किसी भी समाज की आत्मकथाएं अपने समय का सबसे प्रमाणिक दस्तावेज होती हैं। आत्मकथाएं परिवार, समाज, संस्कृति और परिवेश में रचे-बसे सौंदर्य, अच्छाई, रंगों, उत्सवों, रीति-रिवाज, संस्कार, संस्कृति, जीवन शैली और व्यक्ति और समाज की सोच से हमें रूबरू कराती हैं। साथ ही समाज में फैली कुरीतियों, कुप्रथाओं, कुमान्यताओं, कुप्रचारों, इंसान की मानसिक बीमारियों और सामाजिक सड़ांध से भी परदा उठाती हैं। साथ ही, इन सबके अलग-अलग व्यक्तियों पर पड़ने वाले अलग-अलग तरह के प्रभावों को भी सामने लाने का भरसक प्रयत्न करती हैं।आत्मकथाएं घोषित तौर पर समाज को ठीक करने का कोई औजार नहीं हैं। लेकिन ये समाज की नब्ज पकड़कर सही मर्ज बताने वाली वैद्य जरूर हैं। लेखिकाओं की आत्मकथाएं भी समाज में फैली विसंगतियों, कुरीतियों, अच्छाइयों का प्रामाणिक दस्तावेज हैं। ये आत्मकथाएं बताती हैं संघर्ष के कितने रंग, रूप, आकार-प्रकार हैं और कैसे पितृसत्ता नए-पुराने रूपों में एक स्त्री को तिल-तिल करके तोड़ती है।
लड़की के बचपन पर पितृसत्तात्मक संस्कार कैसे गिद्ध दृष्टि जमाए रहती है। इसका बड़ा ही अच्छा उदाहरण प्रभा खेतान की आत्मकथा ‘अन्या से अनन्या’ में हमें देखने को मिलता है। ‘अम्मा को मेरा चेहरा, मेरे लंबे-लंबे बाल, मेरा बढ़ता हुआ कद, शरीर पर उभार, और दसवां लगते ही पीरियड का शुरू हो जाना, कुछ भी तो नहीं सुहाता। ठीक से चलो, क्या पैरों की धम-धम आवाज करती चलती हो? शउर से बैठो…कूबड़ क्यों निकाल लेती हो? क्या खो-खो लगा रखी है। खांस रही हो तो खांसे ही जा रही हो…. और यदि मैं खांसी दबाने की कोशिश करती तो, क्या गाय की तरह गरगरा रही है?’ यह है लड़कियों का सहमा, डरा और अपराधबोध से भरा बचपन! हमारे समाज में ज्यादातर लड़कियां ऐसा ही अनाथ और असहाय सा बचपन जीने को विवश हैं ।जबकि पति के सारे सपने और महत्वाकांक्षाएं पहले दिन से ही पत्नी के बन जाते हैं।बचपन की तरह वैवाहिक जीवन के अनुभव भी लेखिकाओं के बिल्कुल अलग हैं। एक पत्नी किसी भी स्तर पर पति को सहयोग न करने भर से खुद को धिक्कारती है, अपराधबोध में रहती है। लेकिन पति द्वारा कदम-कदम पर पत्नियों का तिरस्कार, अपमान, हिंसा, उनकी रचनात्कता की उपेक्षा करना भी पतियों को अपराधबोध से नहीं भरता। पत्नी के सपने और महत्त्वाकांक्षाएं अक्सर ही पति के सपने नहीं बन पाते।
मैत्रेयी विवाह संस्था की सच्चाई से परदा उठाते हुए लिखती हैं ‘पति के साथ असलियत में पत्नी का वह रोल नहीं, जो फेरों के समय वचनों के रूप में बताया जाता है। वादे होते हैं, सहभागिता और एक-दूसरे की इच्छा और जरूरत का सम्मान करने के कौल किए जाते हैं। सब झूठ। सब फरेब। असलियत में हमारा रोल पति की खादिमा, दासी और गुलाम होना है। सलाह-मशविरा कौन करता है, आज्ञा देने का चलन है। पत्नी होकर सम्मान नहीं, अपमान के अभ्यस्त होने में ही कुशल है।’ पितृसत्ता ने विवाह के जिस रूप को पोंिषत किया है उससे लेखिका का गहरा मतभेद है। यहां सवाल विवाह संस्था के विरोध का नहीं है, बल्कि विवाह के भीतर परस्पर बराबरी और सम्मान के हक को चाहने की गहरी तड़प का है।
अक्सर बार-बार टूटने का दर्द स्त्रियां ही उठाती हैं, लेकिन उसके दुखांत प्रभावों से पुरुष, बच्चा, बूढ़ा कोई भी नहीं बचता। ये आत्मकथाएं बताती हैं कि हथियार सिर्फ गोली, बंदूक, तोप, मिसाइल, बम, टैंक ही नहीं होते। सोच, विचार, कुविचार, संघर्ष, और लेखनी भी हथियार हैं। कलम से निकले शब्द और दिमाग में उपजे विचार भी जैविक बमों की तरह दूरगामी असर करते हैं। संघर्ष गुपचुप, धीमे-धीमे भी होता है। लेखिकाओं की आत्मकथाओं में उनका मानसिक विकास और पितृसत्तात्मक संस्कार साफ तौर पर दिखाई देते हैं।
प्रभा खेतान की पूरी आत्मकथा में पितृसत्तात्मक संस्कारों से टकराहट बार-बार दिखाई देती है। ‘एक स्वतंत्र स्त्री के प्रति रखरखाव की भावना क्यों गायब हो जाती है? पुरुष कमजोर स्त्री से ही क्यों प्यार करता है? और सबल स्त्री से चिढ़ता क्यों है?’ वे बार-बार सवाल करती हैं और खोखली मान्यताओं पर चोट करती हैं।
