माता-पिता और अभिभावकों की यह आम शिकायत रहती है कि उनके बच्चों का किताबों की अपेक्षा टीवी और मोबाइल फोन पर खेलने में अधिक मन लगता है। वे बच्चों को अपने जमाने की पढ़ाई-लिखाई के माहौल और अनुशासन वगैरह का हवाला देकर उन्हें समझाने का प्रयास करते हैं, पर बच्चों का तर्क होता है कि जमाना बदल गया है। सचमुच जमाना बदल गया है, पढ़ाई-लिखाई के नए माध्यम और तौर-तरीके विकसित हो गए हैं, इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि बच्चों का किताब में मन नहीं लगता। इसकी वजहों और इससे पार पाने के कुछ उपायों पर पेश हैं रवि डे के सुझाव।

पढ़ाई-लिखाई का माहौल निरंतर बदल रहा है। अब किताबों के अलावा इंटरनेट आदि पर भी पाठ्यसामग्री उपलब्ध है। स्कूलों में नई-नई तकनीक और तरीके से बच्चों को पढ़ाने-सिखाने का प्रयास किया जाता है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आज के बच्चे पहले के जमाने की तुलना में ज्यादा सतर्क और समझदार हो रहे हैं, सूचनाओं से लैस हो रहे हैं। पर इसके साथ ही यह भी समस्या गंभीर होती गई है कि बच्चों की किताबों के प्रति रुचि खत्म हो रही है। पाठ्यपुस्तकों के प्रति रुचि न होने की शिकायत न सिर्फ अध्यापकों को, बल्कि अभिभावकों को भी रहती है। इस समस्या से पार पाने के लिए विशेषज्ञ लगातार विचार मंथन कर रहे हैं। बच्चों की काउंसिलिंग के अनेक केंद्र खुल गए हैं। अनेक कंपनियां बाजार में उतर आई हैं, जो बच्चों को रोचक ढंग से पढ़ाने का प्रयास करती हैं। फिर भी यह समस्या बनी हुई है। बच्चे किताबों के बजाय टीवी, इंटरनेट और मोबाइल गेमों पर अधिक समय खर्च कर रहे हैं। अनेक अध्ययनों से जाहिर हो चुका है कि टीवी, इंटरनेट और मोबाइल गेमों पर ज्यादा समय बिताने की वजह से बच्चों में एकाग्रता खत्म हो रही है।

जब-जब बच्चों में एकाग्रता खत्म होने, टीवी-इंटरनेट-गेम पर अधिक समय बिताने की वजह से बच्चों की सेहत खराब होने के डराने वाले अध्ययन सामने आते हैं, अभिभावक चिंतित हो उठते हैं। वे अपने बच्चों की ये आदतें छुड़ाने के लिए उन्हें डांटते-फटकारते हैं। अक्सर कड़ी और कड़वी बातें बोलते हैं। इसका सकारात्मक असर नहीं पड़ता, बल्कि बच्चा पलट कर जवाब देता है और ढीठ हो जाता है। इस तरह किताबों में उसकी अरुचि बढ़ती जाती है। इसके लिए अभिभावकों को कुछ बातों का ध्यान रखने की जरूरत है।

बच्चों के लिए समय निकालें

आज के महानगरीय जीवन में अक्सर माता-पिता दोनों कामकाजी होते हैं। सुबह उन्हें दफ्तर पहुंचने की हड़बड़ी होती है, तो शाम को वे थके-मांदे घर लौटते हैं। ऐसे में रात को भोजन के समय ही बच्चों के साथ बैठ कर कुछ बातें कर पाते हैं। उसमें भी जिन माता-पिता पर दफ्तर के काम की अधिक जिम्मेदारियां होती हैं, वे घर पहुंच कर भी फोन या कंप्यूटर पर बैठ कर दफ्तर का काम निपटाते रहते हैं। इस तरह बच्चों को समुचित समय नहीं दे पाते। बच्चों की पढ़ाई-लिखाई की देखभाल ट्यूटर या फिर कोचिंग सेंटर वालों के भरोसे छोड़ कर निश्चिंत हो जाते हैं। फिर जब परीक्षा में अपेक्षित नंबर नहीं आते, तो बच्चे को कोसते, डांटते, कड़वी भाषा में बात करते हैं। इससे बच्चे की माता-पिता से दूरी बढ़ती जाती है। इससे बचने का यही तरीका है कि अपनी तमाम व्यस्तताओं के बीच बच्चों के लिए समय निकालें।

