चंद्रकांता शर्मा

हरसिंगार का वृक्ष भारत में लगभग सभी स्थानों पर पाया जाता है। इसमें सुंदर और सुगंधित फूल लगते हैं। उन्हें देख कर मन प्रफुल्लित हो जाता है। रात को फूल खिलते हैं और सूर्योदय के साथ ही वे जमीन पर झर जाते हैं। इसका वृक्ष दस-बारह फुट की ऊंचाई का होता है। इसकी लकड़ी जल्दी से टूट जाती है, साथ ही इसका तना सीधा और खुरदरापन होता है। मान्यता है कि इसके गिरे हुए पुष्प भगवान शिव के अलावा अन्य किसी देवता को अर्पित नहीं किए जाते। यह वृक्ष दो वर्ष की अल्पायु में ही पुष्प देने लगता है।  इसके पुष्पों में पीला रंग निकलता है, जिसे चंदन रूप में सिर पर लगाने के काम में लिया जाता है। बंगाल में तो हरसिंगार या पारिजात के पुष्पों को लक्ष्मी को भी अर्पित करने की परंपरा है। यह वृक्ष प्रदूषणरोधी है। इसके पुष्पों का कई आयुर्वेदिक दवाओं में भी उपयोग होने से यह आर्थिक रूप से भी उपयोगी है। लगभग देश के सभी प्रदेशों में यह विभिन्न नामों से पाया जाता है।

यही नहीं, हरसिंगार के पत्तों से पुराने से पुराना ज्वर भी दूर भगाया जाता है। इसके काढ़े को पीने से पेट की तिल्ली मिट जाती है। इस वृक्ष की छाल से जो तेल निकलता है, वह नेत्र रोगों में भी उपयोगी है। खांसी में भी यह लाभदायक है। यह पेट के कीड़ों का सफाया कर देता है। यह भूख जगाने वाला, आंतों की सिकुड़न रोकने वाला और त्बालों की जड़ों को मजबूती प्रदान करने वाला और कामोत्तेजक होता है। आयुर्वेद और यूनानी दवाओं में इसके पत्तों, छाल और पुष्पों का उपयोग विभिन्न प्रकार से किया जाता है। महिलाओं के मासिक धर्म की अनियमितता में काली मिर्च के साथ इसकी नई कोंपलों का उपयोग किया जाता है। अधिक रक्तस्राव को रोकता है और चर्म रोगों में तो यह रामबाण है। पुराने से पुराना दाद भी इसके पत्तों को पीसकर लगाने से समाप्त हो जाता है। इसकी भव्यता का तो जवाब ही नहीं है। ०