शिखर चंद्र जैन
कल-कल बहती विशाल कांगो नदी के किनारे बसा हुआ था घना और हरा-भरा कांगो वन। वन के अंतिम छोर पर एक घनी झाड़ी में रहती थी नन्ही सी भूरी गौरैया। उसने बड़ी मेहनत से खूबसूरत सा घोंसला बनाया था अपना। प्यार से सब उसे भूरी मैडम कहते थे। लेकिन कांगो वन का एकमात्र हाथी- एलीफैंटा- उसे नन्ही मूर्ख चिड़िया समझता था। एक दिन की बात है। सुबह से अनाज जुटाती-जुटाती भूरी जब थक गई तो दोपहर में अपने घोंसले में आकर सुस्ताने लगी। वहां उसके अंडे रखे थे। भूरी गौरैया गहरी नींद में सो रही थी। तभी एक भयानक आवाज सुनकर वह घबरा गई। उसने घोंसले से बाहर झांककर देखा। एलीफैंटा हाथी उसी झाड़ी की ओर बढ़ा चला आ रहा था। झाड़ी में गौरैया के अंडे थे। झाड़ी बुरी तरह हिलने लगी। गुस्साई गौरैया झाड़ी के ऊपर उड़कर आई और एलीफैंटा पर चिल्लाई, ‘तुम फिर आ गए मेरी झाड़ी को हिलाने! इस तरह बार-बार हिलाने से इनमें से बच्चे कैसे निकलेंगे?’
एक कमजोर और छोटी सी चिड़िया के इस तरह से डांटने पर एलीफैंटा को अचरज हुआ। वह हंस करना बोला, ‘माफ करना भूरी मैडम। लेकिन मैं तो झाड़ी से दूर हूं। हो सकता है वह हवा से हिली हो।’ गौरैया गुस्से से बौखालाई गई थी। बोली, ‘मैं तुम्हारी हरकतों से तंग आ चुकी हूं। अब तुमने इस झाड़ी को छुआ भी, तो मैं तुम्हें एक मजबूत रस्से से बांध दूंगी ताकि तुम हिल न सको।’ यह सुनकर हाथी जोर-जोर से हंसने लगा और बोला-‘मुझे बांधोगी?’ उसने भूरी गौरैया की बात को हवा में उड़ा दिया और अपनी सूंड को हिलाता और अपने कानों को फड़फड़ाता हुआ नदी की ओर चला गया।
भूरी मैडम अपने अंडों पर बैठ गई। तेज गर्मी से भूरी को प्यास लगने लगी। नदी किनारे एक ऐसी जगह थी जहां पानी के नजदीक घास का एक गुच्छा था। भूरी इसी घास के गुच्छे पर बैठ कर पानी पी लेती थी। उस दिन उसने देखा कि एक विशालकाय मगरमच्छ उस जगह को पूरी तरह से घेरकर लेटा है। ‘तुम फिर से मेरा रास्ता रोक रहे हो?’ भूरी गौरैया ने नाराज होकर कहा, ‘हटो, मुझे पानी पीना है।’ अपनी ताकत के अहंकार में चूर मगरमच्छ बोला, ‘मैं तो यहां से हिलूंगा भी नहीं। अच्छा होगा कि तुम पानी पीने और कहीं चली जाओ।’ भूरी गौरैया ने धमकाते हुए मगरमच्छ से कहा-‘आज मैं तुम्हें छोड़ देती हूं। पर अगर तुम कल भी मुझे यहां दिखाई दिए, तो मैं तुम्हें मोटे रस्से से बांध दूंगी।’ यह सुनकर मगरमच्छ जोर जोर से हंसने लगा। भूरी गौरैया नदी किनारे बनी एक दरार से गंदा पानी पी कर अपने घोंसले की तरफ उड़ गई और अपने अंडों पर जाकर बैठ गई। लेकिन वह गुस्से में थी और हाथी व मगरमच्छ के बारे में गंभीरता से सोच रही थी।