इसके लिए माता-पिता को भी अपना टाइम-टेबल बनाना चाहिए। बच्चे स्कूल से लौटने के बाद खा-पीकर ट्यूशन के लिए या फिर अपने दोस्तों के साथ खेलने निकल जाते हैं। जब तक माता-पिता घर लौटते हैं, वे टीवी देख रहे होते हैं या दोस्तों के साथ बाहर खेल रहे होते हैं। अक्सर माता-पिता दफ्तर से लौट कर टीवी देखने बैठ जाते हैं। ऐसा न करें। सबसे पहले घर पहुंच कर बच्चों के स्कूल के बारे में जानकारी लें। उनकी डायरी और कॉपियां देखें। फिर साथ में भोजन करने के बाद उनके साथ कम से कम डेढ़-दो घंटे पढ़ाने बैठें। जरूरी नहीं कि आपको बच्चे के हर विषय के बारे में जानकारी हो ही। जब आप साथ बैठते हैं, बच्चे का ध्यान किताब की तरफ लगा रहता है। बल्कि बेहतर तरीका यह है कि जिस विषय को आप नहीं समझते, उसे बच्चे से कहां कि वह आपको समझाए-पढ़ाए। इस तरह बच्चे का आत्मविश्वास बढ़ता है।

पढ़ाई के समय में इन चीजों का इस्तेमाल बिल्कुल न कर ने दें। फिर उन पर बातचीत के जरिए नजर रखते रहें कि टीवी-इंटरनेट से वे क्या सीख रहे हैं।

टाइम-टेबल बनाएं

बच्चों की पढ़ाई के लिए टाइम-टेबल बनाना बहुत जरूरी है। जब भी टाइम-टेबल बनाएं, बच्चों के साथ अपना भी टाइम-टेबल साझा रखें। सुबह बच्चों को जल्दी स्कूल पहुंचना होता है, आपको भी दफ्तर पहुंचने की जल्दी होती है। इसलिए सुबह का समय टाइम-टेबल में शामिल नहीं हो सकता। पर जब आप दफ्तर से लौटते हैं, टीवी देखने या दफ्तर का काम निपटाने के बजाय रात को कम से कम दो घंटे का समय बच्चों के लिए रखें। चूंकि माताएं रात के भोजन की तैयारी और दूसरे घरेलू कामों में लग जाती हैं, इसलिए पिता को ही अपना समय बच्चों को देना होगा। रात को ग्यारह बजे तक जगा जा सकता है।

बच्चों को पढ़ाते समय या उनके पढ़ते समय साथ बैठते समय, चाहें तो आप भी कुछ पढ़-लिख या दफ्तर का काम कर सकते हैं। पर ध्यान रखें कि आपकी नजर उनकी पढ़ाई पर हो। जैसे ही बच्चों को खुद पढ़ने के लिए छोड़ेंगे, वे दूसरी तरफ ध्यान लगाएंगे। बीच-बीच में बच्चों से उनकी पढ़ी हुई बातों के बारे में पूछते रहें।

टीवी-इंटरनेट से छुटकारा

टीवी और इंटरनेट से छुटकारा पाना आज आसान नहीं है। आज के समय में स्कूलों के बहुत सारे कार्यक्रम इंटरनेट पर निर्भर हैं। टीवी पर भी कई कार्यक्रम बच्चों को ध्यान में रख कर प्रसारित किए जाते हैं, जिन पर आधारित कई बार स्कूली पाठ्यक्रमों में प्रश्न भी पूछे जाते हैं। फिर जिस तरह ज्ञान आधारित शिक्षा होती गई है, उसमें सामान्य ज्ञान और सूचनाओं का भी महत्त्व है। इसलिए बच्चों को पूरी तरह टीवी-इंटरनेटमोबाइल फोन से दूर कर पाना मुश्किल काम है। इसमें हमें देखना यह है कि बच्चों को इन माध्यमों का सही उपयोग करना कैसे सिखाएं। कई माता-पिता का तर्क होता है कि वे हर समय बच्चों पर नजर नहीं रख सकते, इसलिए वे इन माध्यमों का किस तरह उपयोग करते हैं, कहना मुश्किल है। बात सही है। पर अगर सिर्फ बच्चों को टीवी-इंटरनेट के उपयोग के बारे में लगातार जानकारी देते रहें, समझाते रहें, तो वे उनका सही उपयोग करना सीख जाते हैं।

इसके लिए जरूरी है कि आप उनसे इंटरनेट पर पाठ्यक्रम आधारित वेबसाइटों और टीवी पर चलने वाले कार्यक्रमों के बारे में लगातार बातचीत करते रहें, उनसे उनके बारे में जानकारी लेते रहें, पूछते रहें। उन्हें डांट-फटकार कर इन चीजों के उपयोग के बारे में मना करेंगे, तो वे जिद करके इनका उपयोग करेंगे। इसलिए उन्हें इन चीजों का उपयोग करने दें, पर उसका समय तय करें। पढ़ाई के समय में इन चीजों का इस्तेमाल बिल्कुल न कर ने दें। फिर उन पर बातचीत के जरिए नजर रखते रहें कि टीवी-इंटरनेट से वे क्या सीख रहे हैं।