उषा राय 

सपनों की जमीन

कीचड़ में
र्इंट रखती लड़की
रास्ता बनाती है,
उस जगह में भी
जहां से गुजरते हुए
डर लगता है।
पांव के नीचे की र्इंट से
बिना दरवाजे वाले घर में
चूल्हा जल उठा है
कुत्ते और बिल्लियों का
बेरोक-टोक हिस्सा लेने
के लिए आना जारी है
बारहो महीने कीचड़ ही
रहता हो जहां,
वहां र्इंट भर सूखेपन में
सपनों की जमीन बनाती है
लड़की।

डर

डर इंसान को
बचाता नहीं केवल भगाता है।
कभी-कभी बड़ा डर
पीढ़ी दर पीढ़ी डराता है
जैसे सुनहरे दीये के बुझ जाने का डर
बहुत बड़े राज के खुल जाने का डर।
डर वह करवा देता है
जो उसे नहीं करना चाहिए,
जैसे झूला झूलता बच्चा डरता है
अचानक झूले से नीचे कूद जाता है
सिसकती लड़की जहर खाती है ,
नीम अंधेरे में शिशु को छोड़ कर।
जीवन भर ब्लैकमेल होने से
अच्छा है एक बार
लानत मलानत सह लेना
चरित्र प्रमाण पत्र
असल जिंदगी में नहीं
केवल हलफनामे के काम आता है।
डर इंसान को
बचाता नहीं गुलाम बनाता है।
गुलामों की तरह
मरने का मतलब
अगर धीरे-धीरे मरना है तो
डरने का मतलब भी
उनके हाथों मारा जाना ही होता है।

अहिल्या

एक थकी रात के
निचाट सपनों में आई
नहाई धोई-सी अहिल्या
दिव्य सौंदर्य से दिपदिपाती
चिहुंक कर उठ गई
चारों तरफ देखने,
हांफने और सोचने लगी।
कि पुराणों से निकल कर
कभी भी आ सकती है
वह धोखे की रात और
तिरस्कार का दिन
जब घटेगी कोई घटना
बेहद मामूली-सी और
दुनिया हो जाएगी पुरुषमय
डरती हूं प्रणाम की मुद्रा में
खिलखिला पड़ती हैं
हंसती हैं वे खूब हंसती हैं।
पूछती हूं होकर अधीर
क्या यह सब सच है?
मैनें तो कुछ भी नहीं कहा।
तो फिर ये किताबें
बातें और कहानियां
ये सब किसने कहा?
यही तो बात है कि
सच को तुम खोजो और गढ़ो
अपने लिए अपनी जैसी अहिल्या। ०