आज हिंदी में आलोचना है? क्या आलोचना का समय लद गया? क्या आलोचना की जरूरत अब नहीं रही? क्या पाठ ही सर्वोपरि है? दलित, नारी, आदिवासी, प्रवासी आदि से संबद्ध साहित्य विमर्श क्या आलोचना के विकल्प हैं? यही नहीं, आज तो प्रवासी साहित्य और बालक विमर्श भी अलग से चर्चा में हैं। साहित्यिक परिदृश्य में ऐसे तमाम प्रश्न आज बराबर उठ रहे हैं। यों पहले भी अपने-अपने ढंग से, समय-समय पर रचना और आलोचना के रिश्तों और रचना के सही मूल्यांकन को लेकर प्रश्न उठते रहे हैं। नए सौंदर्यशास्त्र और नए प्रतिमानों की चर्चाएं चलती और उनकी मांग उठती रही हैं और उठ रही हैं। आज तो लगने यह भी लगा है कि आलोचना की कोई केंद्रीय अवधारणा मानो बची ही नहीं है। बहुत-सी अवधारणाएं एक दूसरे से गुत्थम गुत्था हो रही हैं। बहस के रूप में चुनौती तो केंद्रीय साहित्य होने की अवधारणा को भी मिल रही है।
आलोचना और विशेषांकों या ‘श्रेष्ठ’ रचना पुस्तकों की स्थिति निरंतर चिंताजनक बनी हुई है। इसलिए नहीं कि उनमें ऐसी तमाम रचनाओं को भी स्थान और महत्त्व दिया जाता है जो उस योग्य नहीं भी कही जा सकतीं, बल्कि इसलिए कि प्रमाद या पूर्वग्रहवश ऐसे रचनाकारों की रचनाओं को स्थान और महत्त्व न देना, जो अनेक पैमानों पर मान्य हैं और जाने-पहचाने भी हैं। ऊपर से लोकप्रिय संस्कृति के उपादानों के रूप में सोशल मीडिया (फेसबुक आदि) के साहित्य को भी लेकर बढ़ता उपयोग साहित्य का हित और अहित दोनों कर रहा है। एक ओर जहां साहित्य के बन चुके मठों की कुप्रवृत्तियों को धता बताई जा रही है, वहीं उचित और पर्याप्त मूल्यांकन के अभाव में रचनाकारों में आत्ममुग्धता घर करती जा रही है। पर सच यह है कि आलोचना की जरूरत को लाख घेर लिया जाए, उसकी आवश्यकता शेष नहीं है, ऐसा नहीं कहा जा सकता।
खुद कवियों/ रचनाकारों को आलोचकों की भूमिका में भी आना पड़ रहा है। असल में जब कवियों/ रचनाकारों को आलोचक की आलोचना में उठापटक और पूर्वाग्रह की राजनीति दिखाई देती है और जानबूझ कर किसी प्रवृत्ति या कुछ कवियों पर कुठाराघात किया लगता है, तो फिर उन्हें या उनमें से कुछ को इस क्षेत्र में भी सामने आना ही पड़ता है। नए कवियों को देख लीजिए। ‘कविता को ही कवि का परम वक्तव्य’ मानते हुए भी नए कवियों ने अपनी कविता और जटिल रचना-प्रक्रिया आदि के संबंध में कविता से हट कर स्पष्टीकरण देने पड़े थे, भले ही उन्होंने लक्षण-ग्रंथ न लिखे हों। अपने द्वारा प्रयुक्त एवं अन्वेषित अभिव्यक्ति-रूपों को सार्थक सिद्ध करने का भरसक सफल प्रयत्न किया, पुराने प्रतिमानों को घसीट रहे उस समय के आलोचकों को धता बताते हुए। पारंपरिक कसौटियों पर प्रहार करते हुए अपनी और अपने समय की कविता के आधार पर ही नए प्रतिमान या नए सौंदर्य-मूल्य गढ़ने की आवाज उठाई। इस प्रकार की आवाज के सतर्क संकेत हमें पहले-पहल छायावाद में मिलते हैं। कवियों के द्वारा अपनी कविता के बारे में लिखने की शुरुआत छायावादी कवियों के यहां मिलती है, जो पूरी तरह स्थापित नए कवियों द्वारा की गई। दलित, स्त्री या आदिवासी आदि से संबद्ध सौंदर्यशास्त्र प्राय: रचनाकारों की ही देन है। और अपने समय की रचना के लिए नए प्रतिमानों की जरूरत की बहस के भी ये प्रेरक हैं।
