आओ भैया नब्ज टटोलें,
दोनों मिल कर बादल की।
दिल की सुनें धड़कने जांचें,
कितना जल वे लाए हैं।
या फिर ताम झाम दिखला कर,
उड़ जाने को आए हैं।
कुछ बादल तो साफ दिख रहे,
धोती पहने मलमल की।
कुछ हैं रुई के फाहे जैसे,
कुछ हैं क्षीर समुंदर से।
किन्हीं-किन्हीं के रूप दिख रहे,
हाथी घोड़े बंदर के।
इक बादल में मुझे दिख रही,
मोटी मौसी बुलबुल की।
ऐसा मंत्र चलो हम फूंकें,
बादल बरसें झरर-झरर,
ताल तलैया नदी भरें तो,
मेढक बोलें टरर-टरर।
फूट पड़ें झरने धरती से,
ध्वनि सुन पड़े कलकल की।
लारे लप्पा करते बादल,
बरसें धड़म धड़ाके से।
नहीं मरे अब कोई बुढ़िया,
इस धरती पर फांके से।
भैया नजर रखें बदली पर,
खबर रखें हम पल-पल की।
शब्द-भेद
कुछ शब्द बोलने में एक जैसे जान पड़ते हैं, इसलिए उन्हें लिखते समय अक्सर गड़बड़ी हो जाती है। ऐसी गड़बड़ी से बचने के लिए आइए उनके अर्थ समझते हुए उनका अंतर समझते हैं।
मांड / मांड़
मांड राजस्थान में गाया जाना वाला एक प्रकार का गीत है।
जबकि
चावल पकाने के बाद निकलने वाला पानी मांड़ कहलाता है।
मांडना / मांड़ना
राजस्थान में दीवारों और फर्श पर बनाए जाने वाले चित्र को मांडना कहा जाता है।
जबकि
किसी चीज को मलने को मांड़ना कहते हैं, जैसे आटा मांड़ना
