महावीर राजी

दस बज गए थे और अब मंदिर वीरान होने लगा था। भगवान चंद्रचूड का विख्यात मंदिर! पार्श्व में दामोदर नदी का घाट! सुबह के वक्त पुण्यार्थियों का मेला लगा रहता है यहां। पचासेक सीढ़ियां चढ़ कर बड़ा-सा प्रांगण बना है, जिसके बीचोबीच स्थापित है भगवान का भव्य मंदिर। सबसे निचली सीढ़ी मानो एलओसी हो, जिसके ऊपर जाना उन जैसों के लिए निषिद्ध है! लगभग आठ साल की उम्र थी उसकी। खस्ता हाल पैंट! बेडौल शर्ट! मोच खाया कटोरा! उसके जैसे दसियों नमूने मंदिर प्रांगण में भीख मांगते मंडराया करते।
मंदिर में भीड़ अब कम हो चुकी थी। उसने जेब से भीतर की जमा पूंजी निकाली- चार टका आठ आना! बस्स! का होगा इतने में…? चार टका आठ आना पेट में जाएगा, तो जो भूख अभी सिंग-पूंछ समेटे शांत बैठी है, कुत्ते की तरह भौंकती उठ खड़ी न हो जाएगी…। फिर क्या करेगा वह?

मंदिर को अलविदा कह कर मेन मार्केट में आ गया वह। किराना मंडी का भीड़-भाड़ वाला व्यस्त क्षेत्र! दोनों ओर ऊंची ऊंची दुकानें और गद्दियां! विभिन्न तरह के अनाजों की खरीद फरोख्त पूरे शबाब पर थी। ट्रकों पर माल लद रहे थे। दुकानों की कतारों में गुप्ताजी की भी गद्दी थी। सामने गद्दी पर गुप्ताजी विराजमान थे। कलफदार फनफनाता कुर्ता और धोती। ललाट पर चंदन का तिलक! गुप्ताजी मंदिर के नियमित भक्त थे। प्रतिदिन सुबह भगवान की पूजा के लिए अवश्य आया करते। हाथ में भगवान के अभिषेक के लिए दूध से भरा लोटा रहता। वह भी प्रतिदिन भीख की याचना करता उनके पीछे लपकता। दोनों आगे पीछे चलते हुए एलओसी तक आते। फिर झिड़की का चाबुक फटकारते गुप्ताजी सीढ़ियां चढ़ जाते और वह प्रतिदिन नीचे ही बकलोल की तरह खड़ा रह जाता वह। ऊपर जाना निषेध!

गद्दी पर बैठे गुप्ताजी से अनायास ही नजर मिल गई। उसके पांव ठमक गए। मंदिर में सेठजी दूसरे मूड में रहा करते हैं। इस वक्त शांत और हंसमुख तो हैं ही, नोटों से भरी तिजोरी के पास बैठे हैं। संभव है, पसीज जाएं और दस-बीस टाका कटोरे में डाल दें। वह उम्मीद से भर कर किंकियाते हुए गद्दी के करीब तक चला आया- ‘सर, कुछ भीख मिल जाए। सुबु से कुछ नहीं खाया।’ ‘ले हलुआ…! पीछा करते यहां तक आ पहुंचा, हुंह! चल आगे बढ़!’ ‘सर, सिरिफ पांच टका… भोत भूख लगा।’ वह रिरियाया। ‘पांच टका?’ झाऊ मूंछों के बीच गुप्ताजी मुस्कुराए- ‘पांच टका यों ही आते हैं क्या रे? खून-पसीना एक करना पड़ता है! भाग यहां से…!’

वह दांत पीसता, बड़बड़ाता आगे बढ़ गया। सारे दिन आराम से गद्दी पर बैठ कर फद फद करते रहते हैं। अरे, एक दिन कटोरा थाम कर हमारे संग पूरा दिन बिता कर देखो, तब पता चलेगा कि खून-पसीना बहाना किसको कहते हैं! कपड़ा पट्टी के मुहाने पर हरि साव की चाय-पकौड़ी की गुमटी थी। पेट में चूहे उछल-कूद मचा रहे थे। एक बज रहा था। दाहिनी हथेली पैंट की जेब में थी। हथेली चार रुपए पचास पैसे को चूजे की तरह सहला रही थी। चार-पांच टका और जुट जाए तब एक बार में ही पेट भर कर खाएगा। अभी भूख सहने की शक्ति खत्म नहीं हुई है। वह धीरे-धीरे चल कर गुमटी के पास चला आया।

