लोकेश को किताबें पढ़ने का बड़ा शौक था। लेकिन पढ़ने के इस शौक से उसे एक पुस्तकें चुराने की लत लगई गई। एक दिन वह अपने दोस्त मनोज के साथ वाचनालय में पत्रिकाएं पढ़ रहा था। लोकेश ने थोड़ी देर तो पुस्तक पढ़ी और बाद में उसे अपनी कमीज के अंदर छिपा लिया। मनोज ने लोकेश को ऐसा करते देख लिया। मनोज ने उसका हाथ पकड़ा और कहा, ‘यह क्या कर रहे हो लोकेश।’लोकेश बोला, ‘कुछ नहीं।’‘झूठ बोलते हो, तुमने अभी पुस्तक चुराकर अपनी कमीज के अंदर छुपाई है।’ मनोज ने कहा।यह सुनते ही लोकेश का मुंह उतर गया। वह घबराया-सा बोला-‘मनोज वह क्या है, छोटी बहन पिंकी से मैं कहकर आया था कि उसके लिए शाम को मैं कहानियों की किताब लेकर आऊंगा।’ ‘लेकिन स्कूल के वाचनालय से चुराकर ही क्यों ? क्या, तुम इसे अपने नाम ‘ईशू’ कराकर नहीं ले जा सकते ?’ मनोज ने कहा। लोकेश बोला-‘सर इतनी किताबें कहां देते हैं। वे तो महीने में दो बार ही देते हैं। मुझे रोज-रोज नई किताबें पढ़ने का शौक है।’ ‘नहीं, यह तो गंदी आदत है। आज तुम स्कूल से चुरा रहे हो। कल कक्षा में दूसरे साथियों की चुराओगे ?’ मनोज ने कहा।
‘नहीं, मैं ऐसा नहीं करूंगा।’ उसने कहा। ‘तो फिर स्कूल से क्यों चुराते हैं।’ ‘स्कूल का माल तो अपना सबका ही है।’ ‘सबका ही तो है तुम्हारे अकेले का तो नहीं। फिर यह चोरी की आदत तो तुम्हारी बुरी लत है। पता है तुम स्कूल में चोर कहलाने लग जाओगे। क्या तुम चाहते हो कि तुम्हारी यह बात मैं सबको बता दूं ? मैं अभी प्रधानाध्यापकजी को तुम्हारी शिकायत करके रंगे हाथ भी पकड़वा सकता हूं।’
मनोज की इस बात से लोकेश बुरी तरह डर गया। वह रुआंसा होकर बोला-‘मनोज मैं आइंदा किताबें नहीं चुराऊंगा। मुझे माफ कर दो। यह बात तुम किसी से भी मत कहना।’
तो फिर किताब कमीज के अंदर से निकाल कर मेज पर रख दो।लोकेश ने किताब को मेज पर रख दिया, तब मनोज बोला-‘अब चलो कक्षा में और सुनो शाम को मैं तुम्हारे साथ तुम्हारे घर चलूंगा।’लोकेश घबराकर बोला-‘मेरे पापा से मत कहना मनोज यह बात। वरना वे मुझे बड़ी जोर से डांटेंगे?’‘नहीं, मैं तुम्हारे पापा से कुछ नहीं कहूंगा।’ मनोज ने कहा। शाम को छुट्टी हुई तो मनोज लोकेश के साथ उसके घर गया। उसे सामने ही पिंकी मिल गई। वह पिंकी से बोला-‘क्यों पिंकी तुम्हें किताबें पढ़ने का बड़ा शौक है न ?’हंसती हुई पिंकी बोली-‘हां, भैया मेरे लिए रोज-रोज कहानियों की नई किताबें लाते हैं। सच भैया मेरा बड़ा ध्यान रखते हैं। मुझे प्यार करते हैं।’‘लेकिन तुम्हें शायद यह पता नहीं है कि लोकेश तुम्हारे लिए यह किताबें वाचनालय से चुराकर लाता है ?’ मनोज ने कहा।
सुनते ही पिंकी का मुंह उतर गया। वह बोली-‘चुराकर?’‘हां, चुराकर। वह तुमसे इतना प्यार करता है कि तुम्हें किताबें पढ़ने देने के लिए पुस्तक चुरानी पड़ती है।’
‘लेकिन मैंने कभी उससे इस तरह किताबें चुराकर लाने के लिए नहीं कहा।’‘तुमने नहीं कहा लेकिन वह तुम्हारी पढ़ने की आदत और प्यार के लिए किताबें चुराता है। लेकिन, तुमने कभी यह भी पूछा कि वह रोज-रोज नई-नई किताबें कहां से लाता है।’ मनोज ने पूछा।‘नहीं, मैं तो यही सोचती रही कि किताबें स्कूल से मिलती होंगी।’ पिंकी ने कहा।‘नहीं, वह किताबें चुराकर लाता रहा।’‘यह तो बहुत बुरा किया भैया ने ?’‘मैं, अभी पापा को आने दो, यह बताती हूं।’ पिंकी ने कहा।मनोज बोला-‘नहीं पिंकी, पापा से कुछ नहीं कहना। मनोज ने चोरी नहीं करने की शपथ ले ली है। यह बात मैंने तुम्हें इसलिए बताई है कि ताकि तुम आगे से किताब लाने के लिए लोकेश को विवश न करो।’ तभी लोकेश के पापा भी वहां आ गए। मनोज बोला-‘अंकल नमस्ते।’‘नमस्ते बेटा, कहो कैसे हो।’‘ठीक हूं, अंकल। आपसे एक काम था।’‘अरे वाह बोलो। तुम काम बताओ तो उसे करने में आनंद आएगा बेटा।’ वे बोले।अंकल आपके आॅफिस में पुस्तकालय तो होगा।‘क्यों नहीं, हमारे यहां बहुत ही अच्छा पुस्तकालय है। उसमें बच्चों की भी अच्छी-अच्छी पुस्तकें हैं।’‘लेकिन आप कभी हमारे लिए तो किताबें लाते ही नहीं।’‘अरे बेटा मुझे न तो पढ़ने का शौक ही है और फिर मैं थोड़ा आलसी भी हूं।’‘आप नहीं पढ़ते तो क्या हम भी नहीं पढ़ें। आप तो जानते हो मुझे, लोकेश और पिंकी को खाली समय में कहानियों की किताबें पढ़ने का कितना शौक है।’ मनोज बोला।वे बोले-‘अरे हां, वह तो है। पिंकी को देखो न, दिनभर पता नहीं कहां-कहां से किताबें लाकर पढ़ती ही रहती है।’ ‘इसीलिए तो कह रहा था-अंकल, कल से हमारे लिए किताबें लाओगे।’‘जरूर लाऊंगा मनोज बेटा। मुझे पहले क्यों नहीं बताया तुमने।’‘बस आज बता दिया न आपको।’फिर तो दूसरे ही दिन से लोकेश के पापा अपनी पुस्तकालय से नई-नई किताबें लाने लगे। लोकेश ने किताबें चुराना छोड़ दिया और उसने मनोज को गलत रास्ते पर भटकने से बचाने के लिए धन्यवाद भी दिया। १
