शोभा सिंह
इंतजार
प्यास जब
गहराई में उतरती
धूप जब सरक कर
अंतिम दीवार पर
पुरानी संकरी गली में
पता पूछती है स्त्री
वसंत के लिबास में
गुजर गए दिन का
बराबरी, आजादी के
उद्घोषकों का
अधडूबी
बर्फीली चट्टान-सी
तूफानी लहरों में
अपने को फेंकती
फिर लौटती
यादों की झोली समेटे
सवाल पूछती
अफसोस के साथ
कब तक और क्यों जीये वह
धुनकी पर
धुना है अपने को
रूई का रेशा-रेशा
उसका आकाश
भर गया।
एलबम देखते हुए
हॉल की
खाली कुर्सियों-सा
अकेलापन
खामोश चित्र-सी युवती
अपलक निहारती
खिड़की से वसंत
गहरे जल में उतरती
स्मृतियां
सामने खुला है एलबम
दर्द की सुइयां
आह जीवन के पन्ने
यूं ही खुले
समय और सरहद से परे
कितना वक्त
बीत गया
अंधेरे की सिसकियां
कितने सहयात्री
अतीत के धुंधलके में
खो बिछड़ गए
है कोई सुरक्षित मंत्र
इस एलबम में
फिर से जान फूंके
लम्हे लम्हे के लिए
ही सही
क्या
नदी पीछे लौटती है
फिर से जी लेना
संभव नहीं
कंधे दर्द के बोझ से
झुक जाते हैं
गुजरा वक्त
तस्वीरों से ठहरा, ठिठका
सुरक्षित है
खाली फ्रेम की आत्मा
उदास
समय की सरसराहट
तन पर झेलती है
उजड़े रंग-रूप का दंश
हाय कैसा मारक!
