओर भाग चला
वह सोच रहा था कि
ये सब अपने घर से भागे हुए लोग हैं।

नदियां
नदियां उमंग से बहती जाती हैं
सागर से मिलन का सपना लिए हुए
नदियों का वह संगीत
जो फसलों, पेड़ों, पंछियों, मनुष्यों के बीच से
गुजरता था, उन्हें गुंजित करता हुआ
तटों पर सिर पटकते समुद्र के शोर में
मिल जाता है
नदियां हमारी मां हैं
सौंदर्य हैं, पूजा हैं, संगीत हैं, उत्सव हैं
उनका अस्तित्व गांवों की जिंदगी है
लेकिन जब वे सागर में मिल जाती हैं
तब फैल जाती हैं इस दिशा से उस दिशा तक
खारा जल बन कर
वे किसी और की क्या प्यास बुझाएंगी
खुद ही प्यासी प्यासी फिरती हैं
कितना दुखद होता है
महान में मिल कर अपना अस्तित्व खो देना। ०