अतुल कनक
होली हैरान थी। वो आम आदमी के घर में जाना चाहती थी लेकिन सारे रास्ते जाम थे। कहीं लोगों के हाथों में समर्थन के पोस्टर थे, तो कहीं विरोध के बैनर। समर्थकों और विरोधियों से बचे हुए रास्ते पुलिस ने बंद कर रखे थे। हर तरफ अफरातफरी थी। होली इधर जाती तो इधर वाले हवा में नारे उछालते, होली उधर जाती तो उधर वाले जिंदाबाद-मुर्दाबाद शुरू कर देते। हर कोई बोल रहा था, लेकिन क्यों बोल रहा था और क्या बोल रहा था, यह बात शायद बोलने वाले को भी पता नहीं थी।
होली ने देखा कि लोगों की मुट्ठियां हवा में उठी हुई हैं। लेकिन ये मुट्ठियां उन मुट्ठियों से अलग थीं जो हर बार उसके आने पर हवा में उठती थीं। अब तक जो मुट्ठियां हवा में उठती थीं, उनमें गुलाल भरा होता था। लेकिन इस बार गुलाल गायब था। केवल मुट्ठियां ही थीं। लोग प्रेम से गालियां गाने के बजाय गुस्से में गालियां दे रहे थे। बंदूकों वाली पिचकारियों की जगह असली बंदूकें हवा में लहराई जा रही थीं। कुछ लोग एक दूसरे के घर जा रहे थे लेकिन त्योहार की बधाइयां देने नहीं, बल्कि एक दूसरे को धमकाने।
यह माहौल देख होली चकरा गई। वो समझ ही नहीं सकी कि आखिर माजरा क्या है। उसने अपने ट्रेवल गाइड से पूछा कि वो उसे सही जगह तो लेकर आया हे ना? ट्रेवल गाइड ने कहा- देख लो मैडम, वो सामने रहा ताजमहल। अभी-अभी दुनिया का एक बड़ा नेता उसके सामने अपना फोटो खिंचवा कर गया है। आपको भारत में आने का इससे बड़ा प्रमाण और क्या दे सकता हूं।
‘आई तो सही जगह हूं, लेकिन हो सकता है कि आने की टाइमिंग गलत हो गई हो।’ होली ने अपने स्मार्टफोन की स्क्रीन देखी। उस पर फागुन का महीना ही लिखा हुआ आ रहा था।
‘याने टाइमिंग भी सही है। वरना तो प्रह्लाद और हिरण्यकश्यप -दोनों ही इतने ताने मारते कि फिर कभी आने तक की भी इच्छा नहीं होती।’ होली ने मन ही मन अपनी किस्मत को धन्यवाद दिया।
‘जब टाइमिंग भी सही है और जगह भी सही है तो फिर आखिर देश में हो क्या रहा है?’ होली ने परेशान होकर इधर- उधर देखा। सामने दो दुकानदार बातें कर रह थे। होली उनके पास जाकर खड़ी हो गई। लेकिन त्योहार के दिनों में उसकी तरफ ध्यान देने की फुर्सत किसके पास थी? दोनों दुकानदारों ने होली को अनदेखा कर दिया। अनदेखा करने का एक बड़ा कारण यह भी था कि उनका धंधा ही संकट में आ गया था।
‘अब तक तो चीनी रंग के दम पर मुनाफा कमा कर हम हमारी होली को रंगीन कर लेते थे, लेकिन लगता है कि इस बार कोरोना वायरस रंग में भंग करेगा।’ एक दुकानदार ने कहा। दूसरा दुकानदार बोला -‘सही कहते हो भैया। एक तो महंगाई, ऊपर से चारों तरफ समर्थन और विरोध की मारामारी और उस पर कोरोना वायरस की मार।’ भगवान को भी सारी मुसीबत हम पर ही डालनी थी।
होली ने कोरोना वायरस का नाम सुना तो झट से एक मास्क अपनी नाक पर बांध लिया। वो समझ चुकी थी कि इंसानों की दुनिया में मुसीबत किसी भी तरफ से और किसी भी तरह से आ सकती है।
