नीरज खरे
दिवाली पर बुंदेलखंड का प्रमुख लोकनृत्य है-‘दिवारी’। यह पुरुषों का समूह लोकनृत्य है और नाचने वाले ‘दिवरिया’ या ‘मौनिया’ कहलाते हैं। बुंदेलखंड में दीपावली के अवसर पर इनकी मंडलियां गांव-गांव घूम कर इसे एक उत्सव की तरह मनाती हैं। पर समय के साथ इसका रूप बदलता रहा है। बाजार के बादल इस लोककला पर भी मंडराने लगे हैं। पर अब भी बुंदेली अंचल में दिवारी नाचने की परंपरा कायम है। आलाप भर कर गाते दिवारी के गवइया- ढोल, नगड़िया और घुंघुरुओं के बोल पर चटक-रंगीली वेशभूषा पहन कर थिरकते नचइयों की मुद्राएं किसे न मोह लें! दिवाली भारत का महापर्व है। यह खरीफ की फसल आने की प्रसन्नता का सूचक है, जिसका लोक जीवन से गहरा नाता है। भारत के अधिकतर लोकनृत्यों का मूल संबंध किसानी-संस्कृति और उपज की समृद्धि से रहा है। मसलन, छत्तीसगढ़ का ‘रावत नाच’ और बुंदेलखंड की ‘दिवारी’। दोनों का अवसर एक ही है। दिवारी का संबंध वीरत्व प्रदर्शन से भी है। इतिहासकार मानते हैं कि दिवारी की परंपरा चंदेल शासन काल में हुई। इस नृत्य की गायकी पर भी वीरत्व और ओज का प्रभाव है। गांव-गांव घूम कर बुंदेली शान का वीरत्व जागरण करना भले इसका ऐतिहासिक कारण रहा हो, पर दिवारी नाचने वाले पांच या बारह गांवों की सरहदें पार करते हैं, जो अपने आप में लोक के भाईचारे, लोकरंजन और एकता का सूचक है।
बुंदेली दिवारी के तीन प्रमुख आयाम हैं- दो दो पंक्तियों के लोकगीतों की गायकी और ढोल-नगड़िया आदि का विशेष वादन, चटकदार रंग वाली खास तरह की पोशाक पहने और हाथों में मोरपंख लेकर थिरकन और विशेष लय में पद संचालन के साथ गोल घेरे में घूम कर नचइयों का समूह-नृत्य और नृत्य के बीच या अंत में लाठियों की टकराहट के साथ अनूठे खेल और करतब यानी हैरतअंगेज वीरता को प्रदर्शित करता मार्शल आर्ट। दिवारी के गीतों का लोकजीवन के ठोस यथार्थ से घनिष्ठ संबंध है। वे चरागाही संस्कृति के सच्चे प्रतिबिंब हैं और गांव के लोकचित्र। बुंदेली भूमि पठारी और पहाड़ी है- जहां गाय चराना आसान नहीं। लगातार चलते रहने का श्रम और ढोर-बछेरुओं को हांकते-हांकते आवाज बैठने लगती है। एक लोकगीत में चरवाहा अपने किसान से गाएं चराने के श्रम का मूल्य अन्नी-चुअन्नी यानी थोड़े पैसे या कपड़ा-लत्ता नहीं चाहता। ब्यानी (बच्चा जनी) गाय चाहता है। इससे घरवाली ग्वालिन खुश होगी, क्योंकि गृहस्थी आर्थिक संकट से उबर जाएगी।
दिवारी को ‘मौनिया’ भी कहते हैं। किसी गांव के नृत्य समूह का प्रमुख या कुछ लोग मौन-व्रत धारण करते हैं। इस बीच उनके चलने-फिरने आदि की भंगिमाएं पशुओं की तरह होती हैं। वे मौन रहते हैं। नृत्य का आरंभ गाय या बछिया पूजने से होता है। मौनिया दिवाली के दूसरे दिन नदी या तालाब में नहा कर पारंपरिक पोशाक पहनते हैं। उनकी पोशाकें (जांघिए और कुर्तियां) चटक पीले-हरे-नीले या लाल रंग के कपड़ों और रेशमी गोटों से बनी होती हैं। उनमें कौड़ियां और बड़े घुंघरू टंके होते हैं। साथ ही किनारों पर रंग-बिरंगे फुंदने लटकते रहते हैं। मौनिया नर्तक पांवों में छोटे घुंघरू बांधते हैं और हाथों में मोरपंखों का गुच्छा या बांस की लाठियां लिए रहते हैं। जाहिर है डंडा-लाठियां चरवाहों की उपयोगी वस्तु है और उनका जरूरी देशज