राजेंद्र भट्््ट
बाबा भारत की सौम्य सांस्कृतिक-दार्शनिक परंपरा की श्रेष्ठतम विभूतियों में से एक हैं। अपने-अपने दायरों में कैद कूपमंडूक मताग्रहियों के बीच बाबा समन्वय और सहिष्णुता की जोत जगाते हैं। वे निगुण-सगुण के बीच समन्वय साधते हैं; ज्ञान-सूर्य और भक्ति-मणि का विवेचन करते हैं; वैष्णव, शैव और शाक्त के बीच पुल बनाते हैं। अपने समय से बहुत आगे हैं बाबा- सच्चे प्रगतिकामी। संस्कृति के प्रकांड विद्वान हैं, पर ‘गिरा-ग्राम्य’ में रामायण रचते हैं। बाबा की विनम्रता देखनी हो तो बाल कांड का प्रारंभ देखिए- यहां सबकी वंदना है, खलजनों की भी। प्रकांड विद्वता और काव्य कौशल के बावजूद, बार-बार अपनी क्षमता को कम से कम बताने की विनम्रता है। पर ऐसे सहिष्णु, सौम्य और विवेकशील बाबा को अचानक गुस्सा क्यों आ जाता है! प्रसंग है कि रामकथा सुनने को इच्छुक पार्वती ने बड़ा तार्किक-सीधा सवाल पूछ लिया कि साधारण मनुष्यों की तरह विरह में दुखी राजकुमार ब्रह्म कैसे हो सकता है- ‘जो नृप तनय सो ब्रह्म किमि।’ जवाब शिव को देना है, जो स्वयं सौम्यता की पराकाष्ठा हैं। पर शिव के जरिए जवाब तो बाबा ही दे रहे हैं। वे एकदम गुस्से में आ गए हैं कि ऐसे सवाल तो अधम, पाखंडी, प्रभुपद विमुख, अंधे, अज्ञानी, लंपट वगैरह-वगैरह करते हैं। वे ही ‘वेद असम्मत’ वाणी बोलते हैं। शिव के बहाने बाबा एकदम उखड़ गए हैं। लगता है यह सवाल और इसका विस्तृत जवाब भी कुछ-कुछ गढ़े हुए से- मैन्युफैक्चर्ड हैं। लगता है, सवाल-जवाब के बहाने बाबा ने ‘वेद असम्मत’ बोलने वाले अपढ़-गंवारों पर पूरी भड़ास निकाल दी है: ‘अग्य अकोविद अंध अभागी/ काई विषय मुकुर मन लागी।/ लंपट कपटी कुटिल विसेषी/ सपनेहुं संत सभा नहिं देखी।/ जिन्ह के अगुन न सगुन विवेका/ जल्पहिं कल्पित वचन अनेका।’
हमारे कथावाचक व्यासजी और उन्हीं के जैसे ज्ञानी-ध्यानी जन इन सरल पंक्तियों के अर्थ की लंबी खींच-तान करेंगे, कुछ कथा-प्रसंग जोड़ेंगे और सीधी-सीधी खुली बात पर पांडित्य और चिंतन की रजाई उढ़ा कर साबित कर देंगे कि बाबा को दरअसल गुस्सा आया ही नहीं था। कविता का (खींच-तान के) भावार्थ दरअसल ‘यह नहीं, यह था।’ बाबा तो संत पुरुष हैं। उनमें सारी अच्छाइयां हैं, और जिसमें सारी अच्छाइयां हों, उसमें ‘कंट्रास्ट’ के लिए भी काले का कोई ‘शेड’ तो हो ही नहीं सकता। दूसरी तरफ, जो अच्छा नहीं, वह तो काला ही काला होगा, अच्छाई की सफेदी का छींटा भी वहां पड़ेगा ही नहीं।
क्या जीवन में वाकई ऐसा ही होता है! एक और प्रसंग: दमयंती के स्वयंवर में एकदम राजा नल जैसा वेश बना कर कुछ देवता भी पहुंच गए। दमयंती असमंजस में- वरमाला किसे पहनाए! लेकिन फिर उन्होंने विवेक की नजर से देखा। सारे ‘नलों’ में एक ‘नल’ ऐसा भी है, जिसकी माला के फूल कुछ-कुछ कुम्हला गए हैं; माथे पर धूल के कण हैं; पसीने की बूंदें भी; थोड़ा थकान-सी भी है। दमयंती ने इस ‘थोड़ी कमियों वाले नल’ को वर लिया। सही था चुनाव- इस धरती का मानव देवताओं जैसा शत-प्रतिशत अच्छा और उजला नहीं होता। उसमें थोड़ी कमियां होती ही हैं। वह गलती भी करता है- भुगतता भी है। तभी तो आदमी सुंदर है, दिलचस्प है, प्यारा है। देवताओं या फिर राक्षसों जैसा सपाट, एकरंगा और ‘बोर’ नहीं है। इसीलिए, इस धरती के मानवों को अपने ही जैसे अधूरे मानवों का आकलन उनकी समग्रता में करना चाहिए। दिक्कत तब आती है जब हमारा अधूरा ज्ञान, हमारे पूर्वाग्रह, व्यक्ति या परिस्थिति के काले-सफेद होने के बारे में विश्लेषण से पहले ही ले लिए गए हमारे निर्णय आड़े आ जाते हैं। यह रास्ता हमें शालीन विवेक की रोशनी से हटा कर उन्माद और कठमुल्लेपन की तंग-अंधेरी सुरंग में ला छोड़ता है। हम चौपाइयों की खींचतान के बजाय, बाबा के बारे में क्यों नहीं मान लेते कि बाबा विद्वान हैं, भले हैं, विवेकशील हैं, जमाने से आगे हैं। पर मानव हैं न- थोड़ा कमजोर, थोड़ा अतार्किक, अपने समय की सीमाओं से थोड़ा बंधे, कभी-कभी पूर्वाग्रही और चिड़चिड़े भी- तभी तो उन्हें भी कभी-कभी गुस्सा आ ही जाता है।
