पत्रकारीय लेखन अपने समय का दस्तावेज होता है। इसमें सिर्फ व्यवस्था संबंधी गड़बड़ियों की आलोचना और सरकार की नीतियों की मीन-मेख नहीं होती। उसके जरिए तत्कालीन सभ्यता, संस्कृति, परंपराओं पर पड़ने वाले प्रभावों का इतिहास भी दर्ज होता चलता है। राजकुमार भारद्वाज की किताब ‘हरियाणा का विकास: दशा, दिशा और दावे’ ऐसा ही एक दस्तावेज है। हरियाणा अपनी कृषि संस्कृति, अपनी सामुदायिक परंपराओं के लिए जाना जाता रहा है। मगर विकास के नाम पर फैलती पूंजीवादी संस्कृति और बाजारवादी होड़ के चलते मानो वहां की जीवन-शैली, वहां की सामाजिकता पर ग्रहण लग गया है। दिल्ली से चंडीगढ़ और राजस्थान की सीमा तक सटे हरियाणा के गांव के गांव शहर बन गए हैं। देशी-विदेशी-बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने गांवों को अमरबेलि की तरह छाप लिया है। रिहाइशी कॉलोनियों और शॉपिंग मॉलों के जंगल उग आए हैं। वहां जो भी सरकारें आती है, कंपनियों की भूख मिटाने के लिए खेतों की बलि चढ़ाने लगती है। किसान विद्रोह करते रहे, अपनी जमीन देने से इनकार करते रहे, पर सरकारें लोभ-लाभ गिना कर या अपने विशेषाधिकार का उपयोग कर जमीनें हड़पती और विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाती रहीं। राजकुमार भारद्वाज ने हरियाणा में पैर पसारती पूंजीवादी संस्कृति और राजनीति के गठजोड़ को अनेक कोणों से देखने-परखने-व्याख्यायित करने का प्रयास किया है। उनके ‘नेता, समाज और पूंजीवाद’, ‘प्रॉपर्टी का लोकतंत्र और नौकरशाही की हैसियत’, ‘दम तोड़ती तालाब संस्कृति’, ‘अरावली बचाओ, हरियाणा बचाओ’, ‘एसईजेड- यह पब्लिक है, सब जानती है’ आदि लेख हरियाणा में विकास के नाम पर हो रहे विनाश की तस्वीरें पेश करते हैं।
खेती-किसानी खत्म हुई, गांवों में शहर घुस आया, तो सबसे पहले बदला युवाओं का मन। आधुनिकता की चमक उनकी आंखों को चैंधियाने लगी। नया फैशन, नई गाड़ियां, नए कारोबार लुभाने लगे। इस तरह हरियाणे में अजब तरह की विसंगतियां उभरनी शुरू हुर्इं। आधुनिकता और परंपरा के टकराव से कई तरह की विकृतियां पैदा होने लगीं। खूब सुविधाओं, चमक-दमक वाले नामी स्कूल-कॉलेज, एजुकेशन हब खुलने शुरू हो गए, मगर इस राज्य के युवाओं पर इस शिक्षा के विस्तार का कोई सकारात्मक असर नहीं दिखा।
वे बढ़िया खाने-पहनने, महंगी गाड़ियों में चलने और पैसा कमाने के सपने देखने को ही जमाने का चलन मानते रहे, अपनी तरक्की समझते रहे। जिनके खेत बिके वे तो कुछ अमीर दिखने लगे, पर जो पारंपरिक पेशों से जुड़े थे, सीमांत किसान थे, वे गरीबी और जहालत में दिन गुजारने लगे। सरकारी शिक्षण संस्थाओं की दुर्गति होती गई, गरीब परिवारों के बच्चों की पढ़ाई-लिखाई अधकचरी होती गई। ऐसे में एक तरफ चमक-दमक और पैसे का भोंडा प्रदर्शन बढ़ा तो दूसरी तरफ जहालत पैदा हुई। इससे सांस्कृतिक टकराव शुरू हुआ, समाज में जातीय विभाजन बढ़ने लगा। राजकुमार भारद्वाज ने ‘हीरो होंडा से आॅडी तक’, ‘खाना-पहनना ब्रांडेड, माणस होंगे अनब्रांडेड’, ‘अहीरावल में आइआइटीयन डायनामाइट’, ‘कैंब्रिज इंटरनेशनल मांटेसरी’, ‘सांस्कृतिक पुनर्जागरण की जरूरत’ आदि लेखों में इन विसंगतियों को दिखाया है।
बाजार ने हरियाणा की संस्कृति को किस कदर विकृत किया है इसका अंदाजा इस किताब के महज एक लेख से लगाया जा सकता है- ‘मृत्यु भोजों के बहाने धन-बल का भोंडा प्रदर्शन’। ‘मृत्यभोज राजनीति और धन शक्ति के प्रदर्शन के मौके बन चले हैं। इस बहाने भीड़ जुटा कर लोग अपनी धन-शक्ति का प्रदर्शन करने लगे हैं। इस भेड़चाल में आज सभी शामिल हो लिए हैं। जब शोकाकुल परिवार ही मर्यादाओं का उल्लंघन कर रहे हैं, तो समाज की छीजन बढ़ेगी ही।… अब मृत्य भोजों के आयोजनों को विशाल और भव्य बनाने में ही अपनी शक्ति और सामर्थ्य चुका कर शक्ति प्रदर्शन करने का चलन बन गया है।’ किसी समाज की विकृति का इससे बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है कि मृत्य पर सामूहिक शोक के बजाय उसे किसी सांस्कृतिक समारोह की तरह मनाया जाए! जब मृत्य भोज में इस तरह प्रदर्शनप्रियता बढ़ी है तो शादी-विवाह, जन्मदिन आदि के मौकों पर क्या स्थिति होती होगी अंदाजा लगाया जा सकता है। पच्चीस-तीस हजार गाड़ियों की पार्किंग के लिए जगह बनाना, बारातियों को सोने के सिक्के बांटना, दहेज में हेलीकॉप्टर देना, पांच सितारा होटलों के व्यंजन को चुनौती देती खाद्य सामग्री आदि का बंदोबस्त हरयिाणा की सादियों में होड़ की तरह शामिल हो चुका है। इस किताब में हरियाणा की छीजती परंपराओं के ऐसे अनेक प्रसंग हैं।
