विजय बहादुर सिंह
अगर साठ के दशक में इलाहाबाद के लेखकों-कवियों ने मिल कर पश्चिमी नई कविता (न्यू पोयट्री) की तर्ज पर नई कविता की शुरुआत की थी, तो सत्तर के दशक में इसी तर्ज पर नवगीत सामने आया। बुनियादी तौर पर वह नई कविता का ही विस्तार या पूरक था या कहें उसके संतुलन की एक कोशिश थी। यह भी साधार और सकारण कहा जा सकता है कि नई कविता के अति शहरीपन और बौद्धिकतावाद के बरक्स नवगीत उन संवेदनों का समूह लेकर आया, जो नई कविता की तरह तो नए और बौद्धिकता वाले नहीं थे, न ही किसी बड़े मोहभंग की उपज, बल्कि जीवन और लोक समाज की बदलती सच्चाइयों के बावजूद परंपरागत मानव-मन की कोमलता और राग में डूबे हुए थे। ऐसा भी नहीं कि इनमें अकेले ग्रामीण संवेदनों की भरमार हो, फिर भी कवियों की मूल चेतना का संस्कार लोकपरक था। गांव अंचल कस्बे नगर-महानगर भी यहां वर्जित अनुभव-प्रदेश नहीं थे। एकल परिवारों और एकल बौद्धिकता के बदले इसमें सामूहिकता की मांग और संयुक्त परिवारों के संवेदन-अवशिष्ट भी थे। रूमानियत स्मृति-मोह संगीतात्मकता और छांदसिकता का भी यहां कोई नकार नहीं, बल्कि सहज स्वीकार था। एक हद तक नई काव्य-दृष्टि से संपन्न था। बौद्धिकता का दावा तो था ही।
नए कवियों ने चले आ रहे प्रगतिवाद और प्रयोगवाद की अतियों से बचते हुए एक तीसरी राह बनाई या कहें उनकी सर्जना से बनती गई, जिसमें नई सामाजिक चिंताओं और अध्यवसायी कवि-प्रतिभाओं का अभिनव काव्य-विहार था। ये वे कवि थे, जिनकी भरपूर निगाह पश्चिम की ओर थी और परंपरा को ये लगभग पीछे छोड़ते हुए कुछ ऐसा सोचना, अनुभव करना और रचना चाह रहे थे, जो परंपरा से सर्वथा कोई दृष्टि और दर्शन लिए हुए हो। इस तुलना में नवगीत कवि अपेक्षाकृत परंपरा के काव्य-संगीत और उसकी प्रासंगिकता के कायल थे। यही कारण है कि उस समय के धुरंधर आलोचकों ने नए कवियों के रचना-मानस और अनुभव-संसार को लक्षित करते हुए लिखा- यह निहायत विदेशी कलम है, जिसमें ‘भाव धारा की विरलता’ ही अधिक है। याद भी दिलाया कि ‘काव्य की प्रक्रिया भाव मूलक ही होती है।’ प्रतिभाशाली कवि आवश्यक बौद्धिक और दार्शनिक तथ्यों का अपनी भावमयी रचना में समाहार किया करते हैं। शायद ही कोई रचना हो, जिसमें बौद्धिक चेतना का प्रवेश न हो पाया हो। कविता में जातीय जीवन का विकास भी प्रतिबिंबित होता है, पर बुद्धि रस तो एक अनोखा पदार्थ है। नवगीतों की प्रक्रिया इस तुलना में भाव-मूलक थी, जो तमाम रूखे-बेडौल यथार्थ के बीच कोमल संवेदनों की टीसपरक मधुरता लिए हुए थी। यह भी लिखना उन्होंने जरूरी समझा कि यह नई काव्यधारा जबकि अपनी रचनाओं में समाज या राज्य द्वारा संत्रस्त होने की सूचना देती है। इन रचनाओं में मध्यवर्ग और खासकर बुद्धिजीवी अशंका अवसाद और किंकर्तव्यता चित्रित हुई है।
