अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी
बीसवीं सदी से लेकर अब तक जिस कलारूप ने कम समय में सबसे ज्यादा असर हमारे जीवन पर डाला है, कह सकते हैं कि वह सिनेमा है। हमारी भाषा में ‘फिल्मी’ विशेषण की सक्रिय उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि फिल्मों से हमारे क्रिया-कलाप और जीवन व्यापार कितने अधिक प्रभावित हुए हैं और हो रहे हैं। ऐसे में लोकगीतों पर फिल्मों का प्रभाव न पड़े,यह असंभव है। लोकगीतों पर फिल्मों के असर को हम कई रूपों में देख सकते हैं। लोकगीत वे गीत हैं जो लोक में प्रचलित होते हैं, लोक द्वारा रचित होते है और उनकी अंतर्वस्तु लोक की होती है। फिल्म कलारूप नया है जबकि लोकगीत बहुत पहले से लिखे जा रहे हैं। फिल्मों में जो गीत इस्तेमाल किए जाते हैं वे अधिकांशत: खपाऊ गीत (सिचुएशनल सांग्स) होते हैं। लोकगीतों की निर्माण प्रक्रिया और उनकी उपस्थिति खपाऊ गीत के रूप में कभी नहीं रही। इस दृष्टि से जब फिल्मों ने लोकगीतों को लिया तो उन पर खपाऊ गीत का रंग चढ़ा और वे फिल्म की कहानी से जुड़ने लगे। यानी लोकगीत जो अपनी व्याख्या में बहुस्तरीय थे, किसी खास कहानी से जुड़े हुए नहीं थे, वे व्याख्या और व्याप्ति में एकायामी या सीमित हुए। यह फिल्मों का तकनीकी असर है जो लोकगीतों पर पड़ा। लोकगीत सिर्फ गीत ही नहीं होते, उनके प्रदर्शन का अपना लोकपक्ष भी होता था। फिल्मों ने जब लोकगीतों को लिया तो वे इन सब से कट कर फिल्म की जरूरत का हिस्सा बन गए। वे अपने लोक परिवेश को छोड़कर फिल्मी परिवेश को अपना बैठे।
लोकगीत जो गाए जाते हैं, उनकी अपनी धुनें होती हैं। संस्कार गीतों की अपनी धुनें, श्रम गीतों की अपनी, जातीय गीतों की अपनी। फिल्मों में इन धुनों का खूब प्रयोग किया गया। इन धुनों पर जो फिल्मी गीत बने, वे कई बार लोक संवेदना को बूझने में विफल भी हुए। पहले की तुलना में फिलहाल के दशकों की फिल्मों ने लोकगीतात्मक संवेदना का बहुत ध्यान न देते हुए इन धुनों का या इन धुनों में कुछ रद्दोबदल करके इनका इस्तेमाल किया। फिल्म लोगों तक ज्यादा तेजी से पहुंचती है इसलिए इन धुनों के साथ जो फिल्मी गीतात्मक संवेदना लोगों तक पहुंची, वह अधिक असरदार साबित हुई। 1958 में राज खोसला निर्देशित फिल्म आई थी ‘काला पानी’। इसमें मजरूह सुल्तानपुरी का लिखा और आशा भोंसले की आवाज में गाया एक गाना था-‘नजर लागी राजा तोरे बंगले पर। जो मैं होती राजा काली बदरिया, बरसि रहती राजा तोरे बंगले पर।’ लोक की धुन पर लोकगीतात्मकता को निभाता हुआ गाना है यह। मुजरा के माहौल में गाया गया। मुजरा के ही माहौल में गाया एक और गाना है-‘ दिल मेरा मुफ्त का।’ इसका रीमिक्स संस्करण गाया है मालिनी अवस्थी ने जो स्थापित लोकगायिका हैं। रचा है नीलेश मिश्रा ने। 2012 में बनी फिल्म ‘एजेंट विनोद’ में मुजरा के ही माहौल में रद्दोबदल के साथ लोकगीत की धुन का उपयोग हुआ, पर गाना लोकगीतात्मक संवेदना से बहुत दूर चला गया। यहां यह आइटम सांग बन कर गया है।
आशा भोंसले लोकगायिका नहीं मानी जातीं। फिर भी उनके गाए गानों में लोकगीतात्मकता है, लेकिन मालिनी अवस्थी लोकगायिका हैं, जबकि उनका गीत लोक से कटा हुआ है। यह फिल्म का अजीब आकर्षण और असर है कि लोकगायक अपनी मूल सांगीतिक निष्ठा से ही समझौता कर लेते हैं। ‘मौका मिलना’ उनके लिए सबसे बड़ा मसला है। तमाम लोकगायक इस प्रभाव के शिकार मिलेंगे। अपवाद का जिक्र भी जरूरी है और अपवाद के रूप में लोकगायिका शारदा सिन्हा का नाम लिया जा सकता है। इन्होंने फिल्मों में जब भी गाया तो इस बात का ध्यान रखा कि लोकगीत की जमीन से समझौता न हो। 2012 में अनुराग कश्यप के निर्देशन में आई फिल्म ‘गैंग्स आफ वासेपुर’ में इन्होंने गाया है-तार बिजली से पतले हमारे पिया। मुखड़ा पारंपरिक लोकसंगीत का ही है और गीत लिखा है वरुण ग्रोवर ने। यह गीत शादी के मौके पर गाया जा रहा है। परिवेश भी लोकगीत का बना है। गीत की संवेदना भी लोक की है। चम्मच से ढोलक की लकड़ी को पीटने पर निकलने वाली ध्वनि तक को शामिल किया गया है। यह मर्म गीत में रचा गया है कि मेरे प्रिय की यह दुर्दशा किन-किन स्थितियों के चलते हुई है। ‘भाव कोइला के बिकले हमारे पिया!’