‘काका, कुछ भीख मिल जाय…।’ वह कातरता से गिड़गिड़ाया। हरि साव ने उसे ऊपर से नीचे तक गौर से निहारा, फिर दया दिखाते हुए दो पकौड़ियां उसके कटोरे में डाल दी। भीख पाकर उत्साहित होते हुए वह हिनहिनाया- ‘काका, दुकान में नौकर रख लो न। खूब मेहनत करेंगे।’ हरि साव ने एक क्षण को सोचा, फिर हाथ जोड़ दिए- ‘रख लेता बिटवा। कप-प्लेट उठाने-धोने के लिए तू ठीक रहता। पर इन चाइल्ड लेबर वालों का क्या करें? इनका आतंक बढ़ गया है रे। अभिए हमको और तुमको… दुन्नो को हाजत में दाल देंगे। कल ही सामने वाले होटल में छापा पड़ा था।’

वह समझ नहीं पा रहा था कि ई चाइल्ड लेबर क्या बला है? मेहनत मजूरी पर ही रोक! ई कैसा न्याय है भैया? पेट के भीतर जो एगो भट्टी सुलग रहा है, उसको कैसे बुझाएं उसके जैसे अभागे! उसका भी एक छोटा-सा घर था। मां बाबू थे। बहिन थी। थोड़ा खेत भी। बाबू दूसरी मेहरारू करके घर छोड़ कर चला गया। बहिन की ठाकुर के बेटे ने ऐसी दुर्गति की कि बेचारी को पोखर के एकदम तल में जाकर मुंह छिपाना पड़ा। खेत पर बड़का बाबू की नजर पहले से ही थी। उसे तिकड़म से कब्जियाते देर नहीं लगी। फिर मां को भी उल्टे-सीधे लांछन लगा कर गांव से खदेड़ कर ही दम लिया। अम्मा बेचारी क्या करती! एक अदद नौकरी के लिए खूब हाथ-पांव मारे। काम नहीं मिला तो नहीं ही मिला। कौन रास्ता बचता भीख मांगने के सिवाय!

चार कब बजे गए, पता ही नहीं चला। भूख की बेआवाज मार से पांव लड़खड़ाने लगे थे। मन ही मन हिसाब लगाया- चार टका पचास पैसे में क्या आएगा। अभी तो पूरी रात बाकी है। उसकी नजर रोड के किनारे लगे नल पर गई। अंजुरी बना कर ढेर सारा पानी पेट के कुएं में डाल लिया। एक लंबी बेसुरी डकार निकली। भीतर पानी गुड़ गुड़ करके बज उठा। मन उल्टी उल्टी का होने लगा। धत्त बुड़बक, पानी से जो पेट भर जाता तो इतनी हाय तौबा रहती दुनिया में! गांधी चौक से बाएं मुड़ते ही सेंट जेवियर्स स्कूल था। बड़ा-सा भव्य गेट! दोनों ओर जालीदार चहारदीवारी! शानदार मैदान और उसके पीछे स्कूल भवन! छुट्टी हो गई थी। एक जैसी पोशाक पहने धमा-चौकड़ी मचाते गदबदे बच्चों को देख कर मन ईर्ष्या से भर उठा। उसके गांव में भी स्कूल था। कुछ दिन गया था वहां। एक बेला खिचड़ी मिलती थी। खिचड़ी के लालच में ही बच्चे स्कूल आते थे। अचानक आपसी झमेले के कारण पंचायत ने स्कूल को दाल-चावल का आबंटन रद्द कर दिया। खिचड़ी बंद तो बच्चों का स्कूल आना भी बंद! इसी बीच उसका बप्पा दूसरी औरत के साथ लापता हो गया। घर में खाने के लाले पड़ गए। पेट में जब अन्न का दाना न जाए तो कैसी पढ़ाई और कैसा स्कूल! सब भरे पेट वाले साहूकारों के चोंचले हैं।

