दिविक रमेश

खुद ही मान गया हूं खुद से

किसी को क्या दोष दूं ?
कोई चुभाता हो या नहीं
पर चुभ जाता है।

चुभने पर
कोई डर जरूर है भीतर
जो नहीं होने देता अभिव्यक्त।

सिमट कर अपने भीतर
बैठा रहता हूं मानो अनंत काल तक।
गले के नीचे
कुलबुलाती रहती हैं शब्दों की आत्माएं कब्रों में।

बस
औपचारिक भर रह जाते हैं
प्रश्नों के उत्तर।
फिर धीरे-धीरे
तिरोहित होने लगते हैं
खुद से किए गए वादे।

पाता हूं
कि खुद ही मान गया हूं
खुद से।

खुद ही कर दिया है माफ
बिना किसी के
माफी मांगे।

और किसी को
हवा तक नहीं लगी
इस बात की
जरा भी।

जूं तक नहीं रेंगी किसी के कान पर।

जरूर मैं बूढ़ा हो गया हूं-
हर ओर से जैसे मैं
सुन रहा था
आती आवाजें
ऐसी ही।
छोड़ो जिद
मैंने पूछा दोस्त से
क्या सचमुच बहुत दृश्यमान हो गया हूं मैं-
किसी की भी राह पर
हर कहीं दिखता,
अटकता!

और क्या सचमुच अदृश्य रहता है मेरा
कुछ भी किया काम
करता हूं जिसे पूरी निष्ठा के साथ
भाग-भाग कर,
हांफ-हांफ कर!

किसने कहा?
सवाल दोस्त का था।

अब किस-किस का नाम लूं
लगता है
पूरा घर ही समझने लगा है ऐसा।

तो मित्र
छोड़ो जिद
और मान लो
कि अब बूढ़े हो गए हो! ०