जियाउर रहमान जाफरी
हिंदी साहित्य में स्त्री किसी न किसी रूप में मौजूद रही है। यह अलग बात है कि हर दौर का साहित्य स्त्री को अपने-अपने नजरिए से देखता रहा है। जो स्त्री कभी अपवित्र और कमजोर समझी जाती थी, आज वो अपनी पूरी ताकत के साथ मौजूद है। स्त्री आज जहां पहुंची है, वो यहां तक किसी के रहमोकरम से होकर नहीं आई है, बल्कि उन्होंने अपने संघर्ष और अपनी मेहनत से यह मुकाम हासिल किया है। यह अलग बात है कि पुरुष शासित समाज ने जहां तक संभव हो सका, उसे फलने-फूलने से रोका। आज स्त्री जिस कविता में मौजूद है कल तक उसका कविता लिखना भी अच्छी नजरों से नहीं देखा जाता था। मीर तकी मीर जैसे शायर की बेटी की कविता भी जला दी गई, जिसे वह बर्दाश्त नहीं कर सकी और अंतत: खुदा की प्यारी हो गई। बकौल डॉक्टर कल्पना वर्मा 18वीं-19वीं शताब्दी में अगर स्त्रियों ने कुछ लिखा भी है तो अपने नाम को गोपनीय रखने की चेष्टा की है।
असल में पितृसत्तात्मक समाज स्त्रियों को एक खास-चश्में से देखता है, उसकी नजर में स्त्री घर का काम करने और प्रजनन करने के लिए है। बेटे का घर से निकलना कोई अर्थ नहीं रखता, स्त्री घर से निकले तो वह सीता ही क्यों न हो उन्हें अग्नि परीक्षा देनी पड़ती है। वह जंग हो, बलात्कार हो या घरेलू हिंसा सबसे ज्यादा स्त्रियां ही प्रताड़ित होती हैं। दहेज की सूली वही चढ़ती हैं और पति के मरने पर सादा लिबास उसे ही दिया जाता है। आखिर विधुर के लिए भी तो कोई नियम-कायदे होने चाहिए। हिंदी कविताओं में स्त्री का रोष और उसका दर्द दोनों देखने का अंकन हुआ है। उदाहरण के लिए रंजना जायसवाल ने स्त्री को अपनी कुछ पंक्तियों में इस तरह लिखा है- मैं स्त्री हूं, और जब मैं स्त्री हूं/तो मुझे दिखना चाहिए स्त्री की तरह/मसलन मेरे केश लंबे, स्तन पुष्ट और कटि क्षीण हों…. इसी तरह चंद्रकला ने भी स्त्री के मन में आजादी को लेकर चलने वाली ख्वाहिश पर पंक्तियां लिखी हैं-शयाद किसी दिन हम भी जी सकें/भीड़ भरे चिड़ियाघरों में/सुख से चाय का/ एक प्याला अकेला सुजाता ने लिखा है-तुम्हें चाहिए एक औसत औरत/न कम न ज्यादा बिल्कुल नमक की तरह
ऐसा नहीं है कि ये आवाज यहीं उठी। कभी महोदवी वर्मा ने भी कहा था-विस्तृत नभ का कोई कोना/मेरा न कभी अपना होना। साहित्य में स्त्री को देहवादी स्त्री विमर्श बनाकर रख दिया गया है। स्त्री मुक्ति सिर्फ देह की आजादी नहीं है। स्त्री मुक्ति का अर्थ है, उसके वाजिब हक प्रदान करना, उसे सम्मान देना और उसे समान अवसर देना। स्त्री पुरुष का प्रतिपक्ष भी नहीं है। असल में स्त्री और पुरुष दोनों समाज के अंग हैं और स्त्री की स्वतंत्रता स्त्री का अधिकार है। कठगुलाब उपन्यास में पांच पात्र हैं। इसमें चार महिला पात्र ऐसे हैं, जो अलग-अलग ढंग से सोचते हैं। अनामिका की एक कविता है-हमने एक दिन कहा हमें पढ़ो उस तरह/जैसे बीए करने के बाद/विज्ञापन के एक-एक/शब्दों को पढ़ा होगा।
