सुधीर विद्यार्थी
हिंदी साहित्य में निरंकार देव सेवक की ख्याति बाल साहित्यकार के रूप में थी। उनका जुड़ाव प्रख्यात मानववादी चिंतक एमएन राय की विचारधारा से था। सेवक जी राय के बहुत नजदीक थे। बरेली के केंद्रीय कारागार में भी राय ने कुछ दिन बिताए और यह भी कि बाद में बरेली के ही एक बड़े आयोजन में राय ने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की थी। राय के मानववाद (रेडिकल ह्यूमनिज्म) से बहुत कम लोगों की सहमतियां बन पार्इं। कम्युनिस्ट एक तरह से उन्हें अपना विरोधी मानते रहे और कांग्रेस में रह-ढल पाना राय के लिए संभव भी नहीं था। प्रगतिशील खेमे में राय को न याद किया जाना मुझे और सेवक जी को बहुत खटकता था। वे मेरी इस चिंता से सहमत हुए कि राय की पुस्तकों का हिंदी अनुवाद होना चाहिए। सेवक जी मानते थे कि राय का लेखन और चिंतन अब भी दुनिया को मार्ग दिखाने वाला है। गांधी से भिन्न होते हुए भी ये दो ही व्यक्ति ऐसे हैं, जो आज भी स्वतंत्र मानवता को कुछ नई दृष्टि दे सकते हैं। एक बार उन्होंने मुझसे कहा कि राय की किसी पुस्तक का हिंदी अनुवाद न कर सकने का उन्हें दुख है। सेवक जी बहुत साफ तौर पर कहते थे कि राय किसी को ‘रायवादी’ बनाने में विश्वास नहीं करते थे। अपना दल भी उन्होंने स्वयं अपने चिंतन के आधार पर तोड़ दिया था। इससे उनके कुछ साथी ही नाराज रहे। सेवक जी भी राय के विचारों से जुड़े होने के चलते प्रगतिशील खेमे में निरंतर उपेक्षित बने रहे। उन पर बाल साहित्यकार का ही तमगा लगा रहा। यह सही है कि शुरुआती प्रगतिशील कविता सेवक जी से बहुत पीछे छूटती गई और वे बच्चों के लिए साहित्य रचना में गहराई से डूबते चले गए।
सेवक जी की प्रारंभिक कविताओं का परिचय 1943 में उनके साहित्य भवन लिमिटेड प्रयाग से छपे संकलन ‘चिनगारी’ से मिलता है, जहां एक विद्रोही रचनाकार के रूप में उनकी सशक्त उपस्थिति दिखाई देती है। इस पुस्तक की भूमिका लिखी थी पुरुषोत्तम दास टंडन ने, जो उस समय साहित्य भवन लि. प्रयाग के मंत्री थे। उन्होंने कहा भी था कि सेवक जी इन कविताओं की पंक्ति-पंक्ति में हमारा वास्तविक और दयनीय समाज कराह रहा है, और वास्तविकता का दिमागी ऐयाशी या कृत्रिमता से क्या संबंध! कवि की यथार्थप्रियता और उसके विचार-स्वातंत्र्य को तो छंदों के बंधन भी ग्राह्य नहीं, क्योंकि इस संबंध में मतभेद हो सकता है। कवि का उद्देश्य तो आज की विषमताओं को, जिनमें आज हम जी रहे हैं और जिनमें कम से कम उसने अपना दम घुटता पाया है, शब्दबद्ध करना मात्र है और वह भी बड़ी सावधानी से। हां, उसमें संवेदना है जो अनायास ही हमारे दिलों में घर कर लेती है। एक बात और, कवि ने तथाकथित बुरी वस्तुस्थितियों को बहुत ही बुरा क्यों न कहा हो, उसने जो कुछ कहा है वह आज का है और काफी सत्य है।’ जानना होगा कि उनकी इन्हीं कविताओं को पढ़ कर राहुल सांकृत्यायन ने कहा था, ‘मैं कविताएं नहीं पढ़ता, पर ‘चिनगारी’ की कविताएं मुझे पसंद आईं।’ हरिवंश राय बच्चन की टिप्पणी थी कि हिंदी की प्रगतिशील कविता का सच्चा इतिहास जब भी लिखा जाएगा, उसमें ‘चिनगारी’ का शीर्ष स्थान होगा। लेकिन प्रगतिशील साहित्य के अलमबरदारों ने सेवक के कृतित्व को भुला दिया। बाद में सेवक जी पूरे समय बाल साहित्य के रचनाकर्म में संलग्न हो गए, जहां उन्हें बहुत प्रतिष्ठा मिली, पर उनकी शुरुआती विद्रोही कविता उनसे छूट जाती रही। उनकी पूर्व में प्रकाशित ‘कलरव’ और ‘स्वास्तिका’ संकलनों की कविताओं पर भी लोगों की दृष्टि नहीं गई, जिनका रंग ‘चिनगारी’ से बहुत पृथक है। उन पर उस दौर के गीतों का किंचित प्रभाव है, जहां उनकी सामाजिक चिंताएं वहां पूरी तरह मुखर हैं।
