मोहम्मद अरशद खान
पा… कहां हैं आप?’ निक्की की आवाज पाते ही पापा हड़बड़ा गए। पांच मिनट पहले निक्की ने चाय का कप लाकर उनकी मेज पर रखा था। वह अब भी वैसे का वैसा रखा था। पापा की आदत ऐसी थी कि काम में उलझते तो होश न रहता। पर निक्की भी घर की दारोगा है। उसके रहते कुछ भी गड़बड़ नहीं हो सकती। घर में उसका सब पर रोब चलता है। मजाल है किसी की, जो कमरे का पंखा चलता छोड़ दे, गीजर बंद करना भूल जाए, ऊंची आवाज में टीवी चला ले। कब खाना खाया जाएगा, कब पढ़ाई होगी, कब टीवी देखा जाएगा यह सब निक्की ही तय करती है। दादी की शह पर उसके हौंसले और बढ़े हुए हैं। घरवाले उसे हिटलर कहते हैं।
जब तक निक्की कमरे में आती, पापा लंबे घूंट से चाय का कप खाली कर चुके थे।
‘मैं… मैं चाय पी चुका, ठंडी होने से पहले, सचमुच’, पापा हड़बड़ाते हुए बोले।
‘हूं…’, निक्की ने सिर हिलाया, ‘पर मैं तो दूसरी शिकायत लेकर आई थी?’
‘दूसरी? कौन-सी?’ पापा हैरानी से बोले।
‘वॉशबेसिन का टैप किसने खुला छोड़ दिया था?’
पापा लैपटॉप पर नजर गड़ाए-गड़ाए थक जाते थे। उनकी आदत थी कि बीच-बीच में उठ कर ठंडे पानी से आंखें धो लिया करते थे।
‘नहीं-नहीं, मैंने तो बंद कर दिया था। कोई और रहा होगा। रजत होगा। चाहे पूछ कर देख लो। सच कह रहा हूं।’ पापा अटक-अटक कर बोले।
‘और कोई नहीं, सिर्फ आप थे। आपने बंद जरूर किया था, मगर पूरी तरह से नहीं।’
‘पर यह तो बहुत छोटी-सी गलती है। इसके लिए…’ पापा ने कहा।
‘छोटी-सी गलती?’ इससे पहले कि पापा बात पूरी करते निक्की शुरू हो गई। ‘आपको पता है कि पानी हमारे जीवन के लिए कितना महत्त्वपूर्ण है? भले हमारी धरती का दो तिहाई हिस्सा पानी से ढका है, पर उस दो तिहाई हिस्से में पीने योग्य पानी का प्रतिशत सिर्फ ढाई है। बाकी पानी खारा है, जो हमारे किसी काम का नहीं। इस ढाई प्रतिशत में भी सिर्फ एक प्रतिशत पानी तरल रूप में है, बाकी ग्लेशियरों में जमा है। आपको पता है कि पानी की बर्बादी करके आप आने वाली पीढ़ियों के लिए कितना गलत कर रहे हैं?’
पापा ने हाथ जोड़ लिए, ‘ठीक है, आगे से ऐसा नहीं होगा।’
निक्की लौटी तो लॉबी में बैठे चाचा अखबार पढ़ रहे थे। लॉबी में ट्यूब लाइट जल रही थी। निक्की ने आगे बढ़ कर लाइट बंद कर दी। चाचा नाराज होते हुए बोले, ‘निक्की… मैं पढ़ रहा हूं न?’
‘तो पढ़ने के लिए दिन में लाइट जलाने की जरूरत पड़ती है क्या?’ कहते हुए निक्की ने खिड़की के परदे हटा दिए।
चाचा की नाराजगी का गुब्बारा फुस्स हो गया। वे झेंपते हुए बोले, ‘सॉरी…’
तभी उन दोनों की बातचीत सुन कर मम्मी वहां आ गर्इं। निक्की ने मम्मी की ओर देखते हुए शिकायती लहजे में टोका, ‘मम्मी आप शायद कुछ भूल रही हैं…!’
‘उफ…’ मम्मी उल्टे पैरों वापस दौड़ीं। उन्होंने कमरे का पंखा चलता छोड़ दिया था।
‘ओफ्फोह! आप लोगों को समझ में क्यों नहीं आता है कि बिजली बचाना कितना जरूरी है। हमारे पास पैसे हैं, हम बिल भरने में समर्थ हैं, तो इसका मतलब यह नहीं कि बिना जरूरत के बिजली फूंकें…’
‘बस करो जी, बस करो। हमने मान ली अपनी गलती।’ चाचा हाथ जोड़ कर दुहरे होते हुए बोले।
निक्की हंस पड़ी।
तभी दादी ने प्रवेश किया। वह नाली में कागज और रैपर डालते बच्चों को डांट पिला कर आई थीं। कहने लगीं, ‘इस घर में कोई भुलक्कड़ है, कोई आलसी। कोई लापरवाह, कोई कामचोर। एक अकेली बेचारी बच्ची किस-किस को समझाए।’
दादी को देखते ही निक्की उनसे लिपट कर बोली, ‘दादी, कल मेरे स्कूल में पेंटिंग कंपटीशन है। मैंने पेंटिंग तो तैयार कर ली है, पर उसका फ्रेम बनाने के लिए कुछ सामान चाहिए। आप मेरे साथ बाजार चलेंगी?’
