संचार तकनीक के प्रसार से मानव-जीवन में एक अद्भुत क्रांति आई है। घर बैठे एक बटन दबा कर क्या-क्या नहीं प्राप्त किया जा सकता! क्या-क्या नहीं सीखा जा सकता! सब कुछ हमारी अंगुली के पोरों पर बसने लग गया है! संचार तकनीकी के अविरल प्रवाह में सभी बहते जा रहे हैं। पिछले वर्ष भी दिल्ली की हवा में सांस लेना दूभर हो गया था, हवा जहरीली हो गई थी, बच्चों और बुजुर्गों के लिए अत्यंत खतरनाक! मौसम बदला, संस्थाएं और अधिकारी सो गए। इस साल भी वही हुआ, कोई उत्तरदायी नहीं पाया गया, आदेश, अनुदेश और उपदेश भी खूब उछाले गए। वैसे इस समस्या के निदान के लिए भी बाजार में नए इलेक्ट्रॉनिक उपकरण यानी ‘गैजेट्स’ आ गए हैं। इनमें हवा साफ करने के यंत्र भी हैं। समाधान मिल गया है! अगले साल के वायु-प्रदुषण के मीडिया में स्थान पाने के पहले से ही यह गैजेट भी खूब बिकेगा। साधन-संपन्न वर्ग के लिए यह मामूली बात है! जहां तक बाकी लोगों का सवाल है, उनके लिए स्पष्ट दार्शनिक राह खुली है: ‘जेहि विधि राखे राम, तेहि विधि रहिए!’ पिछले सात दशकों में अधिकतर लोगों ने यह सीख भी लिया है। डेंगू के लिए घर-बार बेच कर बच्चे को निजी अस्पताल ले जाने की मजबूरी, उसका मृत शरीर लेकर बाहर आना और अठारह लाख का बिल पाना इस देश में कोई हरकत तक पैदा नहीं करती है, भूचाल लाने की तो कोई संभावना ही नहीं है! स्वास्थ्य सुविधाओं के क्षेत्र में हम गर्व से कहते हैं कि बाहर के देशों से लोग यहां चिकित्सा कराने के लिए आते हैं। देशी लोगों की बात अलग है। नवजात शिशु को मृत घोषित करने वाले अस्पताल के खिलाफ केवल एफआइआर लिखा देना और एक डॉक्टर को छुट्टी पर भेज देना ही समस्या का समाधान कर देता है! हमारी ‘सिविल सोसाइटी’ सोती रहती है।
एक नामी-गिरामी स्कूल सीसीटीवी नामक उपकरण लगाने के लिए जम कर अतिरिक्त शुल्क वसूलता है, मगर जब एक मासूम बच्चे की जघन्य हत्या होती है, ये उपकरण सोते पाए जाते हैं। जिस तेजी से बस कंडक्टर को पुलिस अपराधी घोषित करती है, वह व्यवस्था की प्रवृत्तियों को उजागर करता है और संवेदनहीनता के निम्नतम स्तर को एक बार फिर दर्शता है। हम बच्चों को क्या दे रहे हैं! उनके साथ कितने बेरहम हो गए हैं, इस पर कोई विचार-विमर्श भी नहीं होगा। कुल मिलाकर घातक वायु प्रदूषण, अस्पतालों में जीवित को मृत घोषित करना, सात-साल के मासूम से उसका जीवन छीन लेना अब केवल अनेक ऐसी घटनाओं में केवल एक और संख्या मात्र बन कर रह जाते हैं। जो दिल्ली के आसपास घटित होता है, वह चर्चित और प्रसारित हो जाता है। बाकी सब दूर-दराज के खाते में डाल दिया जाता है। ये तीनों प्रकरण स्पष्ट दर्शाते हैं कि बच्चे ही बड़ों के अन्याय के सबसे अधिक भुक्तभोगी रहते हैं। यानी देश की भावी पीढ़ियां, जिनको एक सुखद भविष्य और रहने योग्य दुनिया देने का उत्तरदायित्व वर्तमान में कार्यकारी पीढ़ी का ही है। ‘गैजेट्स’ के आने के साथ, संचार तकनीकी की उपलब्धता के साथ शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सुधार की बड़ी संभावना उभरी थी।
शिक्षा की ही नहीं, जीवन जीने की कला और दिन-प्रतिदिन के जीवन निर्वाह के स्तर को ऊंचा उठाने का अपूर्व अवसर उपस्थित हुआ था। यह भी सही है कि जो कुछ विज्ञान और संचार तकनीकी ने हमारे सामने रखा था, उसे आंख मूंद कर स्वीकार करने की कोई आवश्यकता नहीं थी, उसके प्रभावों-दुष्प्रभावों का विश्लेषण करना आवश्यक था। यह विश्लेषण भारत में व्यवस्थित ढंग से आज भी नहीं हो रहा है। आज शिक्षा और सीखने में मूलभूत परिवर्तन गैजेट्स के कारण हुआ है। अब जीवन-पर्यंत सीखते रहना आवश्यक होगा। अब आज का प्राप्त ज्ञान और कौशल जीवन भर किसी का साथ देने वाले नहीं हैं। हर व्यक्ति को नया सीखने और पुराना भूलने/ छोड़ने का कौशल प्राप्त