बाबा से पहले और उनके समकालीन कबीर और दूसरे फक्कड़ संत-फकीर हो चुके हैं। उनकी अलग अदा है।
वे ‘वेदसम्मत’ बात नहीं करते। कहते हैं ‘दसरथ सुत सो राम न होई।’ पढ़े-लिखे भी नहीं हैं। कहीं बाबा का गुस्सा ऐसे अपढ़ फकीरों के लिए तो नहीं है। और उन्होंने पार्वती के मैन्युफैक्चर्ड सवालों के जरिए सारी भड़ास निकाल दी। यह भी तो हो सकता है कि रत्नावली से दूर रह कर- स्नेह की रसधार से वंचित-बाबा के अंतस का कोई कोना बंजर, रूखा तो नहीं रह गया है। समाज के वंचित वर्गों से आए लेकिन अंतर्निहित प्रज्ञा की रोशनी से भरपूर संतों-फकीरों की एक परंपरा रही है, जो पूरे आत्म-विश्वास के साथ ज्ञान-सम्मान के वंश-जातिवादी एकाधिकार और पांडित्य के पांखड की भाषा-शैली के खिलाफ खड़े हुए और औपचारिक पंडिताई तथा शिक्षा से वंचित होने के बावजूद उन्होंने अनगढ़ जनभाषा और जमीनी तेवर के साथ असमानता-मूलक व्यवस्था को चुनौती दी। कहीं ऐसा तो नहीं कि पारंपरिक पंडित और भाषा के संस्कारों के वैष्णवी पूर्वाग्रह बाबा को इन ‘मुंह उठाए चले आते ऐरे-गैरों’ के प्रति नाराजगी से भर दिया हो।
हजार वजहें हो सकती हैं- नहीं भी हो सकतीं, पर हम आखिर इस बात पर अचंभित क्यों हों कि बाबा को गुस्सा क्यों आता है यानी ‘अच्छे-उजले लोग’ सौ प्रतिशत अच्छे क्यों नहीं होते, हम खींचतान व्याख्या करके बाबा जैसों की हर बात को अच्छे-उजले खांचे में डालने की मशक्कत क्यों करते हैं। कितना अच्छा हो कि हम व्यक्तियों की मीमांसा करते समय उन्हें समग्रता में देखें। उन्हें अच्छाई-बुराई, मजबूती-कमियों वाला मानव मानें। सहज अर्थों से खींचतान न करें। स्त्रियों और वंचित वर्गों के बारे में बाबा की कई दोहा-चौपाइयां ऐसे ही संस्कार-जन्य या निजी कारणों वाले पूर्वाग्रहों को व्यक्त कर सकते हैं। लेकिन यही बाबा तो हैं, जो पूरी शालीनता-सौम्यता से तमाम विचारों-पंथों-समुदायों के बीच समन्वय की विवेक पूर्ण आवाज उठाते हैं; अशर्फियों के लिए कविता लिखने वालों के दौर में यही बाबा ‘रघुनाथ के चाकर बन कर’ नर के ‘मनसबदार’ बनने से इंकार कर राज्याश्रय ठुकरा देते हैं; यही बाबा संस्कृत में थोथे पांडित्य प्रदर्शन के बजाय आम जन की भाषा में रामकथा का अमृत बरसाते हैं। तब फिर क्यों नहीं ऐसे महामानव का समग्रता में आकलन किया जाए, जिसमें इस धरती के अधूरे इंसानों जैसे कुछ पूर्वाग्रह भी थे। तब हमें अपनी समग्रता में बाबा अपने समय से बहुत आगे के युगद्रष्टा संत लगेंगे और उनकी कमियां- जैसे नजर लगने से बचाने वाला सुंदर टीका! और यह बात उन पर भी तो लागू होती है, जिन्हें हम घनघोर काला पिशाच चित्रित करते हैं। गौर से देखेंगे तो उनके चेहरों पर भी कहीं कुछ उजास दिखेगी- उन आंखों में भी करुणा की कुछ नमी होगी। तो बाबा के गुस्से पर माथापच्ची के बजाय, क्यों न हम इस धरती के हाड़-मांस के मानव की मानवता का यशगान करें, जो कभी-कभी कमजोर पड़ जाता है, गुस्सा कर जाता है- बेवजह। सीधे-सच्चे लोगों के ऐसे गुस्से पर तब आपके चेहरे पर बरबस मुसकान छा जाएगी। ०