अगली सुबह उसे फिर से हाथी के पैरों की धम-धम आवाज सुनाई दी। जैसे ही उसने झाड़ी को धक्का दिया, अंडे हिलने लगे। फिर उसने भूरी को चुनौती देते हुए कहा, ‘क्या तुम मुझे बांधोगी नहीं?’ भूरी ने कहा, ‘रुको! तुम चिंता मत करो। मैं अब वही तो करूंगी।’ एलीफैंटा ने उसका मजाक उड़ाते हुए कहा- ‘हां मैडमजी! इसीलिए तो मैं यहां आया हूं।’भूरी के घोंसले के पास में ही एक विशाल बरगद का पेड़ था, जिसकी एक लंबी, मोटी लता सबसे ऊपर की शाखा से नीचे लटक रही थी। गौरैया ने अपने मुंह में लता का एक सिरा लिया, नीचे आई और उसे मजबूती से हाथी की गर्दन पर बांध दिया। ऐसा करके वह बोली, ‘अब मैं थक गई हूं। बस जरा पानी पीने नदी पर जा रही हूं। इस बीच, तुम एकदम ऐसे ही खड़े रहो। जब मैं तुम्हें खींचने के लिए कहूंगी तो जितना जोर से खींच सकते हो, खींचना और तब देखते हैं कि क्या तुम अपनी जगह से हिल सकते हो।’
हाथी को भूरी के इतने आत्मविश्वास पर वाकई ताज्जुब हो रहा था। लेकिन वह एकदम स्थिर खड़ा रहा। इस बीच भूरी गौरैया ने लता का दूसरा सिरा अपने मुंह में लिया और नदी की ओर उड़ गई। आज भी मगरमच्छ उसी जगह पूरा फैलकर लेटा हुआ था। उसकी आंखें बंद थीं। गौरैया उसके नजदीक आई तो बोला, ‘ओ भूरी चिड़िया! मैं यहां से नहीं हिलूंगा। अच्छा होगा कि तुम आज भी वैसे ही पानी पी लो, जैसे कल पीया था।’ भूरी गौरैया बोली, ‘लेकिन मैंने तुम्हें कल ही चेतावनी दे दी थी कि अगर तुम फिर से मेरा रास्ता रोकोगे, तो मैं तुम्हें एक मोटे रस्से से बांध दूंगी ताकि तुम बिल्कुल भी न हिल सको।’ मगरमच्छ लापरवाही से बोला ‘जो चाहो करो चिड़िया। मैं डरने वाला नहीं’। मजाक-मजाक में उसने गौरैया को अपने शरीर पर रस्से का दूसरा सिरा बांधने दिया। भूरी जब रस्सा बांध चुकी तो बोली, ‘ जंगल जाकर अब मैं इस रस्से के आखिरी छोर को पकड़ लूं। फिर जब मैं तुम्हें खींचने के लिए कहूं तो जितना जोर तुम में हो खींचना और फिर देखते हैं तुममे कितनी ताकत है।’ मगरमच्छ मन ही मन हंसने लगा।
गौरैया उड़ कर वापस अपनी झाड़ी तक पहुंच गई। जब वह लंबी रस्सी के बीच वाली जगह पर पहुंची तो जोर से चिल्लाई, ‘खींचो।’ हाथी और मगरमच्छ दोनों ने उसकी आवाज सुनी और एक साथ खींचना शुरू कर दिया। दोनों एक दूसरे को विपरीत दिशा में खींचने लगे। पर दोनों ही हार गए। दोनों ही बलशाली थे। पूरी कोशिश करके भी वे रत्ती भर भी न हिल सके।ऐसा दोपहर तक चलता रहा। दोनों पूरी तरह से थक चुके थे। उन्हें ताज्जुब हो रहा था चिड़िया की ताकत पर। हाथी रुआंसा होकर बोला, ‘अगर तुम इस रस्से को हटा दो, तो मैं वादा करता हूं कि फिर कभी तुम्हारी झाड़ी को धक्का नहीं दूंगा।’ उधर मगरमच्छ ने भी वेदना भरे स्वर उसे पुकारा, ‘ओ भूरी सी प्यारी सी चिड़िया! अब इस रस्से को मेरी गर्दन से हटा दो, वरना गर्दन टूट ही जाएगी। मैं अब कभी भी नदी किनारे तुम्हारा रास्ता नहीं रोकूंगा।’
गौरैया ने जोर से कहा- ‘ठीक है,अब खींचना बंद कर दो और मैं रस्सा हटा देती हूं।’रस्सा हटते ही हाथी ने राहत की सांस ली और दम दबाकर जंगल की ओर भागा। उधर मगरमच्छ भी नदी की गहराई में दुबक गया। भूरी गौरैया वापस अपने घोंसले में आकर अंडों को सेने लगी। जल्दी ही अंडे फूटे और तीन छोटे-छोटे बच्चे बाहर निकल आए। उसकी खुशी का कोई ठिकाना न था। जंगल के दूसरे पशु-पक्षियों को जब भूरी गौरैया की चतुराई का पता चला तो सबने मिलकर गौरैया के मां बनने की पार्टी की। १