सामाजिक जीवन में इज्जत और नैतिकता को स्त्रियों के संदर्भ में ही अक्सर परिभाषित किया जाता है। इस कारण लेखिकाओं की आत्मकथाओं में इस एकतरफा नैतिकता को फिर से परिभाषित करने की कोशिशें दिखती हैं। रमणिका गुप्ता अपनी आत्मकथा ‘हादसे’ में स्त्रियों पर लादी गई एकतरफा नैतिकता को धिक्कारती हैं। ‘मेरी नजर में…सईदा… का वेश्या की बेटी होना या उनकी मां का वेश्या होना समाज का दोष था। वेश्या होने न होने से ही किसी स्त्री को पतित या सती करार देने को भी मंै गलत मानती थी और इस परिभाषा से असहमत थी।…मैं औरत के संदर्भ में पतित शब्द की परिभाषा से सहमत नहीं हूं। यह शब्द औरत के चरित्र से जोड़ा जाता है और चरित्र का अर्थ केवल औरत के यौन-संबंधों को लेकर ही समझा जाता है। औरत के संदर्भ में चरित्र के अन्य गुण या लक्षण जैसे नैतिकता, शालीनता, ईमानदारी, परस्पर सद्भाव या संवदेनशीलता, बहादुरी और निडरता आदि को नजरअंदाज कर दिया जाता है।’ नैतिकता को सिर्फ स्त्रियों के एकतरफा संदर्भ में परिभाषित किया जाना न सिर्फ बेहद अमानवीय है बल्कि बेहद क्रूर भी है।
इन आत्मकथाओं में दर्ज है कि कैसे कुछ पुरुषों और पितृसत्ता ने मिलकर मातृत्व को रौंदा है। कहीं छोटी-सी बच्ची को मां में बदलकर, कहीं बेटी की मां होने के लिए ताने दे-देकर, कहीं बार-बार स्त्री को गर्भवती बनाकर, कहीं विवाह संस्था से बाहर मां बनने की इच्छा को नाजायज ठहराकर। उन करोड़ों बच्चियों का दर्द इन आत्मकथाओं में दर्ज है, जो बचपन की डोर छूटने से पहले ही मां बन जाती हैं।
अपने निर्णय स्वयं लेने वाली लड़की अक्सर ही गंदी, जिद्दी, बदसूरत, बदचलन के तमगे पाती है। ‘अच्छी लड़की’ बनने के लिए अक्सर ही लड़कियों को अपनी आजादी, निर्णय, विवेक, विचार और सपने संदूक में बंद करके रखने पड़ते हैं। ‘रसीदी टिकट’ में अमृता प्रीतम अपनी किशोरावस्था और अपनी रचनात्मकता की शुरुआत की चर्चा करती हुई लिखती हैं ‘मैं एक क्षण जो मन मर्जी की कविता लिखती थी, दूसरे क्षण फाड़ देती थी और पिता के सामने फिर सीधी-सादी और आज्ञाकारी बच्ची बन जाती थी। मेरे पिता को मेरे कविता लिखने पर आपत्ति नहीं थी….केवल उनका आग्रह था कि मैं धार्मिक कविताएं लिखूं और मैं आज्ञाकारी बच्ची की तरह वही दकियानूसी कविताएं लिख देती थी।….इर्द-गिर्द और दूर-पास की हवा में इतनी मनाहियां और इतने इनकार होते हंै और इतना विरोध कि सांसों में आग सुलग उठती है….’ अच्छी बच्ची बनने की कितनी बड़ी कीमत किसी लड़की को चुकानी पड़ती है ये आत्मकथाएं बताती हैं।
समाज की सबसे सुरक्षित जगह परिवार में लड़कियां कितनी ज्यादा असुरक्षित हैं, इस बात का अंदाजा इन आत्मकथाओं का पढ़कर सहज ही होता है। मैत्रेयी पुष्पा, कुसुम अंसल, प्रभा खेतान और चंद्रकिरण सोनरेक्सा आदि लेखिकाओं की आत्मकथाओं में घर के भीतहर बचपन में होने वाले यौन शोषण के कई उदाहरण है। ये आत्मकथाएं अमानवीय प्रक्रिया का कच्चा चिट्ठा खोलती हैं। स्त्रीकरण की इस क्रूर प्रक्रिया से गुजर कर कैसे एक स्त्री भी पुरुषों की ही तरह पितृसत्ता को पोषित करती है और साथ ही एक नई स्त्री को इस क्रूर प्रक्रिया का अहम हिस्सा बनती है, यहां इसकी भी दास्तान है। स्त्रियां एक तरफ कुपरिणामों को भुगतती रहती हैं, हर तरह का शारीरिक, मानसिक, संवेदनात्मक प्रहार झेलती जाती हैं और साथ ही पितृसत्ता को पोषित भी करती जाती हैं। पितृसत्ता के चक्रव्यूह को तोड़ने का ईनाम, हर्जाना, जोखिम और तरीके एक साथ हमें लेखिकाओं की आत्मकथाओं में देखने को मिलते हैं। ०
बचपन की तरह वैवाहिक जीवन के अनुभव भी लेखिकाओं के बिल्कुल अलग हैं। एक पत्नी किसी भी स्तर पर पति को सहयोग न करने भर से खुद को धिक्कारती है, अपराधबोध में रहती है। लेकिन पति द्वारा कदम-कदम पर पत्नियों का तिरस्कार, अपमान, हिंसा, उनकी रचनात्कता की उपेक्षा करना भी पतियों को अपराधबोध से नहीं भरता। पत्नी के सपने और महत्त्वाकांक्षाएं अक्सर ही पति के सपने नहीं बन पाते।