स्त्री के इसी दुख, दर्द और नारी मुक्ति के सवालों को चित्रा मुद्गल अपने उपन्यास आवां में उठाती हैं। मैत्रेयी पुष्पा के अल्मा कबूतरी तक आते-आते समाज में आ रहा बदलाव दिखने लगता हो फिर भी ये कितने अफसोस की बात है कि आजादी के लगभग सत्तर साल के बाद भी हम स्त्री सशक्तीकरण और स्त्री स्वतंत्रता की चर्चा कर रहे हैं। अब तक तो स्त्री और पुरुष के बीच हर अंतर मिट जाना चाहिए। हमने स्त्री स्वतंत्रता की बात मानकर उसे बाजार और विज्ञापन में खड़ा कर दिया। स्त्री विमर्श कुछ स्त्रियों का विमर्श नहीं है। यह उन स्त्रियों की बात भी है, जो किसी वन प्रदेश में रहते हुए गुमनामी की जिंदगी गुजार रही हैं। मैत्रेयी पुष्पा ने बेतवा बहती रहे में उन ग्रामीण स्त्रियों की दशा पर प्रकाश डाला है, जो कई अभिशाप को सहते हुए समाज का मुकाबला करती हैं। मृदुला गर्ग की कहानी तीन कीलों की टोकरी में नारी पशुवत बर्बरता को झेलती है। असल में सबसे जरूरी है समाज का प्रगतिशील होना, जो हमें बचपन से सिखाता है कि स्त्री का चरित्र पुरुष के चरित्र से ठीक विपरीत होना चाहिए। उर्मिला शिरीष का सवाल वाजिव है कि-एक ही मां-बाप की संतान में इतना अंतर वही नाम, कुल, गोत्र, पहचान, खून एक होता है, तो उसकी चीज क्यों अलग हो जाती है। लेखिका तस्लीमा नसरीन साफ तौर पर कहती हैं कि उन सभी प्रथाओं, रीति-रिवाजों का खंडन करना चाहिए, जिनके अस्तित्व का कोई तार्किक कारण नहीं होता।
स्त्री विमर्श के बहाने स्त्री की हैसियत हिंदी की कई कहानियों, कविताओं, लेखों, नाटकों आदि में दिखाई देती है। स्त्री विमर्श और स्त्री के हालात को समझने के लिए कृष्णा सोबती का सूरजमुखी अंधेरे के, उषा प्रियंवदा का रुकेगी नहीं राधिका, मन्नू भंडारी का उपन्यास आपका, बंटी शिवानी की लिखी हुई कृष्णा कली, ममता कालिया का बेघर, और नासिरा शर्मा कृत सात नदियां एक समंदर का अध्ययन बेहद जरूरी है। यह वे किताबें हैं, जिसने स्त्री विमर्श को हिंदी कथा साहित्य में स्थान दिलाया है। इन उपन्यासों में स्त्री के अंदर की मुक्तिकी छटपटाहट दिखती है। चित्रा मुद्गल के आवां की नीता कहती हैं- ‘मैं पत्नी नहीं सहचरी बनना चाहती हूं…पत्नी शब्द में मुझे दासीत्व की बू आती है। ममता कालिया का मानना है कि स्त्री के अपने देह पर अपना अख्तियार होना चाहिए। वह लिखती हैं-तुम्हारी देह तुम्हारी अपनी है। तुम उसका जो चाहो इस्तेमाल करो। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि हिंदी की लेखिकाओं ने अपने दम पर अपनी अस्मिता का निर्माण किया है। स्त्री विमर्श सिर्फ अपना दुख बयान करने की रचना नहीं है। इन रचनाओं में नायिकाएं खुद अपने महत्त्व को रेखांकित करती हैं, परंपरा का विरोध करती हैं। किसी के हाथ का खिलौना नहीं बनतीं। दुनिया ने जिसे सिर्फ जिस्म समझा था, उसे पता चला कि उसकी और भी किस्म है।
