स्त्री-प्रताड़ना का एक पहलू यह है कि ज्यादातर समाजों में महिलाओं का घर से बाहर निकलना सही नजर से नहीं देखा जाता है। शायद इसीलिए इधर के तीन-चार दशकों में जब से महिलाओं की सार्वजनिक उपस्थिति बढ़ी है और घर से बाहर के कामकाजी क्षेत्रों में उसका दखल बढ़ा है, स्त्रियों के खिलाफ छेड़छाड़ से लेकर बलात्कार तक के मामलों में बढ़ोतरी हुई है। प्रतिष्ठित अकादमिक पत्रिका ‘इंटरनेशनल क्रिमिनल जस्टिस रिव्यू’ में हाल में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक पिछले एक साल में भारत की राजधानी दिल्ली की लगभग 40 प्रतिशत महिलाओं ने किसी न किसी किस्म की यौन प्रताड़ना का सामना किया है।
इनमें से ज्यादातर को दिन में और किसी सार्वजनिक स्थान पर यौन प्रताड़ना झेलनी पड़ी है। वैसे तो महिलाओं के प्रति ऐसे व्यवहार के संबंध में कहा जाता है कि अभी ज्यादातर मर्द यह समझ नहीं पाते हैं कि उनकी कौन-सी बात या हरकत से कोई स्त्री अपमानित या प्रताड़ित महसूस कर सकती है। इसी तरह महिलाओं के प्रति स्वाभाविक सम्मानजनक बदलाव हमारे सार्वजनिक शहरी व्यवहार का हिस्सा नहीं बन पाया है। लेकिन इससे ज्यादा बड़ी वजह पुरुषों की यह धारणा है कि जिस स्त्री को घर की चारदीवारी में कैद रहना चाहिए, वह बाहरी कार्यक्षेत्रों में मर्दों के कंधे से कंधा मिलाती क्यों आ खड़ी हुई है।
शायद, यह एक अहम कारण है जो शहरी सार्वजनिक इलाके महिलाओं के नजरिए से आक्रामक और असुरक्षित बन गए हैं। वैसे तो यह समस्या विश्वव्यापी है, लेकिन उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में और दक्षिण एशियाई देशों में यह सबसे ज्यादा है। इन देशों में महिलाएं बड़ी तादाद में कामकाजी हो रही हैं और इससे घर से बाहर उनकी मौजूदगी भी बढ़ी है। ऐसे में, परंपरागत पुरुष प्रधान समाजों में एक सांस्कृतिक बदलाव हो रहा है, जिसके लिए बहुत से पुरुष तैयार नहीं हैं और यह महिलाओं के प्रति उनके व्यवहार में आक्रामकता के रूप में प्रकट होता है। इसके अलावा रोजगार देने के कारण और बड़ी आबादी की बसाहट का केंद्र बनने के कारण भारतीय शहर अनेक संस्कृतियों के टकराव की जगह भी बन गए हैं, जहां घोर सामंती संस्कृति से लेकर अत्याधुनिक पश्चिमी संस्कृति तक, सब एक साथ मौजूद हैं।
ऐसे में जब एक ओर नजरिये में आते बदलाव के साथ महिलाओं को कामकाज के हर क्षेत्र में पहुंचने के मौके दिए जा रहे हैं तो साथ में उन्हें वहां से धकियाने के प्रयास भी शुरू हो गए हैं। मानो यह जताने की कोशिश की जा रही है कि तुम यहां कैसे आ गर्इं? तुम्हारी जगह तो सिर्फ घरों में है जहां चौका-बर्तन करने, बच्चे पालने और पति, सास-ससुर की सेवा में दिन-रात एक करके अपनी जिंदगी काटनी है। कई दफ्तरों में भी महिलाओं को लेकर यह एक सामान्य टिप्पणी अवश्य होती है कि लड़कियों-महिलाओं ने पुरुषों के रोजगार के हक पर डाका डाला है, जबकि उन्हें यहां आने की कोई जरूरत नहीं थी। महिलाओं को कामकाज और कारोबार में अवांछित मानने की यही सोच आगे चलकर एक घृणा में और धीरे-धीरे हिंसक इरादों में बदल जाती है।
महिलाएं अब चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों और सेवाओं को भी अपनाने को उत्सुक हैं, जिन पर पुरुष अपना एकाधिकार समझते रहे हैं। ऐसे में महिलाओं का रास्ता रोककर नहीं रहा जा सकता है। यह बेहद लचर दलील है कि औरतें कोमल और कमजोर होती हैं, इसलिए वे बड़े लक्ष्य नहीं पा सकतीं या बड़ी चुनौतियों को नहीं झेल सकतीं। ऐसा कहने वाले लोगों को उन पर्वतीय और ग्रामीण इलाकों में जाकर देखना चाहिए कि महिलाएं वहां किस तरह विपरीत परिस्थितियों में रोजमर्रा के कामकाज निपटाती हैं। वे कड़ी धूप में मीलों चलकर पानी ला सकती हैं, भारी बोझ ढो सकती हैं, पत्थर तोड़ सकती हैं तो धूप में घंटों परेड क्यों नहीं कर सकतीं या दुश्मन के सीने पर गोली क्यों नहीं चला सकतीं और बड़े कारोबार क्यों नहीं संभाल सकतीं? इसलिए यहां सवाल उस मानसिकता का है जिसके अनुसार हर हाल में महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले कमतर समझा जाता है। यही परंपरा और मानसिकता देश के ऊंचे कारोबारी जगत में बनी हुई हो तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं। समय-समय पर साबित होता रहा है कि अगर महिलाओं को उनकी इच्छा के मुताबिक सम्मान से जीने का हक मिल जाता है तो भी पुरुष समाज उन्हें अपने हाथों की कठपुतली बनाए रखने को आमादा रहता है।
अब यह हमारी चिंता का विषय होना चाहिए कि जिस शहरी और कारोबारी समाज को कथिततौर पर पढ़ालिखा और सभ्य माना जाता है, वहां भी महिला अस्मिता को कुचलने की मानसिकता अभी तक क्यों कायम है। इससे स्पष्ट हो रहा है कि चाहे जितने कानून बना दिए जाएं और चाहे जितनी पुलिस-प्रशासनिक व्यवस्था कर दी जाए, अहंकारी मर्दवादी समाज स्त्री को, उसके अहं को और उसकी काबिलियत को ठेंगा दिखाने और उसे कुचलने के लिए आमादा है। इस स्थिति में कोई परिवर्तन तभी होगा, जब खुद समाज के भीतर से स्त्रियों के ऐसे दमन के खिलाफ आवाज उठेगी और कुछ संबंधित मामलों में आंदोलन चलाकर बदलाव लाने की कोशिश की जाएगी। सोचना होगा कि एक स्त्री का अस्तित्व ऐसा क्यों हो कि उसकी उड़ान कोई और तय करे। यही नहीं, अगर उसे अपनी योग्यता के बल पर बेबाक जिंदगी जीने का कोई अवसर मिला है तो समाज उसके पर कतरने पर क्यों आमादा हो जाता है। इन सवालों के जवाब मिलेंगे, तो शायद स्त्री प्रताड़ना जैसे दंश कम हो जाएं और महिलाओं को घर-बाहर खुलकर सांस लेने का अवसर मिल सके।
