मीना बुद्धिराजा
कहा जा रहा है कि यह कविता के लिए कठिन समय है। पर संवेदना के बंजर होते परिदृश्य में भी अगर कविता लिखी जा रही है, तो यह बड़ी आश्वस्ति है। कविता अंतत: स्मृतियों, अनुभवों, उम्मीदों और संवेदनाओं की मृत्यु से मुठभेड़ करती है। मानवीय सच की सबसे विश्वसनीय अभिव्यक्ति कविता में ही संभव है। तमाम विषमताओं, अन्याय और क्रूरताओं के बीच कविता संघर्ष का स्वप्न और प्रतिरोध की पक्षधर है। एक बेहतर दुनिया की तलाश में अवरुद्ध मार्गों के आगे हम बार-बार कविता की तरफ लौटते हैं। मानव नियति के कठिन प्रश्नों को उठाते हुए कविता सत्ता और शक्ति-संरचनाओं के समक्ष छद्म चेतनाओं का विरोध करते हुए मानव की बुनियादी अस्मिता को बचा लेना चाहती है। अप्रत्याशित और भयावह परिस्थितियों में कविता हमारे भौतिक और आत्मिक विस्थापन को प्रेम, उम्मीद और आकांक्षाओं के जीवन-राग से परिपूर्ण कर देती है। अस्तित्वगत उद्विग्नता, आत्मरिक्तता और उदासी को कविता किसी कृत्रिम उपभोग से नहीं भरती, बल्कि एक मुक्ति और समर्पण बन कर वह उसकी क्षतिपूर्ति बन जाती है। तात्कालिकता के निर्वैयक्तिक, निरपेक्ष और आत्मसंतुष्टि के आवरण को भेदते हुए कविता मानवीय चेतना के इतिहास का शाश्वत अंग बन जाना चाह्ती है। वास्तव में कविता उस अनुपस्थिति से एक निरंतर संवाद है, जो हमारे आत्मिक विलाप को एक आश्रय स्थल देती है। कविता में उन्हीं बुनियादी अधिकारों, स्वप्नों और मूल्यों का संघर्ष होता है, जो हमसे छीन लिए गए और जिनका विकल्प बन कर वह सबसे ईमानदार और स्पष्ट रूप में सामने आती है। निरर्थक शोर और अहंकार से भरे समय में कविता एक खामोशी, आत्मविश्वास और भाषा की संजीदगी को अपने मे आत्मसात कर लेती है।
मानवीय नियति और भविष्य की व्यापक चिंताओं को कविता अपने संकेतों, गहन अर्थों और पारदर्शिता के गहरे स्थलों में समा लेती है। उस समय के विरुद्ध जब सभी सजीव चीजें निष्प्राण की जा रही हैं, उस कठिनतम समय में भी कविता सीधे कविता के रूप में ही पाठक के सामने आना चाहती है। अपने को सभी प्रतिमानों और प्रतिबंधों से मुक्त करके वह समय की साक्षी बन जाना चाहती है। आत्मध्वंस और यातनाओं के अनेक वैश्विक परिदृश्यों के बीच कविता का आगमन दुर्निवार है और अनिवार्य भी। हमारे समय की तमाम विरोधाभासी स्थितियों की तहें खोलते हुए कविता तटस्थता के साथ इतिहास का अतिक्रमण कर जाती है। क्योंकि समस्त विडंबनाओं और त्रासदियों में भी उस निष्कपट सच्चाई, प्रेम और संवेदना को वह बचा लेती है, जो मानवता के लिए सबसे बड़ी जरूरत है। कवयित्री विस्वावा शिंबोर्स्का कविता में उस अप्रत्याशित और असाधारण सच की संभावनाओं को तलाश करती हैं, जो मानव अस्तित्व की जटिलताओं के सरल समाधानों में यकीन नहीं करती। वे उसके मूलभूत प्रश्नों से टकराते हुए तब कहीं मानव नियति के शाश्वत सवालों तक पहुंचती हैं। कविता उनके अनुसार ताकत की दुनिया में नैतिक प्रतिरोध का एक अनिवार्य हिस्सा है। शिम्बोर्स्का कहती हैं- ‘निश्चितता सुंदर है, पर अनिश्चतता उससे कहीं ज्यादा सुंदर।’ हमारे समय की आखिरी बची हुई विश्वसनीय आवाज के रूप में कविता उपस्थित होती है।
