माता-पिता अपने जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा बच्चे के जन्म से सेकर उसे बड़ा करने और उसकी देखभाल करने में लगा देते हैं। मगर वही जब बूढे हो जाते हैं तो युवा संतान उन्हें साथ रखने के बजाय दूर ठेल देते हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार बुजुर्गों की करीब आधी आबादी अपने संतान से दूर और अलग-थलग थी। ऐसा इसलिए क्योंकि युवाओं की करीब आधी आबादी अपनी पत्नी और बच्चों के साथ अलग रहने लगती है। फलस्वरूप ज्यादातर मां-बाप जिंदगी का अंतिम दौर खराब स्थिति में काटते हैं। हद तो तब हो जाती है जब बूढे मां-बाप को किसी वृद्धाश्रम में छोड़ दिया जाता है या उसके लिए उन्हें मजबूर कर दिया जाता है। यों तो महिला के तमाम अधिकार हैं। अगर किसी पुरुष ने छेड़ दिया तो उसके खिलाफ अधिकार। पति ने दहेज के लिए सताया या उसके साथ दुर्व्यवहार किया तो उसको सजा दिलाने के लिए कानून है। विचारणीय तथ्य यह कि मां बनने के बाद महिला की सुविधाएं और अधिकार कहां चले जाते हैं ? जबकि महिला अपने जीवन का स्वर्णिम समय यानी जवानी का एक बड़ा हिस्सा बच्चे पैदा करने से लेकर उसके लालन-पालन में और उसे बालिग बनाने तक में लगा देती हैं। विशेषकर मां अपने बच्चे के लिए अधिक समझौता करती है। इस कार्य में पिता के रूप में पुरुष भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लेकिन, वही जब वृद्ध हो जाते हैं तो उनकी बेकद्री क्यों हो जाती है।
तमाम लोग हैं जो भाषण देते समय मां-बाप को लेकर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। कितने रचनाकारों ने मां-बाप को भगवान का दर्जा तक दे दिया मगर इससे क्या लाभ। अगर मां-बाप को व्यवहार में मानव भी न समझा जाए। जीवनभर जिसके हित के लिए सबसे अधिक काम किया, वही संताने बुढ़ापे का सहारा बनने की बजाय उनके दुश्मन होते जा रही हैं। वृद्धावस्था में शरीर विभिन्न बीमारियों का शिकार होने लगता है। इसलिए भी उस दौरान उन्हें आर्थिक और मानसिक संबल अधिक चाहिए होता है। आखिर ऐसा क्या किया जाए कि मां को अपने मातृत्व पर गर्व हो। उसे यह कमजोरी न लगे। कमजोरी इस अर्थ में कि अपने जीवनकाल में बच्चों को बनाने में ही उसने सारी ऊर्जा लगा दी, अपने लिए सोचा नहीं मगर अब जब युवा बच्चे भी उसके लिए नहीं सोचेंगे तो क्या होगा ? इन विकट परिस्थितियों से बचने के लिए वह वातावरण हर किसी को सुलभ किया जाए जिसके तहत सभी को सुरक्षित बुढ़ापे का एहसास और विश्वास हो, यह समाज के दायित्व में शामिल किया जाना चाहिए। सुरक्षा में सबसे पहले आर्थिक सुरक्षा शामिल हो। अधिकतर मां-बाप इसकी कमी झेलते रहते हैं। युवा पुत्र शादी के बाद उन्हें साथ रखने से बचना चाहता है। बिना पैसे के बेटा से अलग रहना किसी भी बुजुर्ग मां-बाप के लिए कष्टदायी होता है। ऐसी परिस्थिति में बुजुर्ग मां-बाप चाहे गांव में रहें या कहीं भी बहुत ही कठिन होता है।
बिना पैसे के तो खुद का भरण-पोषण में भी दिक्कत होती। पैसा पास में हो तो बेटा न रखे तो नौकर-चाकर से भी मदद ली जा सकती है। इसलिए सबसे पहले एक मां को आर्थिक सुरक्षा मिलनी चाहिए ताकि दो जून की रोटी वह अपने लिए जुटा सके और इसके लिए किसी की मोहताज उसे न होना पड़े। वैसे तो वृद्वावस्था पेंशन के तहत कुछ राज्यों में सरकार की तरफ से 500 से 1500 रुपए तक की राशि दी जाती है, मगर इसमें भी बहुत झोल है। या तो इसे प्राप्त करने की पात्रता साबित करना कठिन हो जाता है या फिर इसकी प्रक्रिया इतनी कठिन होती है कि जरूरतमंद लोग इसका लाभ कम ही उठा पाते हैं। प्रश्न तो यह भी है कि अगर वृद्ध माता-पिता को 1000-1500 रुपए महीने में मिल भी जाएं तो इससे तो उनकी जरूरतें कैसे पूरी की जा सकती हैं ?कुछ मामलों में यह व्यवस्था की जानी चाहिए कि अगर पुत्र नहीं है तो पुत्री को मां-बाप की जिम्मेदारी उठानी चाहिए और उन्हें साथ रखना चाहिए। एक न्यूनतम राशि बेटा-बेटी की कमाई से हर महीने मां-बाप के खाते में देने की व्यवस्था होनी चाहिए। वैसे भी जब मां-बाप अपनी संपत्ति और सब कुछ संतान के नाम कर देते हैं तो उन्हें आजीवन भोजन आदि की व्यवस्था संतान की तरफ से होनी ही चाहिए। सरकारें चाहें तो सभी बुर्जुगों का बीमा भी करा सकती हैं। यों तो संतान से भरण-पोषण प्राप्त करने संबंधी कानून पहले से है मगर बुढ़ापे में इसके लिए लड़ाई कौन लड़ सकता है। ०