फिल्मों में ‘फोक’ के तड़के ने लोक की भ्रष्ट व्याख्या की। इससे इनकार नहीं कि लोक में एक खुलापन होता है पर उसके खुलेपन और बंबैया फिल्मों के खुलेपन में बड़ा अंतर है। लोक का खुलापन सहज होता है। फिल्मी खुलेपन में बाजारूपन होता है। हाल के दो दशकों में लोक, लोकगीतों और लोकधुनों को बाजारू मकसद से फिल्मों में खूब दुहा गया है। इससे लोक या लोकगीतों की एकांगी और भ्रामक छवि सामने आती है। ‘आइटम सांग्स’ का फिल्मी बाजारू नुस्खा नया है, पहले ऐसा नहीं था। लोकधुनों पर लोकगीत लिखे भी जाते थे और संगीतबद्ध भी किए जाते थे। कजरी, चैती, दादरा आदि फिल्मों में निबाहे जाते थे। 1963 में ‘बिदेसिया’ की कजरी देखी जा सकती है जिसमें गीता दत्त और कौमुदी मजूमदार का स्वर है,‘नीक सैयां बिन भवनवा नाहीं लागे सखिया।’ इसी तरह मन्ना डे के कंठ से 1964 में ‘नैहर छुटल जाय’ की कजरी ‘ओ रामा रिमझिम बरसेला पनिया’ बेहतरीन लोकगीत है। पहले नौशाद, जयदेव, सलिल चौधरी, एसडी वर्मन, ओपी नैयर, कल्याणजी आनंदजी आदि संगीतबद्धता में प्रचलित लोकगीतों की धुनों को रखते थे, तो लोकगीत भी पुनर्नवा होते थे। अब तो कोई महसूस भी नहीं कर सकेगा कि ‘कजरारे कजरारे’ कानपुर के किन्नरों के लोकगीतों का मुखड़ा है। पहले लोकगीतों और लोकधुनों से फिल्मी गीत प्रभावित होते थे, अब प्रक्रिया उलट गई है। अब फिल्मी गानों की नकल पर लोकगीत लिखे और गाए जाते हैं। इसे ज्यादा मुखर और दुखद रूप में वर्तमान भक्ति गीतों में देखा जा सकता है कि किस तरह ये किसी ‘फेमस’ फिल्मी गाने की घटिया नकल साबित होते हैं। यह ऐसा प्रभाव है जिसने लोकगीतों की बनावट-बुनावट को बुरी तरह क्षतिग्रस्त किया है, लोकगीत की मौलिकता नष्ट की है।
मुंबैया फिल्मिस्तान में पंजाबी ‘कल्चर’ हावी है। हिंदी क्षेत्र में इतनी लोकभाषाओं की व्यापकता है जबकि उनकी मौजूदगी फिल्मों में नहीं दिखती। अवधी-ब्रज-भोजपुरी-छत्तीसगढ़ी-मैथिली आदि हिंदी क्षेत्र की भाषाओं का कितना ‘लोक’ दिखता है हिंदी फिल्मों में? उल्टे इन भाषाओं और इनके लोक को लेकर एक हीन-छवि को रचने का काम भी फिल्मों ने किया है। इसे फिल्मों में हीन स्थिति के पात्रों द्वारा इन भाषाओं को प्रयोग करवाने के उदाहरण से भी देख सकते हैं। लोकगीतों को रखने के मामले में भी हिंदी क्षेत्र के वैविध्य की समृद्धि की निहायत अनदेखी दिखती है। पंजाबी को किसी रसूखदार के मुंह से बोलवाना और आइटम सांग के लिए लिए भोजपुरी या अवधी के ‘फोक’ का तड़का दिलवाना इसी विसंगति का एक पहलू है।
फिल्मों का एक सकारात्मक पक्ष इस रूप में देखा जा सकता है कि लोकगीत जो किसी क्षेत्र तक सीमित थे वे एक व्यापक माध्यम यानी फिल्मों के जरिए व्यापक इलाके और जनसमूह तक पहुंचे। यहां पंजाब का हीर और जुगनी दिखता है तो बंगाल का बाउल भी। बाउल संगीत शैली के लिए 1955 में विमल राय निर्देशित फिल्म ‘देवदास’ देखी जा सकती है। ‘आन मिलो आन मिलो श्याम सांवरे’ और ‘साजन की हो गई गोरी अब घर का आंगन बिदेस लागे रे।’ इसी तरह राजस्थानी और पहाड़ी अंचल के लोकगीत, धुन और बोल में देखे जा सकते हैं। पहले की फिल्मों में अवधी-भोजपुरी के कई गीत हैं जिन्हें कई बड़े गायकों ने अपनी आवाजें दी हैं। 2005 में आई ‘पीपलीलाइव’ का एक छत्तीसगढ़ी गाना है, ‘चोला माटे के हो राम।’ खूबसूरत लोकगीत है। मुखड़े तो दक्षिणभारतीय भाषाओं से भी उठाए गए हैं। ‘श्री 420 ’ में रमैया वस्ता वइया। इस मुखड़े को संगीतकार शंकर जयकिशन ने मुंबई में तेलुगू मजदूरों को गाते हुए सुना था। वहां से आ कर यह फिल्मी गीत का मुखड़ा बना और अमर हो गया।
लोकगीतों को लेकर जो थोड़ा बहुत सकारात्मक प्रभाव दिखता है वह इन फिल्मों या फिल्मकारों के उद्देश्य में शामिल नहीं था वह तो घलुए में आई वस्तु (बाई प्रोडक्ट) है। हालीबुडिया से बालीबुडिया फिल्म का एक फर्क यह भी है कि वहां फिल्मों में गीत नहीं होते,यहां होते हैं। इसलिए लोकगीत संबंधी ऐसे सवाल और प्रभाव भी वहां नहीं देखे जा सकते जैसे कि बालीबुडिया फिल्मों में। गीत-चयन के साथ अगर एक समझदारी या नीति भी सिनेमाई उद्देश्य का हिस्सा होता तो शायद लोकगीतों पर प्रभाव संबंधी एक दूसरा रुख भी दिखाई देता।
पहले के गीतकारों-संगीतकारों में संजीदगी थी, जो बाद में बाजारूपन से स्थानांतरित हो गई। बहुचर्चित आइटम सांग ‘मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए’, ताराबानो फैजाबादी के गाए गीत ‘लौंडा बदनाम हुआ नसीबन तेरे लिए’ की घटिया नकल है), इस बदली हुई स्थिति का और लोकगीतों पर पड़ने वाले कुप्रभाव का भी उत्तम उदाहरण है।
बाद के समय में लोकगीतों का जैसा निर्वाह फिल्मों में हुआ और उसकी जो छवि बनी उससे लोकगीतों में लोकमत आधारित प्रतिरोध भी गायब होता गया। लोकप्रिय माध्यमों में जो गीत जा रहे हैं उनमें सामाजिक और राजनीतिक चेतना, जो कि हमारे ‘कामन सेंस’ में होती है, कहां और कितनी बची है! एक थोड़ा अगंभीर किस्म के लोकगायक माने जाते थे बलेसर, उन तक ने इस लोकमत आधारित सामाजिक और राजनीतिक चेतना को अपने गीतों में रखा-
नई दिल्ली वाला गोरका झूठ बोलेला!
हीरो बांबे वाला लमका झूठ बोलेला!
पर फिल्मों के लोकगीत में इतनी भी गुंजाइश नहीं बची। अपवाद में ‘गुलाल’ फिल्म में पीयूष मिश्रा की पंक्तियां याद आती हैं-जैसे दूर देस के टावर में घुस जाए रे एरोप्लेन, जैसे सरे आम ईराक में जाके जम गए अंकल सैम।’ पर ऐसा अपवाद ही है। फिल्मी गीतों के आने से पहले जनजीवन लोकगीतों से ही अपने जीवन को सांगीतिक बनाता था। अब फिल्मी गीतों का विकल्प उसके पास है। इस विकल्प ने लोकगीतों के साथ चले आ रहे मनुष्य के परंपरागत रिश्ते को बड़े पैमाने पर बदल दिया है। यों भी नई जीवनशैली की हड़बड़ी या शीघ्रता लोकगीतों की ठहराव-मुद्रा के खिलाफ जाती है। बिरहा अदि लोकगीतों के ठहराव में अब कौन जीना चाहता है! लोकगीत इन चुनौतियों के मुकाबले अपना स्वरूप बदल नहीं रहे, बल्कि विकृत हो रहे हैं। इसे उन लोकगीतकारों और लोकगायकों के रूप में देखा जा सकता है जिन्हें समाज पापुलर कहता है। इस जटिलता और विडंबना में फिल्मी गीत सांगीतिक पलायन की जमीन मुहैया करते हैं। १
