रवींद्र भारती
संदूक
वह अकेली आती मगर कभी होती नहीं थी अकेली
अनेकों होते थे, जिन्हें लेकर चलती थी अपनी सांसों के साथ
एक ही धमनियों की आंच से सभी लगते थे गढ़े हुए
उनमें से किसी से किसी की दर्शाई नहीं जा सकती थी-
छोटी-बड़ी विशिष्टता
न ही अलगाया जा सकता था रंगों को उनके
एक दिन से दूसरे दिन की धूप के रंगों की तरह।
वह आती हवा के झोंके सी दिए बिना दस्तक
अपने समय से चुरा कर थोड़ा समय
अक्सर उसकी बातों में खाली जगहें दिखतीं
जहां कोई अभिव्यक्ति नहीं होती, विस्मय चिह्न के सिवाय
वह मेरे भीतर के वर्णाक्षरों को हिला देती
हम एक-दूसरे का मुंह देखने लगते-
बात करते-करते।
अचानक वह उठती, जाते-जाते
छोड़ जाती नेग-उपहार में मिले-
दुतकारे गए शब्दों को मेरे पास
इसी तरह और भी बहुत कुछ …
इस देना-पावना को बरसों से लौटा रहा हूं
धिक्कार के साथ उन्हें, जिन्होंने दिया था उसे
तब भी लगता है कि
भरी की भरी है उसकी संदूक।
आपाधापी
सुबह-शाम मिलते हैं लोकल ट्रेनों, बसों में
बरसों से अगल-बगल, आमने-सामने उठते-बैठते
एक-दूसरे को चीन्ह गए हैं-
मगर परिचय झाल-मूड़ी भर नहीं है
फिर भी हाट-बाजार में मिलने पर मुस्कुराते हैं
गाड़ियों के हिचकोले से निकल।
कोई नहीं जानता किसी के काम-धंधे की बात
नहीं जानता अता-पता, बिरादरी, भाषा
सभी अलग ही धुन में रहते हैं चढ़ती-उतरती सवारियों
के बीच
फिर भी उस आपाधापी में –
किसी की फूलती सांसों से उठती खांसी चली जाती है
किसी के साथ
निर्दोष आंखों की मौन कथा
चली जाती है किसी की, किसी के साथ अकारण
अकारण ही होती है चिंता
जब कोई नहीं दिखता है दो-चार दिन
मन दस कोठों में दौड़ने लगता है
कहीं तबियत तो नहीं खराब हो गई
कहीं चलते हुए रास्ते में गिर तो नहीं गए
कहीं और कुछ तो नहीं हो गया!
अकारण ही एक दिन खिल उठता है चेहरा
भीड़ में देखकर उन्हें।
कैसा है लगाव, कैसा है यह रिश्ता
कि जिससे कभी दोटूक बात न हुई हो,
उसके साथ अदृश्य में जारी रहती है-
अकारण से कारण की यात्रा
और उस यात्रा में
प्रेम के पीछे खड़े मुस्कुराती रहती है युक्ति बुद्धि।
उद्घाटन
उद्घाटन समारोह चलता रहता है अहर्निश यहां
किरण फूटने के साथ-
अन्न घर का उद्घाटन करते हैं
मेघों से ढंकी सूरतों का वन के पंछी
चट्टानें धातुओं का करती हैं
रसातल से निकल कर गंध-
स्वभाव का करती है उद्घाटन।
दिन के उजाले से लेकर मध्यरात्रि के पार तक
गूंजती रहती है करतल ध्वनि
इस बीच उसकी अगुवानी में
सड़क पर जाता हूं दौड़ कर कि अचानक-
बदल जाता है परिदृश्य
हवा तेज हो उठती है
उद्घाटनों के पत्थर उड़ने लगते हैं रास्तों में
सिर के ऊपर उसके रोप देता हूं बढ़ कर अपने हाथ
मैं उद्घाटित नहीं करता कुछ भी
स्वत: उद्घाटित होता है किसी आयोजन के बिना।

