आरती तिवारी
मिट्टी के लोग
वे जन्मे थे इसी मिट्टी के सोंधेपन से
इसी में घिसटे और चले
घुटैंया घुटैंया
मटकों का पानी पीकर
हुए तृप्त उनके बचपन के खेल
इसी के बने घुल्ले दौड़ाए
पोला के हाट में
इसी के कल्ले पर बनी रोटी का स्वाद
भिगाता रहा मसें
खिलता रहा केशौर्य
याद करके इसी माटी के घरघूले
और बरखा की पहली बूंदों को
छक कर सांसों में भरते भरते
बौराने लगा यौवन
उनीदी आंखों में समाने लगे
मौलश्री के ताजे टटके फूल
माटी के चबूतरे पर बैठ
निहारीं कितनी पनिहारिने
और इसी माटी में गुम हो गए
जाने कितने कुंआरे सपने
और ऐसे ही जीते जीते एक दिन बिला जाएंगे
हम लोग भी मिट्टी में
पर बची रहेगी यह कविता
जिसमें गंध है विचार की
जिसमें प्यार है मित्रों का
जिसमें मिट्टी का ही जिक्र है
चलते चलते
उसने मुड़ कर देखा
देहरी और दरवाजे को
मानो सौंप चली हो
उन्हें ही दायित्व
मेरे बुढ़ापे का
मेरे कंधों से नीचे
ढुलक न जाए शाल
पैरों में मोजे हैं या नहीं
और मुड़ती हुई
उसकी परछार्इं में
मैंने भी देखा
ले चली है वचन भैया से
भागदौड़ से मुझे
दूर रखने का।
भावज से मनुहार करती
हिचकियां ले रोई थी
जिद करके मुझे समय पर
खिलाने को दो रोटी
धूल के गुबार में
गुम होती लेती गई
कितनी ही चिंताएं
चलते चलते मेरी बिटिया ०