‘क्यों नहीं मेरी बच्ची, बस अभी तैयार होकर आती हूं।’
निक्की दादी के साथ बाजार चली गई।
निक्की के जाते ही मम्मी ने रजत को आवाज दी, ‘कहां हो बेटा? जल्दी-जल्दी होमवर्क निपटा लो। वरना, निक्की आते ही खबर लेगी।’
मम्मी के दोबारा पुकारने पर रजत कमरे से निकला तो उसका चेहरा लटका हुआ था।
‘क्या हुआ?’ मम्मी ने हैरानी से पूछा।
रजत कुछ न बोला। बस मम्मी का हाथ पकड़ कर दीदी के कमरे की ओर ले गया। कमरे का दृश्य देखते ही मम्मी के होश उड़ गए। निक्की की पेंटिंग जमीन पर पड़ी थी और उस पर दूध का गिलास औंधा पड़ा था। पेंटिंग का रंग दूध में घुल कर पूरे कमरे में फैल रहा था।
मम्मी ने सिर पकड़ लिया, ‘हे भगवान! यह कैसे हुआ?’
‘मुझसे गिर गया…’ रजत सिसकता हुआ बोला।
‘निक्की ने कितनी मेहनत से यह पेंटिंग तैयार की थी। अब तो वह आते ही सारा घर सिर पर उठा लेगी। अम्मा भी बहुत डांट पिलाएंगी।’ मम्मी की समझ में नहीं आ रहा था कि वे क्या करें।
पापा और चाचा को पता चला तो वे भी बहुत घबराए। सबने रजत को खूब डांट पिलाई। पर रजत को डांट लेना समस्या का हल नहीं था। आपस में सलाह-मशविरा हुआ। सबने तय किया कि सबूत मिटा कर सारा इल्जाम बिल्ली पर मढ़ दिया जाए। योजना के अनुसार सफाई अभियान शुरू हो गया।
पर जब कोई काम कम समय में निपटाना हो तो घड़ी की सुइयां ऐसे भागती हैं जैसे टेबिल फैन। अभी पूरा काम निपटा भी नहीं था कि निक्की और दादी लौट आर्इं। सबके सब घबरा गए कि अब क्या होगा?
किसी को कुछ बताने की जरूरत नहीं पड़ी। घर में कदम रखते ही निक्की को सारा माजरा समझ में आ गया। पेंटिंग की ऐसी हालत देख कर उसका पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया।
‘किसने किया यह सब?’ वह चीखी।
एक पल को घर में सन्नाटा छा गया। हाथ में बाल्टी-वाइपर लिए खड़े पापा और चाचा जैसे स्टेच्यू हो गए। मम्मी की जुबान तालू से चिपक गई। रजत के चेहरे का रंग उड़ गया।
‘सब काम खराब कर दिया। इस मूर्ख रजत के दिमाग में तो कोई बात घुसती ही नहीं। कितनी बार मना किया कि मेरे कमरे की ओर मत जाया करो। पर कोई बात कान से सुने तब न?’ कहते-कहते निक्की मम्मी-पापा की ओर मुड़ी और कहने लगी, ‘पर आप लोग तो समझदार हैं न? आप लोगों ने भी नहीं सोचा?’
‘वो, बेटा दरअसल…’ पापा हकलाते हुए बोले।
‘दरअसल क्या पापा? आपको पता है फर्श साफ करने के लिए आप लोगों ने कितना पानी बर्बाद कर दिया।’
‘पानी…!’ सबने हैरानी से एक-दूसरे की ओर देखा। मम्मी बोलीं, ‘पर बेटा तुम्हारी पेंटिंग…’
‘उफ…’ निक्की झुंझलाई, ‘आप लोगों को पेंटिंग की पड़ी है? पानी की जो बर्बादी हुई उसकी कोई फिक्र ही नहीं। यही काम पोछा लगा कर भी तो हो सकता था। पेंटिंग तो दोबारा बन जाएगी। पर क्या पानी बनाया जा सकता है।…’
निक्की शुरू थी और सारे लोग सिर झुकाए उसकी बातें सुन रहे थे।