जब कोई समाज अपनी परंपराओं, अपनी संस्कृति से विमुख होने लगता है, तो उसमें मानवीय संवेदना का ह्रास स्वाभाविक है। विचित्र है कि विकास की चमक के बीच एक तरफ तो हरियाणा का समाज आधुनिक होने की होड़ में दिखता है, पर दूसरी तरफ वह अपनी जड़ मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाया है। आधुनिकता वहां फैशन के रूप में जरूर प्रवेश कर गई है, उसने वहां की संस्कृति में तोड़-फोड़ शुरू कर दी है, पर मानसिक बनावट पर उसका असर नहीं हो पाया है। इसी का नतीजा वहां जातीय विद्वेष है। सगोत्री या फिर विजातीय विवाह के विरोध में युवाओं की सरेआम हत्या है। अपनी परंपरा की लीक पीटती खाप पंचायतें विवाह, नौकरी, पहनावा आदि जैसे मसलों पर महिलाओं को प्रताड़ित करने, दिन फतवे जारी करने, महिलाओं के अधिकारों का हनन करने, दलितों पर अत्याचार करने से तो पीछे नहीं हटतीं, पर वही युवाओं की विकृत मानसिकता, मृत्यु भोज में भोंडे प्रदर्शन आदि पर कभी आगे आती नहीं दिखतीं। खाप पंचायतों की मनमानियों और अत्याचारों को लेकर जितनी बदनामी हरियाणा की हुई, उतनी शायद ही किसी और राज्य के किसी जातीय संगठन की हुई हो। सर्वोच्च न्यायालय तक को समांतर सत्ता के रूप में चल रही इन पंचायतों पर तल्ख टिप्पणी करनी पड़ी। पर इस स्थिति में किसी सुधार की गुंजाइश नहीं दिखती।
‘सांस्कृतिक पुनर्जागरण की जरूरत’, ‘खापों के लोकतंत्र पर बाजार का हमला’, ‘आॅनर किलिंग पर नई बहस की जरूरत’, ‘कौन पढ़ेगा एजुकेशन हब में’ आदि लेखों में भारद्वाज ने हरियाणा में जड़ें जमाती विकृतियों का लेखा-जोखा पेश किया और यहां सांस्कृतिक बदलाव की जरूरत को रेखांकित किया है।
जिस समाज में सामूहिकता छीजने लगे, विकृतियां पैदा होने लगें, युवा मानसिकता प्रदूषित हो जाए, वहां अपराधों का सिलसिला स्वाभाविक रूप से शुरू हो जाता है। हालांकि यह समस्या देश के उन तमाम हिस्सों में पैदा हो गई है, जहां विकास और औद्योगीकरण के चलते परंपरागत पेशे खत्म हो गए हैं, सामुदायिकता की जगह प्रदर्शनप्रियता आ गई है, पर हरियाणा में यह कुछ अधिक दिखने लगा है। हत्या और बलात्कार की घटनाएं वहां बढ़ी हैं। पैसा कमाने की होड़ में भ्रष्टाचार बढ़ा है। राजनीति का अपराधीकरण हुआ है। इस किताब में महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध, प्रशासन की निष्क्रियता आदि पर तफ्सील से विचार किया है। ‘लफंगी पूंजी और बलात्कार’, ‘कामुकता से वीभत्सता तक’, ‘चुनाव, दलित और मिर्चपुर’, ‘दुष्कर्म के बाद’, ‘सत्ता की राजनीति और बलात्कार’, ‘विकास और दलित’ आदि लेख इन बातों की तसदीक करते हैं। इसी तरह हरियाणा में डेरों का दबदबा और राजनीति में उनकी दखल, गड़बड़ाते लिंगानुपात आदि पर भी इस किताब में चिता व्यक्त हुई है।
इन सबके बावजूद हरियाणा में कई बातें सकारात्मक भी हैं। नशाखोरी के खिलाफ महिलाओं का आंदोलन, अर्थव्यवस्था में उनका योगदान आदि सराहनीय है। खेलों, खासकर पहलवानी में हरियाणा की लड़कियों ने उल्लेखनीय सहयोग दिया है। ‘…और महिलाओं ने बदल दिया अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र’, ‘इस रज से निकलते शूर वीरों में अति शूरवीर अहीर’ लेख इन पहलुओं को रेखांकित करते हैं। राजकुमार की यह किताब हरियाणा की दशा, दिशा और संभावनाओं को समझने में काफी मददगार है।
हरियाणा का विकास: दशा, दिशा और दावे
ले.-राजकुमार भारद्वाज
आधार प्रकाशन, पंचकूला (हरियाणा)।