शस्त्र। इनका समग्र सौंदर्य बुंदेलखंड की वीरप्रसूता भूमि का साक्षातरूपक बन जाता है। वे पांच गांव की यात्रा करते विभिन्न स्थानीय देवस्थानों के दर्शन-पूजन करते हुए अपना मौन-व्रत तोड़ते हैं। बुंदेली अंचल में कहीं-कहीं इसकी प्रथा थोड़ी अलग भी है- गांव के ग्योड़े में बांस की लाठी के सिर किसी पौधे की शाखें बांधी जाती हैं, जिसे छ्यावर बांधना कहते हैं। छ्यावर बांधने पर दिवारी नृत्य शुरू होता है और बारह गांव की मेड़ें लांघने के बाद गाय के नीचे से निकलने पर खत्म होता है।
नर्तकों का प्रमुख या गुरु या कुछ लोग अपनी मनौती के तहत पांच साल तक प्रत्येक दिवाली पर मौन-व्रत लेकर दिवारी नाचने का संकल्प लेते हैं। इसे बारह वर्ष तक करने की मान्यता भी प्रचलित है। प्रत्येक साल पांच मोरपंख बांधते जाते हैं। इस तरह बारह साल में साठ मोरपंखों का गुच्छा या मूठ तैयार हो जाता है। इसे बारहवें वर्ष मथुरा-वृंदावन ले जाकर यमुना में स्नान और मंदिरों में दर्शन-पूजन कर व्रत तोड़ने की परंपरा भी है। यह उनकी आस्था से जुड़ा मामला है। पर इसके पीछे दिवारी नाच की परंपरा कायम रखने की मंशा भी अंतर्निहित है। इस नाच को देखना जीवंत लोक-साक्ष्य बन जाता है। एक जगह ठहर कर नाच खत्म कर नचइया लगभग दौड़ते हुए आगे बढ़ जाते हैं। इस समय उनकी ध्वनियां पशुओं के चलने या दौड़ने से उनके गले में बंधे बड़े घुंघुरुओं या घंटी की आवाज से समानता बनाती हैं। बुंदेलखंड में दिवाली के अवसर पर ‘गैंइया गर्इं गुवारे, भैंसे गर्इं बड़ी दूर’ की आलाप और ‘होत दिवारी होए! होए!’ के उद्घोष और वाद्यों का बजना सुनाई पड़ते ही लोगों की भारी भीड़ इसे देखने उमड़ पड़ती है।
मौनियां नर्तकों के अलावा इस मंडली के गायक घुटनों तक धोती और कुर्ता, बंडी पहने और सिर पर पगड़ी या साफा बांधे रहते हैं। इन्हीं के साथ ढोल, ढोलक, नगड़िया, झांझ और रमतूला दिवारी के पारंपरिक वाद्य यंत्रों को बजाने वाले वादक होते हैं। कहीं-कहीं मृदंग, टिमकी, और कसावरी का प्रयोग होता है। अब अपनी-अपनी रुचि के अनुसार मृदंग या ढोलक, मंजीरे, बांसुरी आदि भी प्रयुक्त होने लगे हैं। पहले गायक दिवारी गीत की पहली पंक्ति गाता है। उसके तुरंत बाद ढोल का घोष होता है। दूसरी पंक्ति के अंत तक नचइयों का समूह ठिठका रहता है कि तभी वाद्य बजने लगते हैं और नचइया लाठी या डंडा या मोरपंख लिए नाचने लगते हैं। फिर वे घेरा बनाते हुए अनेक प्रकार से नृत्य करते हैं। भूमंडलीकरण के इस युग में तीज-त्योहारों को बाजार ने हड़प लिया है। मूलत: लोक का पर्व दीपावली अब बाजार की हो चुकी है। ‘दिवारी’ नाच की मूल पहचान और परंपरा को भी बाजार बदल रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर मान्य भारतीय लोकनृत्यों में ‘दिवारी’ को वह प्रतिष्ठा नहीं मिली है, जिसकी यह हकदार है। अब इसके लोकगायक-वादक, नचइया और लाठियां भांज कर नृत्य स्थल को रणक्षेत्र बनाने वाले हुनरमंद कम हो चले हैं। अंचलों में इसके विधिवत प्रशिक्षण का अभाव है। नई पीढ़ी इस कला के प्रति अधिक गंभीर नहीं दिखती! संतोष है कि जींस, लूजर, टी-शर्ट में ही सही ‘दिवारी’ नाची तो जा रही है! कम से कम अपनी लोकभूमि पर यह किन्हीं भोंडे फिल्मी गीतों और नाच की छाप से अभी बची रहेगी! १
