आजकल विटामिन डी की कमी के चलते लोगों में अनेक प्रकार की समस्याएं देखी जा रही हैं। इसलिए विटामीन डी की जांच के लिए खूब प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। शरीर में विटामिन डी की कमी के कारण आदमी को थकान महसूस होती रहती है, काम करने की पर्याप्त ऊर्जा नहीं रहती। सीढ़ियां चढ़ने पर सांस फूलने लगती है। हड््िडयों और मांस पेशियों में दर्द बना रहता है। दरअसल विटामिन डी शरीर में कैल्शियम और रक्त में आक्सीजन का प्रवाह सुचारु बनाने में मदद करता है, इसलिए इसकी कमी के चलते रक्त प्रवाह बाधित होता है और मांसपेशियों में दर्द बना रहता है। लंबे समय तक विटामिन डी की कमी रहने से शरीर हड््िडयों से कैल्शियम खींचना शुरू कर देता है और हड््िडयां कमजोर होने लगती हैं। डॉक्टर एलजी रामावत ने करीब तीस साल पहले विभिन्न देशों के नवजात शिशुओं पर परीक्षण करके नतीजा निकाला था कि विटामिन डी की कमी मां से गर्भस्थ शिशु में भी पैदा हो जाती है।
विटामिन डी को सनशाइन विटामिन भी कहा जाता है, क्योंकि यह सूर्य के प्रकाश की प्रतिक्रिया में शरीर द्वारा उत्पन्न किया जाता है। प्राकृतिक रूप से यह कुछ आहारों, जिनमें कुछ मछलियां, मछलियों के लिवर का तेल, अंडे की जर्दी और बाह्य शक्ति मिश्रित डेरी उत्पादों और अनाज के उत्पादों में पाया जाता है। विटामिन डी दो प्रकार के होते हैं, जिन्हें डी 2 और डी 3 नाम से जाना जाता है।
विटामिन डी 2, जिसे अर्गोकैल्सीफेरोल भी कहते हैं, शक्ति मिश्रित आहारों, वनस्पति आहारों, और पूरक आहारों से प्राप्त होता है।
विटामिन डी 3, जिसे कोलकैल्सीफेरोल भी कहते हैं, शक्ति मिश्रित आहारों, पशु आहारों (मछली, अंडे और जिगर) और शरीर के भीतर भी, जब त्वचा सूर्य की पराबैंगनी किरणों के संपर्क में आती है तब, बनता है।
विटामिन डी वसा में घुलनशील विटामिन है। यानी यह हमारी वसा कोशिकाओं में संचित रहता है और लगातार कैल्शियम के चयापचय (मेटाबॉलिज्म) और हड््िडयों के निर्माण में उपयोग होता रहता है। अगर आपका सूर्य के प्रकाश से कम संपर्क होता है, आपको दूध संबंधी एलर्जी है या आप शुद्ध शाकाहारी व्यक्ति हैं, तो आपको विटामिन डी की कमी का खतरा हो सकता है।
इस कमी को ठीक होने में कुछ महीने लग सकते हैं। यह व्यक्ति की जीवन शैली और चिकित्सा के तरीके पर निर्भर करता है। रोग का निर्धारण 25-हाइड्रोक्सी विटामिन डी रक्त जांच द्वारा होता है।
’विटामिन डी एक सूक्ष्म पोषक आहार है, जो त्वचा के सूर्य के प्रकाश के संपर्क में आने पर शरीर द्वारा बनाया जाता है। यह कई आहारों में भी उपस्थित होता है। विटामिन डी मुख्यत: हड्डियों में कैल्शियम और फॉस्फेट के अवशोषण और उनके वहां पर इकठ्ठा होने में उपयोगी होता है। शरीर में विटामिन डी की पर्याप्त मात्रा मधुमेह, कोरोनरी आर्टरी डिजीज, त्वचा रोग से बचाव करती है और प्रतिरक्षक शक्ति को बढ़ाती है।
’आपको विटामिन डी की कमी हो सकती है, अगर आप लंबे समय तक सूर्य के प्रकाश में नहीं रहते और विटामिन डी युक्त आहार नहीं लेते हैं।
’अगर बार-बार संक्रमण हो रहे हैं, आलस का अनुभव होता है, हड्डियों और मांसपेशियों में दर्द है, तो अपने विटामिन डी के स्तर की जांच करानी चाहिए। रक्त परीक्षण से शरीर में विटामिन डी की मात्रा का विश्लेषण मिल जाता है।
’विटामिन डी की लंबे समय तक बनी रहने वाली कमी आंतों से कैल्शियम और फॉस्फेट के अवशोषण और उनके हड्डियों में जमा होने की प्रक्रिया को कम कर देती है। इससे हड्डियां कमजोर होती हैं और इस स्थिति को बच्चों में सुखंडी रोग और वयस्कों में ओस्टियोमलेसिया और ओस्टियोपोरोसिस होने लगता है।
’विटामिन डी की कमी को विटामिन डी इंजेक्शन की अधिक मात्रा और उसके बाद थोड़े समय के लिए खाने वाली गोलियां अधिक मात्रा में लेकर ठीक किया जा सकता है। बाद में प्रतिदिन डॉक्टर द्वारा निर्धारित मात्रा में पूरक ले सकते हैं या विटामिन डी का शक्ति मिश्रित आहार ले सकते हैं और प्रतिदिन पर्याप्त समय के लिए सूर्य के प्रकाश में रह सकते हैं।
’आप विटामिन डी से समृद्ध आहार लेकर और पर्याप्त मात्रा में सूर्य के प्रकाश के संपर्क में रह कर विटामिन डी की कमी से बच सकते हैं।
’ शरीर में विटामिन डी का स्तर बढ़ाने के लिए, गरमी के मौसम में, एक दिन में पंद्रह से तीस मिनट तक सूर्य के सामने, बगैर सनस्क्रीन लगाए खड़े रहें।
’अगर आप कम सूर्य प्रकाश वाले क्षेत्र में रहते हैं, तो विटामिन डी 3 का पूरक आहार लें।
’चालीस वर्ष से अधिक आयु की महिलाएं अगर विटामिन डी की कमी से ग्रस्त हैं, तो उनमें ओस्टियोपोरोसिस होने की संभावना ज्यादा होती है। कमी की स्थिति में उन्हें विटामिन डी के पूरक आहार लेने चाहिए।