नवगीत यों भी इतनी प्रबल काव्यधारा नहीं थी, न ही उसकी अपनी कोई व्यस्थित विचार भूमि थी, कवियों का भी उस तरह से सुनियोजित समूह नहीं था। कोई इलाहाबाद में बैठा लिख रहा था, कोई भिंड ग्वालियर में, कोई देवास तो कोई अलीगढ़, बनारस और कलकत्ता में। ‘धर्मयुग’ के संपादक धर्मवीर भारती ने अपने संपादकीय कौशल से एक समूह बनाते हुए नवगीत कवि के रूप में रवींद्र भ्रमर, उमाकांत मालवीय, नईम, ओम प्रभाकर, नरेश सक्सेना और शलम श्रीराम सिंह को एक लोक स्वीकृति दी। उस वक्त के इनके गीतों को देख पाठकों ने राहत की सांस सी ली और फिर से कविता के पास लौटने की प्रक्रिया से जुड़ गए। अगर उस वक्त के नवगीतों को देखें तो पता चलेगा कि घर-परिवार, गांव-देश, प्रेम, प्रकृति यहां तक कि समय और राजनीति पर ही ये कवि केंद्रित हैं और टूटते-बिखरते संबंधों को मूल्यावान मानते हुए बचा लेना चाहते हैं। नई कविता के कवियों की जड़ें जैसे उनके अपने व्यक्तित्व में हो, पर नवगीत कवि अपनी पारंपरिक जड़ों को याद करते हुए आए थे। फिर भी जीवन की नई यथार्थ भूमियों को शायद ही कभी निगाह से ओझल होने दिया। यों तीसरा सप्तक के केदारनाथ सिंह, कुंवर नारायण, सर्वेश्वर भी नवगीत कवियों के कतिपय गुणों से संपन्न दिखते हैं और नई कविता का अधिक संतुलित चेहरा बनाते हैं, तब भी कवि अपनी संवेदना में अधिक प्रबल और बौद्धिक धरातल पर पुष्ट हैं। केदारनाथ सिंह, सर्वेश्वर और भारतभूषण अग्रवाल ऐसे कवि हैं, जिन्हें एक हद तक नवगीत कवियों के वरिष्ठ और तेजस्वी समूह के रूप में देखा जा सकता है। बाद में तो चंद्रदेव सिंह नाम के एक कवि ने ‘पांच जोड़ बांसुरी’ जैसा ऐतिहासिक संग्रह निकाल कर नवगीत को अकादमिक क्षेत्रों में भी प्रतिष्ठा दिलवा दी।
यहां ठाकुर प्रसाद सिंह के संग्रह ‘वंशी और मादल’ तथा नवगीत के प्रबल प्रस्तावक राजेंद्र प्रसाद सिंह की भी याद जरूरी है, जिन्होंने नवगीत के लिए वातावरण रचने में अगुआई की। कुछेक के अनुसार नवगीत उन्हीं की दी हुई संज्ञा है। साठ से सत्तर के बीच अनेक नवगीत कवि उभरे, जिनमें देवेंद्र कुमार बंगाली, माहेश्वर तिवारी, रमेश रंजक, बुद्धिनाथ मिश्र और एकदम नयों में यश मालवीय और ढेर सारे। नवगीत के ये उत्तरवती झंडाबरदार थे। फिर भी यह काव्यधारा उतना प्रभावकारी और दमदार ऐसा कुछ नहीं दे सकी, जितना कि नई कविता ने किया और दिया। नई कविता में संवेदना की अधिक ताजगी थी, गहरा काव्य-बोध और तीखा युग-बोध तो था ही। यह सब देखते हुए इतना कहा जा सकता है कि अनुभव-भूमियों की नई खेप के साथ नई जीवन-दृष्टि और काव्य-दृष्टि भी जरूरी होती है। इससे भी कहीं अधिक जरूरी होता है कवि प्रतिभा का अपने समय का अवगाहन। आलोड़न-विलोड़न और परंपरा-बोध। इस प्रकार का कवि-व्यक्तित्व अर्जित करने के लिए कवि को जिन तैयारियों की जरूरत होती है वे निस्संदेह केवल भावपरक नहीं हैं। अफसोस कि नवगीत के कवियों ने इधर ध्यान नहीं दिया। छायावादियों के असाधारण और महान व्यक्तित्व को अगर अलग करके भी हम प्रगतिवादियों और प्रयोगवादियों के व्यक्तित्व पर निगाह डालें तो अज्ञेय, शमशेर, मुक्तिबोध केवल भाव सत्ता पर खड़े कवि नहीं हैं। इनकी प्रचंड साधना परंपराविद्ध आत्म सजगता, दायित्वबोध और भाषा दृष्टि भी विरल है। जीवन दृष्टि तो है ही।
