पहला पहर

सुबह का पहर सुबह का आसमान
उठते ही कहता है
मैं आ गया मेरी जान
थोड़ी देर में खिल जाएगा सूरज
सामने वाली पहाड़ियों के सिरों पर
बिछ जाएगा सोना
चीड़ के दरख्तों की पत्तियां
लद जाएंगी सोेने के साथ
चीड़ों के दरख्तों के पत्ते लद जाएंगे
गहनों के साथ, सौदाई हो जाएंगे
बिस्तर त्याग कर लोग
तभी नहाने के लिए चल देंगे
बज उठेंगी घंटियां, शंख और खरताल
मंदिर की सीढ़ियां चढ़ कर
नदी के सिर पर लटकता घंटा बजा कर
डरा देंगे कबूतरों को
तोते और चिड़ियों से
भर जाएगा आसमान
पंखों की उडारी के साथ
पक्षियों को गोद में लेकर
आसमान कहता है
मैं नहीं खाली
मेरी गोद बाल बच्चों से भरी हुई है
मैं भारत का आसमान हूं।

गरमी

ठंड गई और गरमी आई
पहले आया फागुन
चिड़ियों ने चढ़ा लिए बंगले
उठ बैठी है रोगिन
खोद रही है मिट्टी कुम्हारिन
जगह बनाए बैठने की
सुंदर सुराही, प्याले और घड़े
घड़ेयाली पर शोभें
ठंडा पानी कुएं में, छेड़खानी करती गरमी
ठंडा पानी पीकर काम पर घर से जाता करमी
शाम को अनारदाने की खुशबू कई घरों से आती
पानी पिलाती सुराहियां बाहर भी भीगी रहतीं
बूंद-बूंद इक-इक पानी की देखो सृष्टि सारी
ओक लगा कर एक सांस में पीते सब संसारी
दिन बढ़ता जैसे बढ़ता कुएं का ठंडा पानी
गरमी में यह बात भला किसे है तुम्हें सुनानी।
इंतजार

फागुन की ड्यौढ़ी के आगे
लग गया है पहाड़ सूखे पत्तों का
कोई तो सीधा पड़ा है
कोई गेंद-सा सिकुड़ा हुआ
कोई ले रहा है सांस धीरे-धीरे
कोई लगता बिल्कुल ही मरा हुआ
टहनियों पर नए अंकुर आने को आतुर बड़े
टहनियों पर जैसे हैं मोती जड़े
मोती उभरेंगे तभी तो इसमें आएगा निखार
हाथों की मुट्ठी है बंद
आंख बंद, मुंह मंद, कान बंद
निकलेंगे फिर धीरे-धीरे
हाथ, बाहें और इक छोटा-सा पेट
खिल गई पूरी बहार
फागुन को भी रहता है भई इंतजार
इसके आने का। ०