अनूप कुमार गुप्ता

भारत की सामरिक संस्कृति और रणनीति की पश्चिम के विद्वानों ने काफी उपेक्षा की है। 1992 में एक अमेरिकी सामरिक विशेषज्ञ जार्ज के. तानाहम ने कहा था कि भारत में सामरिक चिंतन और रणनीति का अभाव रहा है। भारत के रक्षा विशेषज्ञ के. सुब्रमण्यम और जसवंत सिंह जैसे सामरिक चिंतकों ने तानाहम के कथन से सहमति भी व्यक्त की। लेकिन, कई विचारकों ने तानाहम के तर्क का खंडन भी किया। जेएनयू के पूर्व शिक्षक और रक्षा विशेषज्ञ कांति बाजपेयी का मानना है कि भारत में सामरिक संस्कृति का अभाव नहीं था, बल्कि यह काफी संपन्न, प्रभावी और बहुआयामी थी। काल की दृष्टि से यह विमर्श कमोबेश समकालीन युग तक ही सीमित रह गया, जबकि प्राचीन भारत की सामरिक संस्कृति संपन्न थी। रामायण, महाभारत, अर्थशास्त्र आदि प्राचीन भारतीय वांग्मय में युद्ध-नीति और रणकौशल की व्यापक जानकारी मिलती है। चाणक्य के ‘अर्थशास्त्र’ में भी युद्ध कला का वर्णन है।
रामायण में सामरिक संस्कृति के दो प्रतिमान देखने को मिलते हैं। एक ओर राम की सामरिक संस्कृति का प्रतिमान है तो दूसरी ओर रावण की। शत्रु की अवधारणा, शक्ति के स्वरूप, बल प्रयोग और उसकी सीमा के संबंध में राम और रावण का सामरिक चिंतन दो भिन्न-भिन्न प्रतिमान प्रस्तुत करता है। राम की सामरिक संस्कृति का आधार धर्म, न्याय और लोक मंगल था, जबकि रावण की सामरिक संस्कृति का आधार अधर्म, अन्याय और वर्चस्व था। राम की सामरिक संस्कृति में युद्ध और बल-प्रयोग का औचित्य भी इसके साथ जुड़ा हुआ है। रावण की सामरिक संस्कृति में भौतिकवाद पर बल दिया गया है और इसमें भौतिक लाभ की प्राप्ति, संरक्षण और उसके विस्तार के लिए सामरिक रणनीति के किसी भी रूप को अपनाने के लिए तत्परता परिलक्षित होती है। राम की सामरिक संस्कृति में बल-प्रयोग का तत्त्व लोकमंगल और लोक-कल्याण से जुड़ा हुआ है जबकि रावण की सामरिक संस्कृति में बल-प्रयोग को वर्चस्व और साम्राज्य विस्तार का साधन माना गया है। रामायण में रावण की सामरिक संस्कृति के बरक्स राम की सामरिक संस्कृति को वरेण्य बताया गया है।

रावण का चिंतन और रणनीति आक्रामक यथार्थवाद पर आधारित थी। अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन में रावण को आक्रामक यथार्थवाद का प्रथम प्रवक्ता माना जा सकता है। उसकी रणनीति में प्रभुत्व, वर्चस्व, विस्तार, आक्रामकता और शक्ति के मनमाने प्रयोग पर बल है। राजनीतिक-सामरिक संरचना का बहु-ध्रुवीय रूप रावण को पसंद न था। वह एक-ध्रुवीय संरचना की स्थापना करना चाहता था। लंका की सत्ता से अपने भाई कुबेर को बेदखल करने के बाद रावण ने लंका राज्य की शक्ति के विस्तार और सर्वत्र वर्चस्व स्थापना के लिए सैन्य अभियान चलाया। रावण की सामरिक संस्कृति में शक्ति संचय, शक्ति संवर्धन और शक्ति संरक्षण पर अत्यधिक बल दिया गया है और इस शक्ति के द्वारा राज्य सत्ता के संरक्षण, संवर्द्धन और विस्तार पर बल दिया गया है। रावण ने विस्तार और वर्चस्व के लिए साम और दाम की तुलना में दंड और भेद की रणनीति पर अधिक बल दिया था और षाड्गुन्य नीति में संधि की तुलना में विग्रह के विकल्प पर बल दिया था। रावण की सामरिक संस्कृति और रणनीति में बल का आक्रामक प्रयोग और युद्ध एक आवश्यक तत्त्व है। रावण की युद्ध नीति का एक महत्त्वपूर्ण अंग शत्रु के खिलाफ छल और माया का प्रयोग करना भी था। चीन की सामरिक संस्कृति में छल को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। चीन के प्राचीन सामरिक चिंतक सुन जु ने छल प्रयोग को युद्ध रणनीति में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया था। रावण ने चारों लोकपालों यथा यम, वारुनेय, कुबेर और इंद्र को युद्ध में पराजित किया था। अपने सार्वभौम सत्ता विस्तार अभियान के क्रम में रावण ने दक्षिणारण्य और नेमिषारण्य में भी अपनी सैनिक चौकियों की स्थापना की थी। दंडकारण्य में खर, दूषण और शूर्पणखा ने अपना वर्चस्व स्थापित किया। मारीच और सुबाहु ने ताड़का के साथ आर्यावर्त में दखल देना शुरू किया। रावण के बढ़ते प्रभाव से अयोध्या समेत आर्यावर्त के राज्यों की सुरक्षा को भी संकट आ गया था। राम ने रावण का प्रतिकार किया जिसकी परिणति राम-रावण युद्ध के रूप में हुई, जिसमें रावण की पराजय हुई।

