बीते दौर में बच्चे बाहर खेलना ज्यादा पसंद करते थे, जो आजकल के बच्चों में कम देखने को मिलता है। उनके पकड़म-पकड़ाई, लुका-छिपी जैसे खेलों की जगह मोबाइल और कंप्यूटर गेम ने ले ली है, लेकिन खिलौने तब भी बच्चों को लुभाते थे और आज भी। बस, बीते दशकों में इसका रंग-रूप बहुत बदल गया है।
कैसे बदली ए खिलौनों की दुनिया और कैसे बच्चे और अभिभावक बदले इनके साथ, इसे बताया एक ऐसे शख्स ने, जिसने अपने जीवन के बासठ-चौंसठ साल इन खिलौनों के बीच बिताए हैं। पांच पीढ़ियों से चल रही अपनी खिलौनों की दुकान में न जाने उन्होंने कितने बच्चों के अरमान सजते देखे होंगे और कितनों के टूटते भी। उनके पास आने वाले बच्चों में जहां पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी शामिल हैं, तो प्रियंका और राहुल गांधी भी अपने बचपन में एक-दो बार उनकी दुकान से खिलौने खरीद चुके हैं।  दिल्ली के दिल कहे जाने वाले कनॉट प्लेस में अंगरेजों के जमाने की कई दुकानें हैं। इन्हीं में एक नाम ओडियन सिनेमा के बगल वाली राम चंदर ऐंड संस का है। इसके बारे में कहा जाता है कि यह भारत की सबसे पुरानी खिलौने की दुकान है। लगता भी ऐसा ही है, क्योंकि 1890 में शुरू हुई इस दुकान के अंदर आप जैसे ही दाखिल होंगे आपको लगेगा ही नहीं कि यह कनॉट प्लेस की कोई दुकान है।

कनॉट प्लेस में जहां कांच के शो-केसों वाली दुकानें तमाम तरह के दीप आभूषण धारण किए मिलती हैं। इस दुकान को देखकर पहली नजर में आपको किसी गोदाम में जाने की अनुभूति होगी। सब सामान इधर-उधर बेतरतीब पड़ा है। इन्हीं के बीच में दाहिनी तरफ एक दराजों वाली टेबल है, जिस पर एक कंप्यूटर है और ढेर सारा सामान। साथ ही बगल की कुर्सी पर कोई सत्तर-पचहत्तर साल के एक बुजर्ग बैठे हैं। ये हैं सतीश सुंदरा, जो इस दुकान से जुड़े परिवार की चौथी पीढ़ी से हैं। करीब आठ साल की उम्र में दुकान पर बैठना शुरू कर चुके सतीश अभी अपने बेटे-बहू के साथ मिल कर इस दुकान को चलाते हैं।
दुकान पर बैठने की अपनी शुरुआत के बारे में सतीश बड़े रोमांच के साथ बताते हैं, ‘मेरे परिवार में मारवाड़ी माहौल था। इसलिए मैं सात-आठ साल की उम्र से ही दुकान पर बैठने लगा। तब से अब तक मैंने खिलौनों की इस दुनिया को बड़े नजदीक से बदलते देखा है।’

बकौल सतीश, 1940 के दशक में भारत में ज्यादातर खिलौने ब्रिटेन-अमेरिका से आते थे। तब खिलौनों में रेलगाड़ियां अहम होती थीं। इसमें भी सबसे ज्यादा जर्मनी की गाड़ियों को पसंद किया जाता था। मुझे खुद एक इलैक्ट्रॉनिक रेलगाड़ी बहुत पसंद थी। इसके अलावा ब्लॉक आपस में जोड़ने वाले खिलौनों का ही विकल्प हमारे पास होता था। हमारे परिवार की कुल पांच दुकानें थीं। पहली दुकान अंबाला में खुली और 1935 में यह यहां कनॉट प्लेस में आ गई। पिताजी और उनके भाइयों के बीच बाद में ये दुकानें बंट गर्इं और फिर मेरे और भाई के बीच भी बंटवारा हुआ। सबने अपनी दुकानें बेच दी। शिमला और कसौली में भी हमारी दुकान थी, लेकिन अब बस यही एक बची है। बकौल सतीश खिलौनों की दुनिया में अमेरिका और ब्रिटेन के दबदबे को चुनौती जापान ने दूसरे विश्वयुद्ध के बाद देनी शुरू की। 1950 के दशक में जापान ने कबाड़ के टिन से खिलौने बनाने शुरू किए। उसने अंतरिक्ष विज्ञान से जुड़े खिलौने बनाने शुरू किए। हम खुद 1969 तक इनका भारत में बेरोकटोक आयात करते थे। लोग इसे बहुत पसंद करते थे। बाद में 1970 में सरकार ने कई तरह के आयात पर रोक लगा दी और यह रोक 1980 के दशक तक जारी रही।

