प्रकाश मनु
बसे कुक्कू नानी के पास रहने गोगापुर आया है, उसके पर निकल आए हैं। वह बस सारे दिन उड़ता ही रहता है। पता नहीं किस दुनिया में, कहां-कहां के चांद-तारे तोड़ कर लाता है, उसे कुछ होश ही नहीं। और नानी भी तो कितना प्यार करती हैं उसे। किसी बात के लिए टोकती ही नहीं। वह सारे-सारे दिन सत्ते, देबू, पप्पू, हरिया और गुड्डन के साथ कभी गेंदतड़ी खेलता है, कभी दौड़ा-दौड़ी, कभी किल-किल कांटे, तो कभी कबड्डी। कभी पतंग उड़ाने की धुन आती है, तो फिर कब सुबह से शाम हो गई, कुछ पता ही नहीं चलता। बस, आंखें आसमान पर टंग जाती हैं।
सो, कुक्कू को वाकई गोगापुर भा गया है। शहर से आए उसे कुछ महीने ही तो हुए हैं, पर इतनी जल्दी गोगापुर बिल्कुल अपना हो गया। उसका चप्पा-चप्पा उसने देख लिया है। गांव में सब लोग उसे जानते हैं, प्यार भी बहुत करते हैं। और भोली नानी तो इतनी अच्छी हैं कि कुक्कू ‘नानी…नानी…नानी…’ बस सारे दिन नानी की ही माला जपता है।
पर भोली नानी ने, जो कुक्कू को कभी टोकती नहीं थीं, एक दिन आखिर टोक ही दिया। बोलीं, ‘अरे कुक्कू, तेरे दांत कैसे हो रहे हैं?’
‘दांत…! क्या हुआ मेरे दांतों को, नानी?’ कुक्कू अचकचाया।
‘अरे, ये तो बड़े खराब हो रहे हैं, जैसे कीड़ा लग गया हो।… तू आजकल ठीक से मंजन, कुल्ला-वुल्ला नहीं करता क्या?’
‘करता हूं नानी, करता हूं…!’ कुक्कू ने नानी को बेफिक्र करते हुए कहा।
‘तो फिर, क्या हुआ तेरे दांतों को? ऐसे तो बहुत जल्दी तेरे सारे दांत गिर जाएंगे और तू दंदफद्दा हो जाएगा!’
‘दंदफद्दा क्या, नानी…?’
‘जिसका मुंह बुड्ढों जैसा हो, पोपला-पोपला!’ कह कर नानी हंसने लगीं।
‘वाह-वाह नानी, फिर तो मजा आएगा। मेरा मुंह बुड्ढों जैसा हो जाएगा, बुड्ढों जैसा… वाह!’ कुक्कू को मजा आ गया और वह उठ कर नाचने लगा।
पर इतनी देर में नानी कुछ तय कर चुकी थीं। उन्होंने सोच लिया, अब कुक्कू को टॉफियां खाने के लिए पैसे देना बंद।
इससे कुक्कू की मुसीबत आ गई। उसे तो टॉफियां खाना अच्छा लगता था। कभी मीठी संतरे वाली गोलियां, कभी आम जैसी रसभरी, कभी नारियल वाली, तो कभी चूरन वाली खटमिट्ठी। हर टॉफी का अपना मजा था। सो कुक्कू, रोज शाम को नानी से कहता, ‘नानी नानी, पैसे दो, टॉफियां लेनी हैं।’
नानी हर बार कुक्कू को एक रुपए का सिक्का निकाल कर देती थीं। कुक्कू दौड़ा-दौड़ा जाता। अपनी मनपसंद टॉफियां खरीदता और उन्हें जेब में रख, उछलता-कूदता घर आ जाता।
पर ज्यादा टॉफियां खाने से कुक्कू के दांत खराब होने लगे। कभी-कभी पेट में भी दर्द होता। अब नानी टॉफी के लिए पैसे देने में आनाकानी करने लगी थीं।
तब कुक्कू ने दूसरा तरीका निकाला। वह चुपके से नानी के बटुए में से पैसे निकाल कर ले जाता। टॉफियां खरीद कर बाहर ही खा लेता। फिर उछलता-कूदता घर आ जाता।
नानी कुछ दिनों से देख रही थीं, बटुए में रखे पैसे कम हो जाते हैं। समझ गर्इं, जरूर कुक्कू की शरारत है। पर कुक्कू से पूछा तो वह हंसते-हंसते बोला, ‘मैं क्या जानूं नानी।’
अब नानी क्या कहतीं? बस, चुप्पी मार कर बैठ गर्इं। लग रहा था, उन्हें अंदर ही अंदर कुक्कू की बात का यकीन नहीं है। पर क्या कहें, कुछ समझ नहीं पा रहीं।
कुक्कू बड़ा खुश था कि उसकी चोरी नहीं पकड़ी गई और वह साफ बच निकला।
ऐसे ही कई दिन निकल गए। कुक्कू रोज रंग-बिरंगी मीठी टॉफियां खाता और मन ही मन खुश होता कि नानी को तो कुछ पता ही नहीं। वाह रे वाह, मैं!