बच्चों के लिए उनके विपुल लेखन पर भी उनकी प्रगतिशील चेतना की छाया को बखूबी चीन्हा जा सकता है। वे बाल मनोविज्ञान के गहरे जानकार थे। कहते थे कि बच्चों के मन को जाति और धर्म की बेड़ियों के बंधन से मुक्त रखा जाना चाहिए। उनकी कोशिश थी कि अपनी छोटी-छोटी रचनाओं के जरिए वे बच्चों के भीतर अंधविश्वासों, कुरीतियों के जहरीले पौधे न पनपने दें। जिन दिनों सेवक जी ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण से पौराणिक कथाएं बच्चों के लिपिबद्ध कीं तब उनकी बहुत आलोचना हुई। पर साहित्य में उनका यह क्रांतिकारी कदम था। उन कथाओं में उन्होंने धर्म और चमत्कार को कोई स्थान नहीं दिया था। उन पर आरोप लगे कि वे इतिहास बदल रहे हैं। पर वे विचलित नहीं हुए। ‘ध्रुव’, ‘प्रह्लाद’ और ‘गोवर्धन गिरधारी’ जैसी पौराणिक कथाओं का पुनर्लेखन उनके साहस का भी साक्ष्य है। सेवक जी की दलील थी कि धर्म और चमत्कार की ऐसी बातें बच्चों के वैज्ञानिक विकास में बहुत बड़ी बाधा हैं। सेवक जी का समग्र मूल्यांकन उनके प्रारंभ से लेकर बाद तक के काव्य-व्यक्तित्व को सामने रख कर किया जा सकता है। केवल उनके बाल साहित्य का मूल्यांकन तभी संभव है जब उनकी वैचारिक आस्था के केंद्र बिंदु एमएन राय के जीवन और कार्यकलापों को गहराई से जाना-समझा जाए। बालमन को तर्कशील बनाने और उन्हें वैज्ञानिक चेतना से लैस करने में उनकी बाल कविताएं एक अनोखा प्रयोग हैं। बच्चों की शिक्षा-दीक्षा के लिए सेवक जी के पास एक खास नजरिया था। वे साफ कहते थे कि, ‘नैतिकता की शिक्षा बच्चों के लिए आवश्यक कही जा सकती है, पर वह धर्म पर आधारित हो यह जरूरी नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं कि धर्म या धर्मों से बच्चों को अनभिज्ञ रखा जाए, उन्हें धर्मों का आदर करना न सिखाया जाए। उन्हें किसका आदर करना है किसका नहीं इसका निर्णय वे अपनी बुद्धि से ही कर सकते हैं, किसी चमत्कार या अलौकिक का भय दिखा कर नहीं। बुद्धि के लिए ज्ञान की आवश्यकता है। और ज्ञान अथाह है। इसलिए बच्चों के लिए दिए जाने वाले ज्ञान को बच्चों की दृष्टि से देख कर चुनना होगा।
जब मैंने बच्चों को स्वतंत्रता-संग्राम के पाठ पढ़ाए जाने की जरूरत पर बल दिया तो उनका उत्तर था कि ‘हमारे देश में तरह-तरह की वेशभूषा, रहन-सहन, आदतों, कलाओं और कार्य-कलापों वाले मनुष्य रहते हैं। उनसे परिचित करा कर हम बच्चों को देश का बोध करा सकते हैं। अपनी सामाजिक परिस्थितियों को बदलने के लिए लोगों ने कैसे-कैसे संघर्ष किए, उन्हीं में से एक स्वतंत्रता संग्राम भी था, जिसे यथार्थ रूप से प्रस्तुत करके बच्चों में समाज का निर्माता होने का विश्वास पैदा किया जा सकता है।’ 1950 में एक बार बरेली के प्रमुख राजनेता दामोदर स्वरूप सेठ और ब्रजमोहन लाल शास्त्री सेवक जी के पास आए और कहा- ‘देश आजाद हो चुका है। अब तुम भी कांग्रेस के सदस्य क्यों नहीं बन जाते?’ उन्होंने उत्तर दिया कि ‘मैं भी तो आजाद हो गया हूं। अब किसी दल के बंधन में भी क्यों पड़ूं।’ यद्यपि सेवक जी ने एक बार गोविंद बल्लभ पंत के विरुद्ध चुनाव लड़ा था, पर सक्रिय राजनीति में हिस्सेदारी करने के लिए उन्हें किसी दल की आवश्यकता महसूस नहीं हुई। सेवक जी पेशे से वकील थे। वे बार एसोसिएशन के अध्यक्ष भी रहे। एक बार व्यंग्यकार रवींद्रनाथ त्यागी उन्हें काले कोट से लैस समझ कर बरेली के वकालतखाने में ढूंढ़ने आ गए थे। पर वे वहां कहां मिलते। कहीं बैठकी जमी और सेवक जी कविता या वैचारिक बहसों में उलझ गए। दरअसल, वे पूरे समय के कवि थे। उन्हें याद करना प्रगतिशील चेतना से लैस बाल साहित्यकार के साथ एक विद्रोही कवि की शिनाख्त भी है।