2017 में हम इंदिरा गांधी की जन्मशताब्दी मना रहे हैं। उनसे जुड़े अपने संस्मरण को याद करते हुए सतीश ने कहा, ‘राजीव और संजय को लेकर वे अक्सर यहां आया करती थीं। राजीव और संजय दोनों ही यहां खिलौनों से खेलते थे और उन्हें मैंने खिलौनों के लिए जिद करते भी देखा है। इंदिराजी का व्यवहार बेहद आम महिला की तरह ही होता था। यहां तक कि वे कभी-कभी थोड़ा-बहुत मोल-भाव भी करती थीं। फिर सोनियाजी के साथ प्रियंका तो कई बार आर्इं, लेकिन राहुल एक-दो बार ही खिलौने लेने आए।’ सतीश के ग्राहकों में पटियाला, जोधपुर, जयपुर के राजघराने भी शामिल रहे हैं। साथ ही मोदीनगर वाले राय बहादुर गूजरमल मोदी जैसे कारोबारियों के बच्चों ने भी उनकी दुकान के खिलौनों से खेला है। सतीश बताते हैं कि 1980 के दशक में आयात तो खुल गया, लेकिन तब तक खिलौने जापान से ताइवान चले गए। तभी कई तरह के इलेक्ट्रॉनिक खिलौने आए। बाद में 2000 के बाद से चीन ने इसमें अपनी साख बनाई है। लेकिन एक बात जो यूरोपीय खिलौनों में थी, वह थी ‘दादा खरीदे, पोता बरते’ लेकिन अब वह बात कहीं नहीं बची।

बीते दिनों को याद करते हुए सतीश कहते हैं कि तब का दौर और था। हमारे पास खिलौनों के साथ खेलने का वक्त होता था। मेले-तमाशे होते थे, आंगन और गलियों में भी बच्चे खेला करते थे। अब तो पार्कों में भी जाने पर बच्चे खेलते नहीं दिखते। मेरी भी जानकारी में कई बच्चे हैं, जिन्हें मोबाइल वगैरह पर खेलते हुए देख कर बड़ा कष्ट होता है। बड़े कौतुहल के साथ सतीश बताते हैं कि हर खिलौना एक शिक्षा देता है। किसी भी बच्चे के शारीरिक, मानसिक और तार्किक विकास में खिलौनों की भूमिका होती है। बचपन में मेलों में मैंने एक खेल देखा है, जिसमें एक इलेक्ट्रॉनिक तार से एक छल्ले को पार निकालना होता था। सोचिए यह बच्चों को कितना ज्यादा एकाग्र बनाता था। यह बात बताते हुए उनकी आंखों में एक अजब तरह की चमक उभर आती है। आजकल खिलौनों की जगह फिल्मों से जुड़ी मर्चेंडाइज ने ले ली है। इनके आने से एक तो बच्चों में थोड़ी हिंसक प्रवृत्ति बढ़ने लगी और हमारे खुद के चरित्रों और नायकों को हम अपने बच्चों के जीवन में वह स्थान नहीं दिला पाए, जो सुपरमैन वगैरह को मिला।

एक और बात, जो मुझे कचोटती है, वह यह कि आजकल मां-बाप बच्चे को खिलौना तो दिला देते हैं, लेकिन उसके साथ समय नहीं बिताते। न ही उस खिलौने को लेकर बच्चे के साथ खेलते हैं। देखा जाए तो हमारे बच्चे आजकल बहुत अकेले हो गए हैं।हमारी दुकान का विशेष नियम है कि हम बच्चे को वही खिलौना देते हैं, जो उसकी उम्र के हिसाब से सही हो। सिर्फ बेचने के लिए खिलौना हम नहीं बेचते। हम चाहते हैं कि बच्चे अपने खिलौने का पूरा मजा उठाएं ताकि उसका बचपन भी यादों से भरा हो।