लालित्य ललित

सर्दी आते ही अपने पांडेयजी की नाक ऐसे बजने लगती है, जैसे किसी ने लोकल एफएम का टेंटुआ हलके से दबा दिया हो और उसकी आवाज जोर से निकल पड़ी हो। पर जब टपक रही हो तो कैसे उस टपकन को रोकें। चिल्ला भी नहीं सकते। इधर चिल्लाए और उधर नाक टपकी, मानो वह भी इसी फिराक में हो। मेरे सामने मिसेज एक्स का बुटीक है। अक्सर महिलाओं की लाइन लगी रहती है। देख रहा हूं कि नोटबंदी का मसला अब पुराना हुआ। लोगों ने अपने नोट बदलवा लिए और देखते ही देखते फिर से बाजारों में रौनक लौट आई। पहले तो ऐसे लगता था जैसे कोई राष्ट्रीय शोक हो। हर आदमी सदमे में था। सुबह दो पराठे खाकर वीर योद्धा की भांति लाइन में लग जाता था।

पांडेयजी भी ऐसे ही योद्धा और शूरवीर निकले। अपने बदलवा कर अब वे समाजसेवा में अपना समय लगाने निकल पड़े थे। कई बार चोटिल भी हुए। पर मिसेज एक्स के दर्शन लाभ के आगे कई घंटों की थकान, थकान कहां लगती है! मिसेज एक्स हैं ही ऐसी। अगर आपको आपकी कलीग, पड़ोसन, और तो और कामवाली बाई भी कह दे तो आप पर समाजसेवा का भूत ऐसे सवार होता है जैसे सुबह होते ही पार्कों में कई बुजुर्गों को खुजली मचने लगती है कि चार चक्कर तो लगाने ही हैं। आखिर सेहत ठीक तो जग ठीक। यह बात इलाके के ढींगरा साहब पर भी फिट बैठती है। नियम से चक्कर लगाते हैं। उनके साथ आजकल एक दिक्कत आ पड़ी है। कहते हैं, अचानक मन दौड़ने को करता है, लगता है दौडूं और भागूं। कई बार गिरते-गिरते बचा। उनको समझाया कि यह कोई बीमारी नहीं, बल्कि आपकी छिपी हुई अज्ञात भावना है, जो अब बाहर आने को लालायित है। बात मान भी ली। कहते हैं, आप बात दिल से करते हैं, तो असर करती है। राजनीति की बात पर ढींगरा साब को सर्दी का सन्नाटा लग जाता है। कहते हैं- बाऊजी, आजकल तो बाजार में छोटे नोट दीखते नहीं, सब बड़ा नोट दिखाते हैं। मैंने माइनर-सी चुटकी लेते हुए कहा- ऐसा है, हम विकास कर रहे हैं। देश तरक्की के रास्ते पर है। आज जहां देखो खुशहाली है। के्रडिट कार्ड का बोलबाला है। ब्याज दर पहले से कम है। महिलाएं शांत नजर आती हैं। हां जी, वे तो इसलिए शांत नजर आएंगी, उनके नोट जो बदल गए।

देखिए, इतने साल हमने भी सरकार में सेवाएं दी हैं। एक वह जमाना था, एक अब जमाना है। बच्चे पहले तो सुन लेते थे, पर अब अनसुना कर देते हैं। पुराने नोटों जैसा बन चुके हैं हम। बात ढींगरा साब की बिल्कुल वाजिब थी। अगर उनको आप समय-समय पर कुछ नकदी देते रहो तो ठीक, जहां आपने अपने सख्ती बरती, तो उनका रवैया देखो।
सन्नाटे में सर्दी का आलम ऐसा था। जो लाला लोग चल नहीं पाते थे। पर सफेद कुर्तों में झकास नजर आने की बिंदास कोशिश करते थे, उनका आलम यह था। बेशक उनको जमाने भर की शुगर हो, गठिया, धुंधलापन हो, पर मजाल कि अपने चर्म रोगों की भनक भी लगने देंगे। उनका मामला कोई मिसेज एक्स वाला नहीं कि उनको तकलीफ हुई नहीं कि मुहल्ला समाज सेवक बना नहीं। हमारा समाज ऐसा है, जैसा दिखता नहीं, जैसा वह दीखता है, असल में वैसा वह होता नहीं। तो आप भी अपनी समाजसेवा में ध्यान लगाइए, मन लगाइए। फिर फील आएगा- आल इज वेल वाला।

यह मनुष्य का भटकाव है। यह भटकाव आपकी प्रगति में बाधक है। इससे उबर जाओ और सार्वजनिक जगह जाने के लिए कैब का प्रयोग करो। इससे धन का अपव्यय भी थमेगा और आपकी गाड़ी की उम्र भी बढ़ेगी। वर्ना आप जैसे व्यक्तियों का खुलेआम पिटना तय है। अब देखिए न बात कहां से कहां होने लगी। यह आधुनिक विमर्श है, जिसकी प्रस्तावना में भाव था, जो अब निष्कर्ष में शून्य हो गया। यानी जो आया है वह जाएगा भी। कोई किसी को बांध सका है, नहीं न। अगर सुबह-सुबह सैर पर जाने का मन हो तो ढंक कर निकलिए, वरना नाक का बजना तय नहीं, बल्कि फिक्स है। और दूसरी और महत्त्वपूर्ण बात, एक छड़ी जरूर ले लीजिए। कोने वाले गुप्ता जी की कार के पीछे वह झबरा कुत्ता अक्सर राह ताकता है, जैसे शेयर बाजार में उसका पैसा कहीं आपने तो नहीं लगा दिया। कुत्ते अक्सर खतरनाक होते हैं, उनका मन न भी हो तब भी वे अपना जायका बदलने के लिए काट सकते हैं, और उसके लिए उनको किसी का प्रमाण पत्र नहीं लेना पड़ता।

सर्दी के सन्नाटे में पांडेयजी को यह दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ। खुद कहते भी हैं कि ज्ञान कभी जाया नहीं जाता। इससे भविष्य सुधरता है। अचानक उनके मोबाइल पर रामप्यारीजी का संदेश सुनाई दिया- कहां मर गए, यहां छुटका रो रहा है और आप हैं कि जहां-तहां दिव्य ज्ञान के एजेंट बन जाते हैं। घर आ जाओ दूध लेकर, आपका सारा ज्ञान झाड़ती हूं। इस औंचक हमले से अच्छे से अच्छे शूरवीर को दस्त लगने वाजिब थे। क्या सोचा था और क्या निकला। आखिर सन्नाटे में आ ही गए हमारे पांडेयजी। उनकी चाल अब तेज हो गई थी। ०