ज्ञान प्रकाश विवेक

एक
वफा के जश्न

हम जैसे फकीरों ने मनाए हैं
कि हमने रेत की दीवार से रिस्ते निभाए हैं
जरा तुम उन परिंदों की भी हिम्मत देखते यारो
जिन्होंने वारदातों के शहर में घर बनाए हैं
उसे मेहनतकशों की मुश्किलों का क्या पता होगा
कि चाबी के खिलौने जिसने जीवन भर चलाए हैं
मैं अपने दोस्तों के दर को थपकाता रहा लेकिन
हुआ मालूम कि सबने यहां सांकल चढ़ाए हैं
न जाने बादलों को बात ये किसने बताई है
कि हमने शामियाने आज कागज के बनाए हैं
शहर के उस महाजन का रवैया पूछते क्या हो
भिखारी जिसके घर से हाथ-खाली लौट आए हैं
बहुत ही बदगुमां लगता है मुझको आसमां जैसे
किसी ने कहकशां से आज कुछ तारे चुराए हैं
हुआ है इल्म अब इस उम्र की दहलीज पे आकर
कि अपना कीमती सामान पीछे छोड़ आए हैं
दो
तंग जूते को पहन कर मैं किधर जाऊंगा
बस, जरा दूर चलूंगा कि ठहर जाऊंगा
जिंदगी, मैं तेरा आंसू हूं मुझे यूं न गंवा
मैं तेरी आंख से टपका तो बिखर जाऊंगा
आज बच्चों के लिए कुछ भी नहीं लाया मैं
आज मैं देर गए रात को घर जाऊंगा
काफिले वालों की उभरेंगी कई आवाजें
मैं तो चुपचाप फकीरों-सा गुजर जाऊंगा
अपने होने की खबर तुझको जरा-सी दूंगा
बुलबुले की तरह पानी पे उभर जाऊंगा
जिंदगी, अपनी सराय में जरा रहने दे
जब मैं जाऊंगा तेरा शुक्रिया कर जाऊंगा
इतने हंसने के बहाने मुझे मत दे या रब!
इतनी खुशियां न लुटा मुझपे कि डर जाऊंगा
तीन
बावड़ी है ये पुरानी बाबा
इसमें थोड़ा-सा है पानी बाबा
कोई प्यासा न रहे दुनिया में
है यही अर्ज जबानी बाबा
बादलों को दे बरसने का हुनर
और दरिया को रवानी बाबा
ये जो रक्खा है पुराना बक्सा
ये पिता की है निशानी बाबा
इसलिए चलता हूं धीरे-धीरे
मेरी चप्पल है पुरानी बाबा
क्या बताऊं कि मैं क्यूं चिंतित हूं
हो गई बिटिया सयानी बाबा
मैं तो हूं सीधा-सरल-सा मानस
और संसार है ज्ञानी बाबा
रात आएगी तो मुश्किल होगी
शाम बेशक है सुहानी बाबा
मैंने बेटे को तो रोका बरबस
बात उसने नहीं मानी बाबा
सल्तनत ये जो खड़ी की है मैंने
चार दिन बाद गंवानी बाबा