नवगीत कवि जहां चूके वे जगहें यही हैं। मजेदार यह कि कुछेक तो यह रास्ता छोड़ कर नई कविता वाली राह पर आ खड़े हुए, जिनमें शलभ श्रीराम सिंह और नरेश सक्सेना प्रमुख हैं। ओम प्रभाकर उर्दू गजल की ओर चले गए। माहेश्वर तिवारी सस्ते मंचों की ओर।
इसके बाद नवगीत एक साहित्यिक संज्ञा मात्र बन कर रह गया, जिसमें फिर कोई ऐसा दमदार और तरोताजा व्यक्तित्व नहीं आया। शंभुनाथ सिंह ने, जो स्वयं एक छायावादोत्तर गीत-कवि थे, अनेक कारणों से नवगीत के सैकड़ों कवियों की भीड़ जुटा कर नवगीत दशकों की सृष्टि कर दी। इससे दस्तावेजीकरण भले हुआ, पर कितनी और प्रतिभाएं सामने आर्इं, कहना मुश्किल। जमीन की कठिन चुनौतियां और कथित नवगीत कवियों का व्यक्तित्व देखते हुए अब यह कह पाना कठिन है कि नवगीत के नाम पर लिखे जा रहे ढेर गीतों का क्या होगा। चौहत्तर-पचहत्तर में गजल विधा का नवसंस्कार कर दुष्यंत कुमार ने जो रेखा इस परंपरागत विधा में खींची, उसे आगे ले जाने वाले बहुत थोड़े ही आए या नहीं आ सके। अदम गोंडवी जैसे एकाध ही अपनी पहचान बना पाए। एक ही राह पर या कहें चली हुई राह पर चहलकदमी या फिर रवायत से भरी आवाजाही में नएपन या फिर मौलिकता का प्रश्न ही कहां? मौलिकता का निवास तो उस अभिनव काव्य-दृष्टि और काव्य-वस्तु में हुआ करती है, जिससे कवि का व्यक्तित्व बनता और पहचान होती है। नवगीत के नाम पर कवियों की कथित बिरादरी में ऐसा कुछ तलाश पाना अब संभव ही नहीं रह गया है।
यह भी समझ में नहीं आता कि कविगण अपनी छंदात्मक सृष्टियों को नवगीत किस आधार पर कहते हैं? क्या कविता कोई बनी-बनाई लीक या राह है? या फिर गीतात्मक लयों का एक समूह मात्र, जिसे आसानी से नवगीत कहा जा सके। या यह मान लिया जाए कि ‘नई कविता’ के कतिपय अतिवादों के चलते उसी कालावधि में कुछ ऐसे कवि-व्यक्तित्व आए थे, जो एक काव्यात्मक संतुलन और मूल्य मर्यादा की याद दिला रहे थे। और भाषा छंद-नई काव्यलयों का प्रवर्जन कर यह बता रहे थे कि जीवन अभी एकदम से बदल नहीं गया है, न समाज का समूह-मन ही इतना परिवर्तित हो चुका है कि रक्त-संबंध से लेकर भाव-संबंध तक को अयथार्थ के खाते में डाल कर दायित्व मुक्त हो जाएं। कविता कोई आकाशबेलि नहीं है। वह समाज के सूखते जाते संवेदनाओं की रक्षा ही नहीं पहरेदारी भी करती है। उसकी संभावित संवेदनात्मक आहटों पर निगाह रखती है। बासी होती जाती भाषा और कहन को अपने पौरुष से तरोताजा कर ऐसी नई भाव-चेतना का संस्कार करती है, जिसे अगली पीढ़ियां भी अपनी विरासत के रूप में संभाल कर रखती हैं। ०