कभी-कभी वह अपने पड़ोस में रहने वाले दोस्त सत्ते को भी टॉफियां खिलाता। फिर वे गप्पें लड़ाते हुए खेतों की ओर घूमने निकल जाते। या फिर खेल के मैदान में डट जाते।
एक दिन बातों-बातों में सत्ते ने पूछ लिया, ‘कुक्कू, रोज-रोज तुम्हारे पास कहां से आते हैं पैसे?’
‘नानी देती है न!’ कुक्कू ने मुस्कराते हुए कहा।
‘नानी रोज-रोज टॉफियां खाने को दे देती हैं पैसे?’ सत्ते को ताज्जुब हुआ।
अब कुक्कू फंस गया। उसने सोचा, सत्ते से कुछ भी छिपाने की क्या जरूरत है? तो उसने सत्ते को कान में सब कुछ बता दिया।
सुन कर सत्ते के होंठों पर बड़ी अजीब-सी मुस्कान आ गई। गर्दन नचाते हुए बोला, ‘ओहो, अब समझ में आ गई तेरी चालाकी।… पर कुक्कू, यह तो ठीक नहीं। कभी नानी ने देख लिया तुझे बटुए से पैसे चुराते हुए तो?’
‘अरे, पग्गल, नानी देखेंगी कैसे? वो तो रोज दोपहर को दो से चार बजे तक आराम करती हैं। बड़ी गहरी नींद सोती हैं। बस, तभी मैं चौकी पर चढ़ कर अलमारी के ऊपर वाले खाने में रखे उनके बटुआ से पैसे निकाल लेता हूं। उस बटुए में तो ढेर सारे नोट और सिक्के होते हैं। अठन्नी-चवन्नियां भी। मैं एक अठन्नी या रुपया ले लूं तो भला नानी को क्या पता चलेगा?’ कुक्कू हंसा।
फिर बोला, ‘नानी कहती हैं, कुक्कू टॉफी मत खाओ, दांत खराब हो जाते हैं। अब बताओ, बच्चे टॉफी न खाएं तो टॉफियां खाने के लिए क्या चांद-सितारों से लोग आएंगे?… ये बड़े लोग भी ना, कुछ समझते नहीं।’
सुन कर सत्ते जोर-जोर से हंसने लगा। कुक्कू भी।
फिर एक दिन की बात, दोपहर का समय था। नानी अपनी खाट पर लेटी हुई थीं। कुक्कू चुपके से उठा। अलमारी के ऊपर वाले खाने में रखे उनके बटुए को उठा लिया। अभी वह बटुए से पैसे निकाल ही रहा था कि अचानक अजीब-सी भरभराई आवाज सुनाई दी, ‘ठहरो…!’
कुक्कू चौंका। अरे, यह कौन-सी बला आ गई! उसकी टांगें थर-थर कांप रही थीं। घबरा कर बोला, ‘तुम… तुम कौन बोल रहे हो? क्या भूत…?’
‘नहीं-नहीं, मैं बटुआ बोल रहा हूं।’ फिर वही आवाज सुनाई दी, ‘साफ-साफ कह दो, आज तक कितने पैसे चुराए हैं तुमने?… नहीं तो तुम एकदम छुटकन्ने होकर इसी बटुए में बंद हो जाओगे, मक्खी की तरह!’
‘क्या…! मक्खी की तरह…?’ कुक्कू की हालत खराब।
‘हां, बिल्कुल छोटी-सी मक्खी की तरह। फिर इसमें बंद होकर अंदर ही अंदर रोते रहना…!’
‘नहीं-नहीं, ऐसा मत करना। मैं साफ-साफ बताए देता हूं।’ कुक्कू रोआंसा हो गया, ‘अभी सिर्फ पंद्रह दिन से मैंने यह काम शुरू किया है। रोजाना कभी अठन्नी, कभी एक रुपया निकालता हूं, नानी जब दोपहर में सो जाती हैं, तब। पर आगे से यह गलती नहीं करूंगा, कभी नहीं…!’
‘तो ठीक है, मुझे उसी जगह रख दो, जहां से तुमने उठाया था।’ फिर वही अजीब-सी भरभराई आवाज सुनाई दी। एकदम डरावनी।
कुक्कू ने झटपट बटुआ रखा और अपनी खाट पर आकर लेट गया। देखा, नानी भी अपनी चारपाई पर उसी तरह लेटी हैं। उसका मन हुआ, वह नानी को उठा कर सारी बात बताए, पर अंदर ही अंदर वह डर भी रहा था।
उस दिन के बाद जाने क्या हुआ, कुक्कू ने खुद टॉफियां खाना कम कर दिया। नानी कभी-कभी टॉफी के लिए पैसे देतीं तो कुक्कू गुनगुन करके कहता, ‘नहीं नानी, रहने दो।’
हां, उसके बाद एक-दो बार कुक्कू ने नानी से डरते-डरते यह जरूर पूछा, ‘नानी-नानी, क्या तुम्हारा बटुआ जादू वाला है… बोलता भी है?’
पर नानी कभी सीधे-सीधे इसका जवाब नहीं देतीं। हंस कर कहती हैं, ‘रहने दे कुक्कू, बटुआ भी कहीं बोलता है। तूने जरूर कोई सपना देखा होगा।’