जहां वह खड़ा था, दो हाथ दूर एक लैंप पोस्ट था। फुनगी पर टंगी बत्ती के नीचे एक साइन बोर्ड भी झूल रहा था। बोर्ड में चित्र बना था- दो बच्चे पीठ पर स्कूल बैग, हाथ में किताबें, आंखों में ढेर सारी चमक! एक ओर लिखा था- आओ स्कूल चलें, सर्व शिक्षा अभियान! उसका मन उदासी से भर गया। वातावरण में धुंधलका उतरने लगा था। शाम के छह बज गए। अब और भीख मिलने की उम्मीद नहीं थी। उसके पांव स्टेशन की ओर मुड़ गए। स्टेशन परिसर के बाहर छोटी-छोटी कई गुमटियां हैं, जहां सस्ते दामों में रोटी-सब्जी मिल जाती है। उसने अपनी आज की जमा पूंजी को टटोलने के लिए जेब में हाथ डाला। मन ही मन हिसाब लगाया, चार टका पचास पैसे में दो रोटी तो मिल ही जाएगी। सब्जी भले न मिले। फिक्क से हंस पड़ा- चलेगा! हथेली भीतर की पूंजी को सहलाने के लिए जेब में रेंग गई। अरे, जेब खाली! पैसे कहां गए? उसका कलेजा धक से रह गया। पागलों की तरह दोनों जेबों को बाहर की तरफ उलट डाला। पैसे नदारद! उसकी आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा। कलेजा मुंह को आ गया। हिम्मत जुटा कर खोजी नजरों से रास्ते को खंगालता कदम-दर-कदम वापस लौट चला। क्रमश: सेंट जेवियर्स स्कूल… नल… हरि साव की गुमटी… कपड़ा पट्टी का मुहाना…! पैसे नहीं मिले। वह धप्प से जमीन पर लुढ़क गया।

सुबह थी! सूर्योदय था! लालिमा थी! मंदिर था! चंद्रचूड थे! भीड़ थी! पुण्यार्थी थे! सीढ़ियां थीं! भिखारी थे! जयकारा था! शोर था!

सब कुछ रोज की तरह था। वह भी मांगने वालों की भीड़ में शामिल हो गया। पहले से ही स्याह चेहरा और भी दयनीय दिख रहा था। होंठों पर पपड़ियां जमीं थीं। पेट में पानी गुड़गुड़ कर रहा था।

तभी गुप्ताजी आते दिखे। रोज की तरह दूध का लोटा लिए। तेज-तेज चलने से दूध की बूंदें लोटे से बाहर छलक रही थीं। वह उनकी ओर लपका- ‘सर, भोत भूख लगी। रात से कुछ नहीं खाया। दो टाका दे दो सर।’

‘दुर्रर… हट…! रोज रोज तंग करते रहता है…।’ गुप्ताजी हिनहिनाए।

‘सर, भूख भी ससुरी रोज रोज तंग करने आ जाती न…।’

पर उसकी आशा पर पानी फिर गया। दुत्कारते और ‘शिव शिव’ उच्चारते गुप्ताजी मेढक की तरह फुदकते सीढ़ियां चढ़ने लगे। वह सीढ़ियों के पास ठमक गया। ऊपर जाना निषेध! जेहन में एक अंधड़ चलने लगा।

अचानक उसने मन ही मन एक निर्णय कर लिया। फिर कटोरे को सीढ़ियों के पास छुपा कर चुपचाप सीढ़ियां चढ़ने लगा। पहली फिर दूसरी फिर तीसरी…! ऊपर पहुंचते ही आंखें विजयोल्लास से खिल उठीं। अभी तक उसका ऊपर आ जाना किसी की नजर में नहीं आया था। प्रांगण के बीचोबीच मंदिर और मंदिर के भीतर भगवान का विग्रह! दबे पांव मंदिर में झांका। भीतर तीन-चार व्यक्ति भक्ति भाव से पूजा में व्यस्त थे। गुप्ताजी की आंखें मुंदी हुई थीं। होंठों पर मंत्रोचार से स्फुट कंपन था। दूसरे ही पल बदन को न्यून कोण में झुका कर विग्रह पर दूध की धार छोड़ने वाले ही थे कि वह तीर की तरह झपाके से भीतर घुसा और लोटे को झपट कर कब्जे में करते हुए मंदिर के बाहर दौड़ गया। गुप्ताजी एक क्षण को सनाका खा गए। आंखें मुंदी होने से जान ही नहीं पाए कि हाथ का लोटा कहां गायब हो गया। फिर पूरे माजरे का पता चलते ही जब तक हाय-तौबा मचाते उसके पास पहुंचते, वह लोटे के सारे दूध को कंठ के नीचे उतार चुका था। उसके स्याह चेहरे पर तृप्ति का एक विलक्षण उल्लास खिल आया था, जिसे पीठ पर पड़ रहे गुप्ताजी के भारी भरकम धौल भी कम करने में नाकाम थे।