बोधिसत्व

हर नदी अष्टधातु स्त्री है

हर नदी अष्टधातु से
ढली एक स्त्री है।
जो अनादि युग से
खेत वन बाग
पर्वत कंदरा शमशान
सबके दुख अपनी कोख में
लेकर बहती है।
लेकिन मछलियां जानती हैं
कि नदियां अपना
एक-एक बूंद जल
चिड़ियों और गिलहरियों के लिए
बचा कर रखती हैं।
नदियां दिन में वृक्षों
और रात में नक्षत्रों
के लिए लोरी गाती हैं
और संधि बेला में
सूर्य को देख कर
और तरल हो जाती हैं।
जो लोग
नदी को पूजते हैं
और स्त्री को
निर्दाह जलाते हैं
नदियों के आख्यानों में
वे लोग शव कहलाते हैं।

नदी से मिलना

पृथ्वी जितनी फटी पुरानी
और आकाश जैसी जीर्ण विदीर्ण
नीलवर्णी नदी से मिला
दरअसल
मैं एक मुंह छिपा कर सुबक रही
सदी से मिला।
फिर मैं हजारों वर्ष चल कर
एक रात जब अपने घर आया
ठीक उसी नदी को
अपने आंगन में
बिलख-बिलख कर बहती पाया।
मुझे कुछ समझ न आया
नदी की जिस व्यथा को व्यर्थ मान
बाहर बहता सुबकता छोड़ दिया
उसी नदी ने कैसे
मन आंगन में घर कर लिया?

पहेली उर्फ दो बकरियों की वार्ता

दो बकरियां एक महान चारागाह कहीं
चर रहीं थीं
पहली बकरी ने कहा दूसरी से
देखना
‘एक दिन ऐसा आएगा
शेर निर्बल होकर
संत तो हो जाएगा’
दूसरी बकरी ने कुछ सोच कर कहा
‘देखना फिर भी वो
मांस ही खाएगा
मांस ही भोग लगाएगा’
पहली बकरी बोली
‘फिर किसका मांस
उसके हिस्से आएगा?’
दोनों बकरिया एक प्राचीन पहेली में
उलझ कर चुप हो गर्इं
अब कौन उनकी
यह पहेली सुलझाएगा? ०

ओ पिता मुझ पर अपनी निगाह रखना

हर साल हर माह
हर दिन हर सप्ताह
प्रतिपल हर क्षण
केवल एक चेहरा खोजता हंू
विलपता हंू कलपता हंू
ओ पिता!
ओ पिता!
तुम्हारी जय पराजय की कहानी हूं
तुम्हारे अपार जल में
एक बूंद पानी हूं
तुम जहां हो
हो या नहीं हो
मुझ पर हर पल
नम्र निगाह रखना
मुझे अपनी पसलियों के पास
अपनी छांह रखना।