पंकज पराशर
वि या लेखक जिस सामाजिक पृष्ठभूमि और संस्कृति से पूर्णत: आबद्ध और जिस विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध होते हैं, उस सामाजिक पृष्ठभूमि और आंचलिक संस्कृति से अगर व्यापक पाठक वर्ग अनभिज्ञ हो, तो रचना के मर्म तक पहुंचने में सहायक बनने के लिए आलोचना की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। अगर रचना में वर्णित जीवन से पाठक अपरिचित हो, उसकी भाषिक-संपदा का उसे कोई ज्ञान न हो, तो एक अच्छी आलोचना उसे व्यापक पाठक के लिए ग्राह्य और स्वीकार्य ही नहीं बनाती, बल्कि रचना के उत्कर्ष और अपकर्ष दोनों को रेखांकित करती है। क्योंकि आलोचना रचना के मर्म-स्थल पर अंगुली रखने का विवेक ही पैदा नहीं करती, बल्कि रचना के प्रति सही समझ विकसित करने में भी सहायक बनती है। प्रेमचंद बहुत पुराने लेखक नहीं हैं, लेकिन शहरी पाठकों के सामने ‘दो बैलों की कथा’ में आए शब्दों को पूरे अर्थ-वैभव के साथ समझा पाना कठिन होता जा रहा है। कांजीहौस, चिप्पड़, भीत, पगहिया, नांद, सानी-पानी जैसे शब्दों से अनेक छात्र और अध्यापक तक अपरिचित हैं। ‘ईदगाह’ में शहर को चकित होकर देखने वाले देहाती बच्चे की तरह आज के शहरी पाठक जब ‘कफन’ तक पहुंचते हैं, तो उन जीवन-स्थितियों से सर्वथा अनजान होने के कारण आलू भूनने, गांव के भोज में पचास-साठ पूरियां खाने की स्मृति-कथा और बुधिया की प्रसव-व्यथा से ही छटपटा कर शांत हो जाते हैं। नई अर्थव्यवस्था में यह संकट दिनोदिन बढ़ता जाएगा।
अपनी आंचलिकता, शब्द-संपदा मसलन बालूचर, फेनूगिलासी हंसी में ‘गिरिफ्फ’ होकर अनेक भद्रलोक भले फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ की प्रशंसा करें, लेकिन उनके अंचल के शब्द आ जाने पर बगलें झांकते हुए ‘हेल-डूब’ करने लगते हैं। अपनी मशहूर कविता ‘अकाल और उसके बाद’ में नागार्जुन ने ‘शिकस्त’ शब्द का प्रयोग किया है। ‘शिकस्त’ फारसी का शब्द है, जिसका अर्थ है पराजय, हार या पराभव। लेकिन नागार्जुन ने इसमें फारसी के ‘शिकस्त’ का प्रयोग ही नहीं किया है। मैथिली में ‘शिकस्त’ का अर्थ है अभाव, विपन्नता। घर में दाने न होने के कारण चूहे की हालत शिकस्त रही, यानी इस बीच घोर अन्नाभाव रहा। मगर ‘शिकस्त’ के मैथिली संस्करण से अनजान लोग इसे चूहे की हार समझ लें, तो क्या आश्चर्य! सबसे ज्यादा समस्या तब आती है जब किसी रचना में कोई कथाकार लोककथा का प्रयोग करे या हिंदी के पाठकों का लोक-साहित्य से सामना हो जाए। तब लोक से संबंधित शब्द, रिवाज, खानपान, लोकोक्ति को समझना पाठकों को तो छोड़िए, हमारे समय के स्रष्टाओं को भी दुश्चक्र में डाल देता है। आज आमफहम मुहावरों और लोकोक्तियों से संपन्न भाषा गुजरे जमाने की चीज हो गई है। दुखद है कि आज की भाषा से मुहावरे और लोकोक्तियों को जैसे देशनिकाला दे दिया गया है! जाहिर है, इसलिए भाषा नीरस और उबाऊ होती चली जा रही है।
‘रामचरितमानस’ के बालकांड में सीता को आशीर्वाद देते हुए कौशल्या कहती हैं, ‘अचल होउ अहिवातु तुम्हारा/ जब लगि गंग जमुन जल धारा’। ‘अहिवात’ यानी सुहाग। मिथिला में भी अवधी अंचल की तरह सुहाग के लिए अहिवात और सुहागिनों के लिए अहिवाती शब्द प्रचलन में है, लेकिन पिछले कुछ दशकों से उत्तर भारतीय समाज का जिस तरह करवा-चौथीकरण हुआ है, उसके बावजूद, ‘अहिवात’ शब्द को पूरे अर्थ-वैभव के साथ समझा पाना थोड़ा मुश्किल हो गया है। तुलसी के यहां अवधी के ऐसे सैकड़ों शब्द प्रयुक्त हुए हैं, जो आज भी उसी रूप में प्रचलित हैं, लेकिन ‘शिष्ट-भाषा’ हिंदी के पाठकों के लिए वे शब्द किसी विदेशी के शब्द-जैसे हो गए हैं! रिश्तों का ‘अंकलीकरण’ होने से जिस प्रकार चाचा, ताऊ, मामा, चचेरे मामा सब महज ‘अंकल’ तक सीमित हो गए हैं, उसी तरह उत्तर भारतीय खाने का ‘पनीरीकरण’ होने से बहुत सारे पकवान और पकवानों से संबंधित शब्द हमारी भाषा से गायब होते चले जा रहे हैं। संस्कृत की रोटिका यानी हिंदी की रोटी के लिए हमारे यहां दर्जनों शब्द हैं, लेकिन अब सोहारी यानी चपाती भी रोटी है और हाथ से ठोक कर बनाई गई हथरोटिया मोटी रोटी भी रोटी ही है! तुलसीदास ने अपनी रचनाओं में ‘सोहारी’ शब्द का प्रयोग किया है, जो असल में गेहूं की चपाती के लिए प्रयुक्त होता है। मगर आॅक्सफोर्ड की डिक्शनरी के मुताबिक यह घी में तली गई पूरी है और छत्तीसगढ़ में पकवान! ऐसे में भला मांगलिक अवसर पर बनने वाली ‘दोस्ती सोहारी’, बिहार में बनने वाले ‘रोट’ और राजस्थान के मेवाड़ अंचल की ‘झकोरमा पूरी’ के मर्म तक महज कुछ शब्दों के सहारे कोई आलोचक कैसे पहुंचा सकता है!
