स्वतंत्र रिछारिया
शिक्षा संबंधी सभी सिद्धांत, प्रक्रियाएं, प्रणालियां, विचार, दस्तावेज वगैरह एक बात पर जोर देते हैं कि बच्चों के सीखने की प्रक्रिया में शिक्षा का सबसे महत्त्वपूर्ण और आवश्यक कार्य बच्चों में विवेचनात्मक-तार्किक चिंतन का विकास करना है। ताकि बच्चे सिर्फ रटकर सूचनाएं एकत्रित न करें बल्कि वे विषयों और समाज की घटनाओं के प्रति तार्किक रूप से अपनी समझ विकसित करते हुए ज्ञान निर्माण कि प्रक्रिया में सहभागी हो सकें। सिद्धांतों का सार है कि बच्चे समाज में विभिन्न सामाजिक संस्थाओं और वयस्कों से अंत:क्रिया करते हुए स्वयं ही ज्ञान का सृजन करते हैं। सिर्फ समाज, परिवार और स्कूल में उनकी जिज्ञासा को प्रोत्साहित करने वाला वातावरण जरूरी है। दो से चार साल के बीच उम का वह समय होता है जब बच्चे स्पष्ट रूप से बोलना, अभिव्यक्त करना, नए शब्दों के साथ कुछ वाक्यों को गढ़ना प्रारंभ करते हैं। बाल्यावस्था का यह समय जिज्ञासा का चरमकाल भी कहा जा सकता है। क्योंकि इस समय बच्चा अपने आस-पास की सभी सजीवों और निर्जीवों के प्रति कौतूहल और उत्सुकता रखता है। बच्चे के जागने के साथ ही उसके क्या? क्यों? कहां ? कैसे? जाग जाते हैं और रात्रि में उसके सोने तक निरंतर वह उन्हें अपने साथ ही रखता है। इस समय उसके पास अनगिनत प्रश्न होते हैं। जो शायद उसके सीखने समझने और व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया के औजार हैं। समाजीकरण और बच्चे के विकास का यह अतिमहत्त्वपूर्ण समय होता है, जब बच्चे की जिज्ञासाओं, प्रश्नों, बातों को आदर और कोमलता से प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। हालांकि, कटुसत्य यही है कि वयस्कों की दुनिया के पास धैर्य और विनम्रता से बच्चों के अंतहीन प्रश्नों और बातों को सुनने के लिए समय ही नहीं है और अगर समय है भी तो यह सब उन्हें निरर्थक-सी लगती है।
आधुनिक काल में बच्चों के सीखने और ज्ञानर्जन के लिए स्कूल और शिक्षक को ही सबसे महत्त्वपूर्ण माना जाता है। समाज और परिवार में यह सामान्य मान्यता है कि घर में बच्चे जो भाषा बोल रहें हैं, जो प्रश्न पूछ रहे हैं, वह सब खेल है। वास्तविक शिक्षा और सीखना तो स्कूल जाने पर ही प्रारंभ होगा। जबकि हकीकत कुछ और ही है। स्कूल जाने के पूर्व बच्चा बहुत कुछ भाषा, व्यवहार आदि सीख चुका होता है। चार से पांच साल तक आते-आते मानव के व्यक्तित्व का बहुत कुछ निर्धारण भी हो जाता है। समाजीकरण, व्यक्तित्व निर्धारण और सीखने के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण समय में जब बच्चों को वयस्कों द्वारा उनके प्रति स्नेह, प्रेम, धैर्य, आदर और प्रोत्साहन की जरूरत होती है, देखा गया है कि तभी परिवार, समाज और स्कूल के वयस्क बच्चों के साथ अक्सर असहिष्णु हो जाते हैं। शिक्षा के जिन मूल्यों मूल्यों यानी सहिष्णुता, प्रेम, धैर्य, वैज्ञानिक चेतना आदि की बात की जाती है, उसका व्यावहारिक रूप बच्चे शायद ही अपने प्रारंभिक काल में घर और स्कूल में सीख पाते हैं। बच्चे अपने आसपास वयस्कों के इस व्यवहार को ही वास्तविक मानने लगते हैं। जब बच्चा देखता है कि उसके प्रश्नों का जवाब नहीं दिया जाता है तो उसे लगता है कि प्रश्न पूछना कोई अनुचित प्रक्रिया है। धीरे-धीरे वह प्रश्न पूछना ही बंद कर देता है, यह स्वभाव उसके साथ वयस्क और वृद्ध होने तक साथ ही रहता है। इस तथ्य को हमारे समाज और संस्कृति में महसूस किया जा सकता है। समाज में वयस्क भी अपने आसपास और जीवन से जुड़ी बातों, मुद्दों, राजनीति, धर्म, सामाजिक असमानता आदि पर प्रश्न नहीं पूछते। बचपन में जिस पूछने की स्वाभाविक और सहज प्रक्रिया को रोका गया, उससे ही समाज में मौन की संस्कृति (कल्चर आॅफ साइलेंस) उत्पन्न होता है।
‘बच्चों की आवाज और अनुभवों को कक्षा में अभिव्यक्ति नहीं मिलती। अक्सर शिक्षक का ही स्वर सुनाई देता है। बच्चे केवल अध्यापक के सवालों का जवाब देने के लिए या अध्यापक के शब्दों को दोहराने के लिए ही बोलते हैं। कक्षा में वे शायद ही कभी स्वयं कुछ करके देख पाते हैं। उन्हें पहल करने के अवसर भी नहीं मिलते हैं। जरूरत है कि किताबी ज्ञान को दोहराने की क्षमता के विकास की बजाय पाठ्यचर्या बच्चों को इतना सक्षम बनाए कि वे अपनी आवाज ढूंढ सकें। बच्चों के सीखने के इस स्वर्णिम काल के प्रति घर, स्कूल और समाज में वयस्कों द्वारा इस तरह के गैरजिम्मेवार रवैए का क्या कारण हो सकता है? एक कारण हो सकता है कि वयस्क बच्चों के सहज, मौलिक प्रश्नों और बातों को उनके सीखने की प्रक्रिया में ज्यादा महत्त्वपूर्ण नही मानते हैं। दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि वास्तव में वयस्कों के पास बच्चों के सवालों के जवाब न होते हों। बच्चों के साथ संवाद के समय देखा गया है कि वयस्क लोग या जवाब नहीं देते, यां डांट देते हैं या गलत जवाब देते हैं। जबकि वयस्कों का यह सामाजिक और नैतिक दायित्व है कि बच्चों के प्रश्नों का वास्तविक और तार्किक जवाब दें। अगर सही जवाब नहीं मालूम तो विनम्रता से मना कर देना चाहिए। बच्चे उसी वातावरण में सीख सकते हैं जहां उन्हें लगता है कि उन्हें महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है। हमारे स्कूल आज भी सभी बच्चों को ऐसा महसूस नहीं करा पाते। सीखने का आनंद और संतोष के साथ रिश्ता होने की बजाय स्कूलों में भय, अनुशासन और तनाव ज्यादा हावी रहता है। इसलिए जरूरत है कि समाज, परिवार और स्कूल में वयस्क, बच्चों के इस महत्त्वपूर्ण समय में उन्हें उनकी सहज और मौलिक प्रक्रियाओं, गतिविधियों को सहिष्णुता, प्रेम, धैर्य और आदर के साथ प्रोत्साहित करें। ताकि समाज जिन शैक्षिक और सामाजिक मूल्यों को बच्चों में प्रतिस्थापित करना चाहता है, वह वास्तविक रूप में फलीभूत हो सके। १
