नशे की लत से सिर्फ पंजाब ही नही बल्कि दूसरे कई राज्यों में भी जड़ जमा चुका है। झारखंड भी नशे की वजह से बर्बादी के कगार पर है। इसका एक बड़ा कारण है यहां के आदिवासी समाज में शराब का प्रचलन। आदिवासी अपने को पिलचू हाड़ाम और पिलचू बूढ़ी की संतान मानते हैं। उनकी पूजा-अर्चना शराब के बिना नहीं होती। आदिवासी प्रसाद के रूप में उन्हें लेते हैं। आदिवासी टुसू पर्व, करमा पर्व, सोहराय,माघ पूजा, जांथार पूजा, हरियार पूजा, छठियार पूजा और शादी-विवाह के अवसर पर देशी शराब का सेवन करते हैं। पूजा पर्व के अवसर पर कबूतर और मुर्गा के साथ देशी शराब का भोग लगाना एक आम बात है।
यहां के आदिवासी परंपरागत रूप से चावल से बने शराब जिसे ‘पोचय’ कहा जाता है और महुआ के शराब का सेवन करते रहे हैं। संथालों के देवता मारांग बुरू, जाहेर ऐरा, गोसांय ऐरा, मारांग ठाकुर सहित कई देवताओं को शराब अर्पित करते हैं। परंपरानुसार गांव के बीच स्थित मांझी थान में मांझी हाड़ाम और मांझी बूढ़ी की पूजा की जाती है। परंपरानुसार हर एक आदिवासी गांव में मांझी थान और जाहेर थान होता है। प्राचीन काल में आदिवासी अपने इष्टदेव मारांग बुरू के दिशानिर्देश पर जड़ी बूटी जंगल से लाकर देशी शराब बनाते थे और पांच दिनों तक पत्ता का दोना बनाकर ढंककर रखते थे और पूजा के अवसर पर प्रसाद के रूप में उसे लेते थे। कालांतर में बनाने की विधि में सुधार हुआ।
झारखंड में एक कहावत बहुत ही मशहुर है-सूर्य अस्त, झारखंड मस्त। महुआ झारखंड, ओड़िशा और छत्तीसगढ़ में बहुत अधिक मात्रा में पाया जाता है। जाहेर थान और मांझी थान के दिसोम पुरोहित बालेश्वर हेम्ब्रम बताते हैं कि संथाल समाज में परंपरागत रूप से देशी शराब को प्रसाद के रूप में देवता को अर्पित करना और प्रसाद ग्रहण करने की परंपरा रही है। मारांग बुरू ने सर्वप्रथम इस परंपरा की शुरूआत की थी जो आज भी चली आ रही है।आज भी इष्ट देवता को सखुआ के पत्ते में देशी शराब अर्पित किया जाता है, जिसे चोडोर कहा जाता है। इस संबध में नायकी सनातन सोरेन बताते हैं कि आदिवासी पिलचू हाड़ाम और पिलचू बूढ़ी के संतान हैं। उन्होंने ही सृष्टि की रचना की और आदिवासी परंपरा से बंधे होने के कारण वे इसका सेवन करते हैं। गांव में खेती कम होने लगी, रोजगार का अभाव होने लगा, रोजगार के लिए अन्य प्रदेशों में पलायन होने लगा, लघु वनोत्पाद कम हुआ तो उनकी जीविका का सहारा देशी शराब बना।
आदिवासी महिलाएं घर में ही देशी शराब बनाती और ग्रामीण हाटों में बेचती हैं। आदिवासियों में शराब के प्रचलन का लाभ राजनीतिक दलों ने भी भरपूर उठाया। वे चुनाव के समय इसका लोभ देकर मतदान अपने पक्ष में कराते हैं। शराब के सेवन से उनमें कई प्रकार की बीमारियां होने लगीं और उनकी आयु कम होने लगी। कृषि वैज्ञानिक डॉ एम एस मल्लिक बताते हैं कि देशी शराब के पीने से दिमाग पर असर ज्यादा होता है, सोचने की क्षमता खत्म हो जाती है। आए दिन अखबारों में छपता है कि विषाक्त शराब पीने से दर्जनों गांव में मौतें हुर्इं। चावल से बने शराब में अल्कोहल की मात्रा कितनी है, पता नहीं होता। देशी शराब अधिक पीने के कारण उनमें कुपोषण, क्षय रोग होना आम है। इसके लिए वे कर्ज भी लेते हैं।
आदिवासी जमीन बंधक रखकर महाजनों के चंगुल में फंसते चले गए। परंपरा के नाम पर उनमें लत लग गई। आदिवासी नेता भी परंपरा के खिलाफ बोलने से परहेज करते हैं। सरकार की योजनाओं से अनभिज्ञ आदिवासी नेता उनके नाम पर योजनाएं लेकर अपना व्यापार करने लगे। राजनीतिक दलों के नेताओं ने उनका दोहन खूब किया। झारखंड में महुआ और ताड़ी हर एक गांव में पाया जाता है। आदिवासी नेता शिबू सोरेन ने 1970 में सोनोत संथाल समाज के माध्यम से संथालों में शराब के सेवन के विरुद्ध आंदोलन प्रारंभ किया था।
महाजनों से उनकी जमीन वापसी का आंदोलन भी चलाया। शिबू सोरेन के कारण आदिवासियों में जागरूकता आई और वे मुख्यधारा में जुडने लगे। उन्होंने शिक्षा और खेती को बढ़ावा दिया और शराब के सेवन करनेवालों का सामाजिक बहिष्कार करने की अपील की। झारखंड की कुछ महिलाओं ने देशी शराबबंदी के खिलाफ गांव-गांव में आंदोलन भी किया। शराब की भट्टियां तोड़ीं। लेकिन, इस तरह के आंदोलन कुछ ही दिनों तक चलते हैं, फिर ठंडे पड़ जाते हैं। जब तक झारखंड सरकार, बिहार की तर्ज पर पूरे राज्य में नशे को लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठाती, तब तक कोई उम्मीद करना बेकार ही है।