कविता की शक्ति हमेशा नई मानवीय संभावनाओं को पाने और खोजने में है। कवि की हर कविता इस बात का जवाब होती है कि वह आरंभ से अंत तक अधूरा और अपर्याप्त है। इसलिए वह हर बार एक नई कोशिश करता है। आज के जटिल और संश्लिष्ट यथार्थ में कवि को उस सच्चाई और उसमें अंतर्निहित तनाव को अभिव्यक्त करने में हमेशा अपनी रचनात्मकता के सूत्र नए सिरे से खोजने पड़ते हैं। वरिष्ठ कवि कुंवर नारायण मानते हैं कि- ‘कविता के वे स्थायी सरोकार कम ही बदलते हैं जिनकी जड़ें मनुष्य की भावनाओं और जीवन के उद्रेकों में होती हैं।’ उनके अनुसार कविता कवि की आत्मीय दुनिया का विस्तार करती है, जिसे हम किसी भी समय और किसी भी परिवेश में आसानी से पहचान सकते हैं, और उसके साथ एकता अनुभव कर सकते हैं। कविता हमेशा एक ज्यादा वृहत्तर जीवन की खोज करती है। हमारी संवेदनाओं का परिष्कार करके दूसरों के सुख-दुख का साझीदार बनाती है।
आॅक्तावियो पाज का कथन है कि- ‘भाषा सबसे पुरानी और सबसे सच्ची मातृभूमि होती है। संपूर्ण विश्व कविता इन सभी मातृभूमियों का महाद्वीप है।’ मनुष्यता कविता का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष है। अपनी आत्मा के जिन संदर्भों में मानव निरंतर अकेला पाया जाता है, वहां कविता मजबूत सहारे की तरह खड़ी हो जाती है। जहां भी मानवता का आदिम संघर्ष है, अन्याय, विभाजन, अलगाव है, उसी बिंदु पर कविता अपना पक्ष चुन लेती है। वैश्विक पूंजी और बाजार के इस नए समय में, जबकि उपभोग के लिए लोकप्रिय कला के रूप मे प्रत्येक सर्जना को उसके वास्तविक संदर्भ से अपदस्थ करके महज उसे एक ‘उत्पाद’ के रूप में बदल देने के प्रयास निरंतर चल रहे हैं। रचनात्मकता और कला का कृत्रिम सौंदर्यीकरण किया जाने लगा है, तो वह एक सार्थक प्रतिरोध और मानवीय अर्थों में अपना प्रतिसंसार रचने की भूमिका खोने लगी है। वहां खुद को मनुष्य बनाए रखना पहली शर्त है, तब कविता एक स्वप्न की तरह हमारे साथ चलती है। कविता मनुष्य और प्रकृति के उन रागात्मक संबधों को नष्ट होने से बचा लेती है, जो बाजारवाद की विकृतियों और उपभोक्तावादी समय के प्रभाव से समाप्त होते जा रहे हैं। पाब्लो नेरूदा ने कहा था- ‘कविता में अवतरित मनुष्य बोलता है कि मैं अब भी एक बचा हुआ अंतिम रहस्य हूं।’
कविता के भीतर भी ये सवाल नए नहीं हैं, पर कविता तमाम संकटों, निराशाओं और अवरोधों के बावजूद अपने महान दायित्वों, अनुभवों और संभावनाओं के साथ निरंतर उपस्थित है। अपनी पूरी कोशिश के साथ आगामी पीढ़ियों को कविता वह समाज देना चाहती है, जहां प्रेम, उम्मीद और स्वप्न हों। अपने अधूरेपन के अहसास के साथ भी कविता हमारे सर्वाधिक निकट है। वह एक साथ ही मंजिल का आभास भी है और एक अथक रास्ता भी है। १