रावण के यथार्थवाद का स्वरूप आक्रामक था न कि रक्षात्मक। अंतरराष्ट्रीय राजनीति के सिद्धांत में यथार्थवाद का जो विवरण मिलता हैं उसके बीज रावण के यथार्थवादी सामरिक चिंतन में देखे जा सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय संबंध सिद्धांत में यथार्थवाद के विवरण और विवेचन में केवल यूरोपीय इतिहास और सामरिक चिंतन को ही महत्त्व दिया गया है और भारत की प्राच्य परंपरा के चिंतन को महत्त्व नहीं दिया गया है। राम की सामरिक संस्कृति में आदर्शवाद और यथार्थवाद का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। राम के चिंतन का मूल तत्त्व धर्म है। धर्म का आशय न्याय, लोकमंगल, कर्तव्य पालन और न्यायोचित व्यवहार है। इसकी रक्षा के लिए राज्यकला, राजनय, राज्य की सुरक्षा, दंड की उपयोगिता, बल प्रयोग के औचित्य पर विचार हुआ है। न्याय और लोकमंगल की स्थापना के लिए ही सामरिक रणनीति के तहत राम ने पहले गुरु विश्वामित्र के साथ वन में जाकर ताड़का, मारीच, सुबाहु जैसे अन्यायी राक्षसों के आतंक से मुक्ति दिलाई। वनवास के दौरान राम ने दंडकारय को शूर्पणखा, खर, दूषण, त्रिशरा, विराध और कबंध के आतंक से मुक्त किया। रावण द्वारा सीता-हरण के बाद राम से सीधा टकराव शुरू हुआ। रावण सहित लंका की समस्त राक्षस सेना को राम ने पराजित किया। राम के सामरिक चिंतन और रणनीति में मित्रता और शत्रुता का आधार अर्थ न होकर धर्म था। राम ने युद्ध में छल नीति और शत्रु पर कृपा करने को कायरता माना था। लेकिन शत्रुता को राम एक स्थायी भाव नहीं मानते थे। राम के नजरिए से शत्रुता स्थायी नहीं होती है और शत्रु के अंत के साथ ही शत्रुता का भी अंत हो जाता है। राम ने विभीषण से कहा कि रावण का दाह संस्कार सम्मान से किया जाए। इसीलिए राम कहते हैं कि ‘वैर मरने तक ही रहता है।’

शत्रु का सामना करने के पूर्व राम ने सैन्य शक्ति और रक्षा तैयारी पर पूर्ण ध्यान दिया था। गुरु विश्वामित्र और अगस्त्य मुनि सैन्य हथियारों के हस्तांतरण के द्वारा राम की सैन्य क्षमता का संवर्धन करते हैं। राम ने शत्रु राज्य की सैन्य क्षमता और रणनीति को समझने के लिए सामरिक नियोजन के घटक के रूप में अभिसूचना तत्त्व पर भी जोर दिया था। लंका में राम के दूत बनकर हनुमान ने शत्रु की शक्ति और प्रभाव का निरीक्षण किया। विभीषण को शरण देने का राम का निर्णय सामरिक आकलन पर आधारित था। विभीषण से राम का पहला प्रश्न यह था कि रावण का बलाबल क्या है और समुद्र को कैसे पार किया जाए? विभीषण के मंत्री अनल, पनस, संपाति और प्रमति ने राम को रावण के पक्ष की सैन्य सूचनाएं देने का महत्त्वपूर्ण काम किया। षड्गुन्य नीति के ज्ञाता राम ने संधि नीति से मैत्री संजाल को बढ़ाकर अपना सामरिक पक्ष मजबूत किया और इसके बाद ही शत्रु पर विग्रह की नीति का प्रयोग किया था। रावण से विग्रह के पूर्व राम ने समाश्रय नीति का अनुसरण करते हुए सुग्रीव से मित्रता की स्थापना की थी। रामायण में सामरिक संस्कृति का अध्ययन भारत में रक्षा और सामरिक अध्ययन विषय को भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़ने की एक अहम कड़ी हो सकती है। रामायण में युद्ध और शांति, मित्रता और शत्रुता, हिंसा और अहिंसा, बल का प्रयोग और अ-प्रयोग, राजनय और सैन्य रणनीति के संबंध में धारणाएं देखने को मिलती हैं। इक्कीसवीं सदी में अंतररष्ट्रीय राजनीति में भारत एक बड़ी ताकत बनकर उभर रहा है और इस दृष्टि से राष्ट्रीय सुरक्षा विषय के साथ-साथ मित्र और शत्रु, युद्ध और शांति, सामरिक मामलों में बल के प्रयोग के स्वरूप संबंध में भारतीय सिद्धांत को विकसित किए जाने की आवश्यकता है, जिसके लिए अतीत और वर्तमान दोनों के अध्ययन की दरकार है। रामायण का सामरिक पाठ अंतरराष्ट्रीय संबंध सिद्धांत के भारतीय नजरिए के विकास में एक महत्त्वपूर्ण कदम हो सकता है।१