पके हुए चावल के लिए बहु-प्रचलित शब्द है ‘भात’, लेकिन न जाने क्यों भात कहने में लोगों को भदेस कहलाने का भय सताने लगा है। सब्जी कहने में ऐसा गौरव-बोध होता है कि ‘तरकारी’ कहने में संकोच होने लगा है। जबकि हमारा साहित्य इन्हीं परंपरा से, इन्हीं शब्द-संपदाओं से रचा गया है।
किसी भी भाषा का अर्थ जब सिर्फ अभिव्यक्ति तक सीमित होकर रह जाए और संस्कृति का व्यापक दायरा जब सिर्फ उपभोग की संस्कृति रह जाए, तो गांव, ग्रामीण समाज, खेती-बारी, प्रकृति, लोक-संस्कृति और लोकोक्ति के प्रयोग से संपन्न रचना की व्याख्या और अर्थ-पंखुड़ी को अनावृत्त करने का प्रयत्न बहुत चुनौतीपूर्ण हो जाता है। इसलिए जिस तरह ‘सभ्यता के विकास के साथ-साथ कवि-कर्म कठिन होता चला जाता है’, उसी तरह आलोचना-कर्म भी कठिन होता चला जाता है। कवि या लेखक जिस जमीन पर अपनी रचना करते हैं, जिस जीवन की कथा लिखते हैं, उस रचनात्मक पृष्ठभूमि के बारे में अगर पाठक को कोई इल्म न हो, तो आलोचक चाहे कितना भी बड़ा लालबुझक्कड़ क्यों न हो, वह उस रचना के अर्थ-वैभव और सामाजिक जीवन-विवेक तक लेकर नहीं जा सकता।
घाघ ने लिखा है, ‘जोंधरी जोते तोड़-मरोड़/ तब वह डारे कोठिला फोर’ यानी जोंधरी के खेत की जुताई अधिक करनी चाहिए। ऐसा करने पर इतनी अधिक पैदावार होगी कि कोठिले में नहीं समाएगी। आज जोंधरी शब्द से अधिकतर जन अपरिचित हैं और कोठिला और बखार के दर्शन तो अब गांव में भी बमुश्किल होते हैं। सूरदास ने अपने पद में मोटे अनाज के तहत आने वाले कोदो-सावां का जिक्र किया है। आजादी के बाद भारत के खेतों में धान, गेहूं, दलहन और कुछ तिलहनों की आमद के कारण आज कोदो-सावां का दर्शन भी दुर्लभ है। मैथिली के कवि चंदा झा ने उत्तर बिहार में गंगा के किनारे पहलेजा घाट क्षेत्र में होने वाले तरबूज के लिए ‘पहलेज’ शब्द का इस्तेमाल किया है। इसलिए बिना इसकी पृष्ठभूमि से परिचित हुए पाठक असली काव्य-मर्म तक नहीं पहुंच सकता।
आज की हिंदी आलोचना लगातार दोतरफा चुनौतियों से जूझ रही है। एक तरफ गांव, ग्रामीण समाज, खेती-बारी, प्रकृति, लोक-संस्कृति और लोकोक्ति से बढ़ती दूरी के कारण जहां इससे संबद्ध और आबद्ध रचनाओं के मर्म का संप्रेषण बहुत कठिन होता जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ नई सूचना तकनीक से अनजान विद्वान आज की शब्दावली के प्रयोग से संबद्ध रचनाओं के मर्म तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि संप्रेषण की इसी समस्या के कारण पुराने आलोचक नई रचनाओं के मर्म को नहीं समझ पा रहे हैं और हमारे समय के नए आलोचक पुरानी रचनाओं के मर्म तक पहुंच ही नहीं पा रहे हैं? ०