प्रवासी साहित्य को ही लें। आज प्रवासी साहित्य का मुख्य स्वर स्मृति-दंश नहीं रह गया है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि आज की सक्रिय पीढ़ी का प्रवासी गुलाम या मजदूर बना कर विदेशी भूमि पर नहीं ले जाया गया है, बल्कि वह स्वेच्छा से अच्छी कमाई के लिए वहां गया है। वह वहां का नागरिक है और सुख सुविधाएं भोग रहा है और तब रचनाकार भी है। इसलिए उसकी सोच, उसका कथ्य, उसकी अभिव्यक्ति सब नई या अलग ढंग की है। इसलिए, उसकी निगाह में, उसे अपनी रचना की समझ और मूल्यांकन के लिए नए प्रतिमान की जरूरत है। यह बात अलग है कि खुद आलोचक या श्रेष्ठ साहित्य के पहचान-कर्ता बने रचनाकार भी गड़बड़ करते नजर आ जाया करते हैं। आलोचना का साधारण अर्थ है- देखना। सबसे बड़ी बात देखने वाले की नीयत का है। सीमाएं हो सकती हैं और रुचियां भी भिन्न-भिन्न हो सकती हैं, जिनके चलते अनेक शैलियां देखने को मिल सकती हैं, लेकिन नीयत ठीक नहीं तो सब गड़बड़ा जाएगा। अरे! हिंदी की आलोचना के बंद द्वार को खटखाटाते ये कौन हैं! काव्य-मीमांसा वाले आचार्य राजेशेखर! दसवीं शताब्दी वाले। गंभीर मुद्रा ओढ़े केवल सिद्धांत बघारने वाले आचार्यों से अलग! सीधे व्यवहार के मन और पेट में घुस कर तथ्यों का संधान करने में समर्थ हैं। पर ए निरे आलोचक थोड़े ही हैं। नाटककार और प्रख्यात कवि भी तो हैं। यायावर। कहने को तो इन्होंने अपने समय के आलोचना कर्म को देखते हुए काव्य-मीमांसा में भावक या आलोचक के चार भेद गिनाए हैं, पर सच पूछो तो इनकी दिव्य दृष्टि ने आज तक के आलोचना कर्म को लपेटे में ले लिया था। खैर, इनके द्वारा माने गए चार प्रकार के आलोचक जान लिए जाएं, जो हैं- अरोचकी, सतृणाभ्यवहारी, मत्सरी और तत्त्वाभिनिवेशी। दरअसल, मगंल नामक आचार्य ने पहले दो भेद बताए थे, जिनमें बाद के दो भेद राजशेखर ने जोड़े।
अरोचकी काव्य में अरुचि रखने वाले को कहा गया है। अरोचकी आलोचकों के दो प्रकार बताए गए- नैसर्गिक या स्वाभाविक और ज्ञानयोनि। नैसर्गिक को सैकड़ों संस्कार भी परिवर्तित नहीं कर सकते, जबकि ज्ञानजन्य अरोचकता विशिष्ट पर ही रीझती है। सतृणाभ्यवहारी को सब कुछ रुचता है यानी वह विवेकशून्य होता है। मत्सरी मिथ्याभिमान की सीढ़ी पर चढ़ा रहता है और ईर्ष्या के कारण गुणों को भी दोष बताया करता है। यानी जिन्हें अच्छी कविता भी अच्छी नहीं लगती। इन सबसे अलग तत्त्वाभिनिवेशी शब्द-योजना के गुण-अवगुण देखता है, दोषों का सुधार और रस का आस्वादन करता है। देखा जाए तो उचित प्रतिमानों की अपेक्षा इसी से की जा सकती है। पर दिक्कत यह है कि जिसकी ओर राजशेखर ने उचित ही संकेत किया है कि तत्त्वाभिनिवेशी भावक (आलोचक) तो हजारों में एक होता है। क्या हमें ये चारों प्रकार के भावक आज के परिवेश में बखूबी नहीं मिल रहे हैं- खासकर अरोचकी, मत्सरी और सतृणाभ्यवहारी। फेसबुकी लाइकी आलोचना के भावकों में तो सतृणाभ्यवहारियों की भरमार है। साहित्य के आलोचना-परिदृश्य में मत्सरियों का भी खूब बोलबाला है। दुर्भाग्य से स्वतंत्रता के बाद के अधिकतर आलोचक (इनमें कुछ कवि या रचनाकार-आलोचक भी हैं) धीरे-धीरे ‘मेरे-तेरे’ के चक्कर में पड़ते चले गए और आलोचना को अविश्वसनीयता की ओर धकेलने में लगे रहे। आज जब कि लोकप्रिय संस्कृति के उपादान छाए हुए हैं और पाठकों तक सीधी पहुंच आसान हुई है, तो ऐसे आलोचकों की दयनीय स्थिति कोई भी देख सकता है। लेकिन दिक्कत यह है कि जो आलोचक नहीं हैं, रचनाकार हैं, उनमें से भी बहुत से ऐसे ही कुकर्मों के कारण दयनीय बनने की कतार में हैं, भले ही संप्रति अपने शातिराना अंदाज के कारण चमकते नजर आ रहे हों। आलोचना का अधिकांश फतवेबाजी, अच्छा-बुरा (बल्कि ऊंचा- नीचा) साबित करने की प्रवृत्ति और इनसे भी आगे बढ़ कर कुछ अच्छे रचनाकारों की हत्या करने की साजिश से ग्रसित नजर आते हैं। यही उन जैसे आत्ममुग्ध और अहंकारी आलोचकों का उद्देश्य भी है। ०