करना होगा। ऐसा न करने वाला अन्य से पिछड़ जाएगा। इस सबके लिए सबसे पहले शिक्षकों को नए ढंग से तैयार करने की बड़ी चुनौती का सामना करना होगा, उन्हें नए उपकरणों से परिचित करा कर यह भी सिखाना होगा कि उनका कितना और किस प्रकार का उपयोग स्वीकार्य तथा हितकारी है, और वह कहीं बच्चे के संपूर्ण व्यक्तित्व विकास के लिए हानिकारक तो नहीं बन जाता है? किसी भी ज्ञान या कौशल का महत्त्व तभी तक है, जब तक वह जीवन जीने में उपयोगी बना रहे, और उससे बेहतर विकल्प उपलब्ध न हो जाए। इसे समझना आवश्यक है।
स्मार्टफोन और लैपटॉप सर्वाधिक लोकप्रिय नए उपकरण हैं। विदेशों में इनके उपयोग को लेकर अनेक प्रकार के शोध हो रहें हैं। यह भी सही है कि बच्चों और बड़ों को- बड़ी संख्या में- इनकी लत लगती जा रही है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि लैपटॉप और इंटरनेट की लत के कारण मष्तिष्क की क्रियाओं में असंतुलन पैदा हो जाता है। चिंता और तनाव बढ़ जाता है। इस प्रकार के परिवर्तन का प्रभाव संवेदनाओं पर भी पड़ता है। उन्नीस साल के युवाओं पर किया गए प्रयोगों में यह देखा गया कि फोन के इस्तेमाल की लत उनकी उत्पादकता और नींद को अव्यवस्थित कर देती है। एक अन्य शोध में पाया गया है कि कॉलेज के विद्यार्थी, जो लैपटॉप या टेबलेट लेकर कक्षाओं में बैठते हैं, उपलब्धि के स्तर पर उनसे कम ग्रेड पाते हैं, जो इनका स्तेमाल नहीं करते हैं। इस प्रकार के शोध में अनेक कठिनाइयां आती हैं। मगर सामान्य भाषा में कहा जा सकता है कि विद्यार्थी लैपटॉप पर टाइप तेजी से कर पाते हैं, जबकि हाथ से लिखने में अधिक समय लगता है। इसलिए जब अध्यापक के शब्द सीधे उनकी अंगुलियों से लैपटॉप पर पहुंचते हैं, वे मष्तिष्क में आवश्यक प्रसंस्करण के लिए रुक नहीं पाते हैं। लैपटॉप पर लिए गए नोट्स के मुकाबले हाथ से लिखे गए नोट्स अधिक सार्थक पाए गए। ऐसा भी पाया गया कि कुछ युवा लैपटॉप के साथ भी अच्छा कर सके, क्योंकि वे उस श्रेणी में आते हैं, जो कक्षा के बाहर ‘बोर’ होने के कारण बार-बार लैपटॉप की ओर मुड़ जाते हैं, जिनकी अन्य रुचियां सीमित होती हैं। इस प्रकार के अध्ययन भारत में अगर कहीं हो रहे हैं, तो वे सर्वसाधारण की जानकारी में आए नहीं हैं।
भारत को विश्व का सबसे बड़ा उपलब्ध बाजार मान कर यहां आने वाली अंतरराष्ट्रीय कंपनियां एकाधिकार स्थापित करने की होड़ में बच्चों और युवाओं में ‘गैजेट्स’ के प्रति ‘लत’ लगाने में क्यों हिचकेंगी? कहा जाता है कि सोशल मीडिया लोगों- खासकर बच्चों और युवाओं- के अकेलेपन को दूर करता है। वास्तविकता यह है कि यह उन्हें अपनों से नहीं, अपने से भी दूर करता है। अकेलेपन को बढ़ाता है, खेलों, मित्रों से दूरी लगातार बढ़ाता है। परिवार में जो अपनापन आपसी बातचीत से पैदा होता रहा है, वह भी अब तेजी से सिकुड़ता जा रहा है। अन्य कार्यों में उनकी रुचि कम हो जाती है, स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है। उन टीनएजर्स के लिए आत्महत्या का जोखिम पैंतीस प्रतिशत बढ़ जाता है, जो तीन घंटे से अधिक समय लैपटॉप या स्मार्टफोन पर बिताते हैं। लड़कियों में उदासी और निराशा (डिप्रेशन) का जोखिम पचास प्रतिशत तक पहुंच जाता है। अक्सर माता-पिता इस स्थिति से निकालने के लिए सलाह पाने का प्रयास करते हैं, मगर जब तक स्कूल भी इस समस्या और अपने उत्तरदायित्व को न समझें, समाधान पाना कठिन हो जाता है। गैजेट्स’ अपनाना समय की आवश्यकता है। मगर कहां, कैसे और कितना, इसे तय करना मनुष्य के मष्तिष्क पर छोड़ना ही भविष्य- जो बच्चे संभालेंगे- के प्रति सही कदम होगा। एक नए सोच के साथ ही गैजेट्स की दुनिया में आत्मविश्वास के साथ प्रवेश लाभकारी हो सकेगा, अन्यथा समस्याएं अधिक और समाधान कम ही मिल पाएंगे।

